यदि मुकदमा चल रहा हो तो लंबी हिरासत भर से नहीं मिलेगी जमानत: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल लंबे समय तक जेल में रहना जमानत देने का आधार नहीं बन सकता यदि मुकदमे की सुनवाई शुरू हो चुकी हो और आगे बढ़ रही हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि देरी के आधार पर जमानत देने वाले पुराने फैसले उन मामलों पर लागू होते हैं जहां ट्रायल शुरू ही नहीं हुआ था।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस वाई. जी. खोबरागड़े ने एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज की, जो जुलाई, 2019 से हिरासत में है। आरोपी ने तर्क दिया कि वह छह साल से अधिक समय से जेल में है और अभी तक मुकदमे का निष्कर्ष नहीं निकला, जिससे उसके त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हुआ है।
राज्य पक्ष ने इसका विरोध करते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य हैं और कई गवाहों की गवाही अभी बाकी है। साथ ही गंभीर अपराध होने के कारण केवल देरी के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।
अदालत ने पाया कि आरोपी करीब छह साल सात महीने से हिरासत में है, लेकिन ट्रायल पहले ही शुरू हो चुका है। अब तक छह गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। अदालत ने यह भी नोट किया कि कुछ गवाह राज्य से बाहर हैं या उपलब्ध नहीं हैं जिसके कारण सुनवाई पूरी होने में समय लग रहा है।
अदालत ने भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए माना कि बिना ट्रायल के लंबी हिरासत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकती है लेकिन इस मामले में स्थिति अलग है, क्योंकि मुकदमा प्रगति पर है।
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि जिन मामलों का हवाला दिया गया, उनमें ट्रायल शुरू नहीं हुआ और आरोपी लंबे समय तक बिना सुनवाई के जेल में है। इसलिए वे फैसले इस मामले पर लागू नहीं होते।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल लंबी हिरासत के आधार पर आरोपी जमानत का हकदार नहीं है और उसकी याचिका खारिज की।
हालांकि, अदालत ने आरोपी को राहत देते हुए कहा कि यदि छह महीने के भीतर मुकदमा पूरा नहीं होता है तो वह दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। साथ ही ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह रोजाना आधार पर सुनवाई कर छह महीने में मुकदमा पूरा करने का प्रयास करे।