बॉम्बे हाईकोर्ट ने ईरानी मिसाइल हमले में मारे गए भारतीय नाविक के पार्थिव शरीर का DNA टेस्ट कराने का आदेश दिया
बॉम्बे हाईकोर्ट शिपिंग के डायरेक्टर जनरल को आदेश दिया कि वे उस भारतीय नाविक के पार्थिव शरीर को जिसकी ओमान तट के पास ईरानी मिसाइल हमले में मौत हो गई, मुंबई के कलिना स्थित फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) के डायरेक्टर को सौंप दें, ताकि उसका DNA टेस्ट किया जा सके।
चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम अंखड की डिवीज़न बेंच ने अधिकारियों को आगे आदेश दिया कि वे FSL कलिना से DNA रिपोर्ट प्राप्त करें और उसकी एक कॉपी दीक्षित सोलंकी के परिवार वालों को सौंप दें। दीक्षित सोलंकी MKD व्योम जहाज के इंजन रूम में ऑयलर के तौर पर काम करते थे।
जजों ने आदेश दिया,
"हम शिपिंग के DG को निर्देश देते हैं कि वे मृतक के परिवार के किसी एक सदस्य की मौजूदगी में जहाज के मालिक से मृतक का पार्थिव शरीर प्राप्त करें। परिवार का वह सदस्य ज़रूरी कागज़ात पर दस्तखत करके और तकनीकी औपचारिकताएं पूरी करके पार्थिव शरीर को स्वीकार करेगा। इसके बाद उचित देखभाल के साथ पार्थिव शरीर को DNA टेस्ट के लिए FSL कलिना को सौंप दिया जाना चाहिए।"
बेंच ने आगे आदेश दिया,
"एक बार रिपोर्ट मिल जाने के बाद उसकी एक कॉपी मृतक के परिवार वालों को सौंप दी जाए।"
हालांकि, बेंच ने सोलंकी परिवार की वकील एडवोकेट प्रज्ञा तालेकर द्वारा की गई उस गुज़ारिश पर विचार करने से इनकार किया, जिसमें उन्होंने DNA रिपोर्ट जमा करने के लिए "समय-सीमा" तय करने की मांग की थी।
याचिका का निपटारा करते हुए चीफ जस्टिस चंद्रशेखर ने मौखिक रूप से कहा,
"इस गुज़ारिश पर विचार नहीं किया जा सकता। हम ऐसी कोई समय-सीमा तय नहीं कर सकते।"
बेंच अमृतलाल सोलंकी और उनकी बेटी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में दीक्षित सोलंकी के पार्थिव शरीर का उचित DNA टेस्ट कराने की मांग की गई ताकि वे उनके पार्थिव शरीर को स्वीकार कर सकें।
सोमवार (6 अप्रैल) को हुई सुनवाई के दौरान बेंच को बताया गया कि जहाज का कैप्टन 1 मार्च से ही सोलंकी परिवार को गुमराह कर रहा था। वह दीक्षित की स्थिति के बारे में आपस में विरोधाभासी रिपोर्टें दे रहा था। आखिरकार 6 अप्रैल क परिवार को बताया गया कि मृतक की सिर्फ़ कुछ जली हुई हड्डियां ही मिल पाई हैं, जिन्हें परिवार ने DNA टेस्ट के बिना मानने से इनकार किया, इसलिए उन अवशेषों का ठीक से DNA टेस्ट करवाने की मांग की।
याचिका के अनुसार 1 मार्च को जहाज़ के ऑपरेशंस मैनेजर कैप्टन सैडलर रेबेरो ने परिवार को बताया कि सोलंकी को ईरानी मिसाइल हमले की वजह से चोटें आई हैं। परिवार को यह भी बताया गया कि जहाज़ के एक तरफ़ छेद होने की वजह से उनका बेटा लापता हो गया।
याचिका में कहा गया,
"हमें बताया गया कि हमारे बेटे को छोड़कर बाकी सभी क्रू सदस्यों को बचा लिया गया लेकिन हमारा बेटा जहाज़ पर ही रह गया और अभी भी बेहोश था। बार-बार पूछने पर भी कोई नई जानकारी नहीं मिली और हमने शिपिंग कंपनी को एक आधिकारिक चिट्ठी लिखकर इस मामले में तुरंत दखल देने की मांग की। कैप्टन रेबेरो सैडलर ने एक और ईमेल भेजा जिसमें कहा गया कि लापता व्यक्ति (सोलंकी) को अब मृत घोषित कर दिया गया।"
इसके अलावा 3 मार्च को परिवार को बताया गया कि जहाज़ में कोई नहीं है और उसे खींचकर खोर/फक्कन/फुजैराह की तरफ़ ले जाया जा रहा है और सुरक्षा कारणों से कोई भी जहाज़ पर नहीं चढ़ सकता।
इसलिए याचिकाकर्ताओं ने अपने बेटे के अवशेषों को वापस लाने के मामले में अधिकारियों पर कोई कार्रवाई न करने का आरोप लगाया।
याचिका में ज़ोर देकर कहा गया,
"याचिकाकर्ताओं को अपने मृत परिवार के सदस्य के अवशेष प्राप्त करने और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत रीति-रिवाजों को पूरा करने का अधिकार है।"
याचिका में आगे यह भी तर्क दिया गया कि अधिकारियों पर यह कानूनी ज़िम्मेदारी है कि वे भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ-साथ मर्चेंट नेवी एक्ट, 2025 और उसके तहत बनाए गए नियमों के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए मृतक के अवशेषों को जल्द से जल्द वापस लाने का इंतज़ाम करें।