बिना प्रथम दृष्टया अपराध के किसी आरोपी की तलाश में जांच जारी नहीं रखी जा सकती : बॉम्बे हाइकोर्ट

Update: 2026-03-06 08:41 GMT

बॉम्बे हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि प्रारंभिक जांच में किसी भी प्रकार का प्रथम दृष्टया अपराध सामने नहीं आता है तो केवल इस उम्मीद में कि आगे चलकर किसी आरोपी का पता लग सकता है। आपराधिक जांच को जारी नहीं रखा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून की प्रक्रिया को केवल रोविंग और फिशिंग इंक्वायरी के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

यह टिप्पणी चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम ए. अंखड़ की खंडपीठ ने याचिका की सुनवाई के दौरान की। यह याचिका जीटीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने दायर की, जिसमें केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज FIR रद्द करने की मांग की गई।

CBI ने 16 अगस्त 2023 को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-बी और 420 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act) की धारा 13(2) तथा 13(1)(ड) के तहत मामला दर्ज किया। यह FIR कंपनी के साथ-साथ अज्ञात लोकसेवकों और अज्ञात अन्य व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज की गई। मामला उन्नीस बैंकों और वित्तीय संस्थानों के समूह से लिए गए कर्ज में कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ी प्रारंभिक जांच के आधार पर दर्ज किया गया।

सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने पाया कि ऑडिट रिपोर्ट में धन के किसी भी प्रकार के दुरुपयोग या डायवर्जन का कोई प्रमाण नहीं मिला। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि कंपनी के खातों में हुए लेन-देन में कोई असामान्य या संदिग्ध गतिविधि नहीं पाई गई। इसके बावजूद लगभग दो वर्ष तक चली प्रारंभिक जांच के बाद भी CBI किसी विशेष व्यक्ति की पहचान नहीं कर सकी, जो कथित साजिश में शामिल हो।

अदालत ने कहा कि प्रारंभिक जांच का उद्देश्य केवल यह पता लगाना होता है कि क्या कोई संज्ञेय अपराध बनता है और क्या नियमित आपराधिक जांच शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार है। यदि इस चरण में ही अपराध का कोई संकेत नहीं मिलता तो केवल संभावित आरोपी की तलाश के लिए जांच जारी रखना कानूनन स्वीकार्य नहीं है।

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा,

“आपराधिक न्याय प्रणाली की प्रक्रिया को केवल रोविंग जांच के लिए चालू नहीं किया जा सकता। CBI को इस उम्मीद में जांच जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि किसी दिन उसे आरोपी मिल जाएगा, जबकि अभी तक कोई अपराध ही सामने नहीं आया है।”

अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में लगाए गए आरोप मुख्य रूप से बैंकों के समूह द्वारा लिए गए व्यावसायिक फैसलों से जुड़े हैं जैसे कर्ज का पुनर्गठन और ऋण का असाइनमेंट। ऐसे निर्णय यदि नियामकीय दिशा-निर्देशों के अनुसार और विचार-विमर्श के बाद लिए गए हों तो उन्हें तब तक आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता, जब तक कि लेन-देन की शुरुआत में धोखाधड़ी मिलीभगत या बेईमानी का स्पष्ट प्रमाण न हो।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बॉम्बे हाइकोर्ट ने CBI द्वारा दर्ज FIR रद्द की और जीटीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की याचिका स्वीकार की।

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