गोवा में बॉम्बेहाई कोर्ट ने गुरुवार (1 अक्टूबर) को भारत के चुनाव आयोग (ECI) से पूछा कि राज्य में वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) की चल रही प्रक्रिया के दौरान, वोटर ID में पता बदलने के लिए दिए गए फ़ॉर्म 8 के आवेदनों को उसके ऑटोमैटिक सॉफ़्टवेयर सिस्टम से क्यों रिजेक्ट किया जा रहा है।

जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की डिवीज़न बेंच सलगांवकर परिवार की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। परिवार का दावा है कि फ़ॉर्म 8 (पता बदलने के लिए) भरने के बावजूद उनके नाम ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए।

ECI के वकील गौरीश अग्नि ने जजों को समझाया कि सिस्टम के अनुसार, जो वोटर अब उस पते पर नहीं रहता, जो पिछली वोटर लिस्ट में दर्ज है, उसे SIR प्रक्रिया के दौरान सबसे पहले बूथ लेवल ऑफ़िसर्स (BLOs) द्वारा दिया गया पहले से भरा हुआ एन्यूमरेशन फ़ॉर्म जमा करना होता है और अपना पता बदलने का रिकॉर्ड दर्ज कराने के लिए उन्हें अपना फ़ॉर्म 8 भी देना होता है।

हालांकि, सलगांवकर परिवार के मामले में अग्नि ने बताया कि पहली बात तो यह कि उन्होंने आठ साल तक ECI को यह नहीं बताया कि उन्होंने अपना घर बदल लिया। BLO द्वारा स्थानीय लोगों से पुष्टि करने के बाद ही पता चला कि वे नए पते पर चले गए। वकील ने आगे कहा कि परिवार ने पहले से भरे हुए एन्यूमरेशन फ़ॉर्म जमा नहीं किए और एन्यूमरेशन फ़ॉर्म जमा करने की समय-सीमा खत्म होने से कम-से-कम दो दिन पहले ही अपना फ़ॉर्म 8 लेकर आए।

अग्नि ने कहा कि परिवार ने एन्यूमरेशन फ़ॉर्म जमा नहीं किए, बल्कि सिर्फ़ फ़ॉर्म 8 जमा करने पर ज़ोर दिया, जिसे अधिकारियों ने मंज़ूरी नहीं दी, क्योंकि यह ECI की गाइडलाइंस के ख़िलाफ़ था। उन्होंने कहा कि क्योंकि परिवार ने एन्यूमरेशन फ़ॉर्म जमा नहीं किए, इसलिए उनके नाम ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं को 'आपत्तियों' के समय वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए अपने नए पते के साथ फॉर्म 6 भरने के उपाय के बारे में बताया गया, लेकिन परिवार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और पहली अथॉरिटी के पास याचिका दायर की, जिसने उनकी अपील खारिज कर दी; इसके बाद वे अपीलीय अथॉरिटी के पास गए, जिसने भी उन्हें कोई राहत नहीं दी।

हालांकि, बेंच ने गौर किया कि जहां ECI सिस्टम ने उन वोटरों की सफलतापूर्वक पहचान की, जिन्होंने अपना पता बदल लिया था और लिस्ट से उनके नाम हटा दिए, वहीं यह सिस्टम दूसरी जगह शिफ्ट हुए वोटरों को लिस्ट में शामिल करने में नाकाम रहा। जजों ने यह भी देखा कि सिस्टम ने आवेदकों को कोई उपाय दिए बिना सीधे फॉर्म 8 के आवेदनों को खारिज किया।

इस पर अग्नि ने साफ़ किया कि सिस्टम फॉर्म 8 को तभी स्वीकार करता है, जब उसे पहले से भरे हुए एन्यूमरेशन फॉर्म के साथ जमा किया जाए, ताकि डेटा में संबंधित वोटर का नाम हो।

वकील ने समझाया,

"लेकिन अगर एन्यूमरेशन फॉर्म नहीं है तो इसका मतलब है कि डेटाबेस में उस वोटर की जानकारी नहीं है, इसलिए अगर वह वोटर फॉर्म 8 भरता है, तो वह अपने आप खारिज हो जाएगा। क्योंकि इसमें केवल दो ही विकल्प हैं - स्वीकार करना या खारिज करना... इस प्रक्रिया में कोई भी वोटर बिना उपाय के नहीं रहता... याचिकाकर्ताओं की गलती यह है कि उन्होंने आठ साल तक ECI को यह नहीं बताया कि उन्होंने अपना पता किसी दूसरे वार्ड में बदल लिया है, भले ही वह उसी निर्वाचन क्षेत्र में हो।"

हालांकि, जजों ने कहा कि फॉर्म 8 के आवेदनों को सीधे खारिज करने के बजाय कोई दूसरा तरीका होना चाहिए। ECI को याद दिलाया कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो समावेशी वोटर लिस्ट बनाए रखने का उसका मुख्य मकसद पूरा नहीं हो पाएगा।

सोमवार (28 सितंबर) से इस मामले की सुनवाई कर रही बेंच ने अब मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर तक के लिए स्थगित की।

Case Title : Paresh Salgaonkar vs State of Goa

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