इंग्लैंड की अदालतों ने देश छोड़ने पर रोक लगाई, भारत लौटने की तारीख नहीं बता सकता: विजय माल्या ने बॉम्बे हाइकोर्ट से कहा

Update: 2026-02-18 11:30 GMT

उद्योगपति विजय माल्या ने बॉम्बे हाइकोर्ट से कहा कि इंग्लैंड की अदालतों के आदेशों के कारण वह वहां की न्यायिक सीमा से बाहर नहीं जा सकते, इसलिए वह यह स्पष्ट रूप से नहीं बता सकते कि भारत कब लौटेंगे।

चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम अंखाड़ की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। इससे पहले 22 दिसंबर, 2025 को अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक माल्या भारत वापस नहीं आते तब तक भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सुनवाई नहीं की जाएगी। पिछले सप्ताह अदालत ने उन्हें एक और अवसर दिया था कि वे स्पष्ट करें कि भारत लौटने की उनकी क्या योजना है।

बुधवार को माल्या की ओर से सीनियर एडवोकेट अमित देसाई ने उनका लिखित वक्तव्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया। देसाई ने कहा कि यह वक्तव्य उनके मुवक्किल के निर्देशों पर आधारित है।

देसाई ने अदालत के समक्ष कहा,

“इंग्लैंड की अदालतों द्वारा पारित आदेशों के अनुसार वे इंग्लैंड नहीं छोड़ सकते। फिलहाल वे यह सटीक रूप से नहीं बता सकते कि वे भारत कब लौटेंगे।”

देसाई ने यह भी तर्क दिया कि अदालत उनके मुवक्किल की व्यक्तिगत और शारीरिक उपस्थिति पर जोर नहीं दे सकती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दो निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि कुछ मामलों में याचिकाकर्ताओं की अनुपस्थिति में भी सुनवाई हुई।

देसाई ने कहा,

“यदि वे लौटते हैं तो वे भगोड़ा नहीं रहेंगे और दोनों याचिकाएं निरर्थक हो जाएंगी।”

हालांकि, खंडपीठ माल्या के इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं दिखी।

चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की,

“आप केवल इंग्लैंड की अदालतों के आदेशों का हवाला दे रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं कर रहे कि आपने उन आदेशों को चुनौती दी है या नहीं। क्या आप इन आदेशों को केवल बहाना बना रहे हैं?”

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता तथा एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू और अनिल सिंह ने माल्या के रुख का विरोध किया। उन्होंने कहा कि भारत में मजबूत और सशक्त न्याय व्यवस्था है, जो विधि के शासन पर आधारित है और माल्या को भारतीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आकर विश्वास जताना चाहिए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि देसाई द्वारा प्रस्तुत वक्तव्य माल्या के वकील को दिए गए निर्देशों पर आधारित है। इसलिए इसे शपथपत्र के रूप में विधिवत दाखिल किया जाए ताकि केंद्र सरकार भी उस पर अपना जवाब दाखिल कर सके।

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को निर्धारित की।

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