महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता में बाधा नहीं बन सकता राज्य: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाइकोर्ट ने कहा कि आज जब अधिक से अधिक महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए कार्यबल में शामिल हो रही हैं तब उन्हें मातृत्व लाभ से वंचित करना उनके देखभालकर्ता की भूमिका से समझौता करने जैसा होगा। अदालत ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका को निर्देश दिया कि केईएम अस्पताल में कार्यरत एक डॉक्टर को शीघ्र मातृत्व लाभ प्रदान किया जाए।
जस्टिस रियाज छागला और जस्टिस अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 का उद्देश्य मातृत्व की गरिमा की रक्षा करना और महिला तथा उसके शिशु को उस अवधि में आर्थिक सुरक्षा देना है जब वह कार्य नहीं कर रही होती।
याचिकाकर्ता धनश्री करखानिस, मुंबई स्थित केईएम अस्पताल में एनेस्थीसिया विभाग में संविदा आधार पर सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अगस्त 2024 में मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत छह माह के मातृत्व अवकाश की मांग की।
हालांकि, अस्पताल प्रशासन ने अक्टूबर, 2024 में यह कहते हुए लाभ देने से इनकार कर दिया कि वह “संविदा कर्मचारी” हैं और नियमित कर्मचारियों की तरह अवकाश की पात्र नहीं हैं।
पिछली सुनवाई के दौरान महानगरपालिका ने सिद्धांततः लाभ देने पर सहमति जताई, लेकिन बाद में भुगतान से इनकार किया।
अदालत ने कहा कि यह कानून कामकाजी महिलाओं को मातृत्व लाभ सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया, इसलिए इसकी व्याख्या उसी उद्देश्य के अनुरूप की जानी चाहिए।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल संविदा कर्मचारी होने के आधार पर मातृत्व लाभ से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के विपरीत है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसे मामलों में संवेदनशीलता दिखाए। जब प्रशासन ने पहले ही सिद्धांततः लाभ देने की बात स्वीकार कर ली थी, तब बाद में रुख बदलना अनुचित और अविवेकपूर्ण है।
अदालत ने कहा कि ऐसी नीतिगत बातें भी भेदभावपूर्ण या मनमानी नहीं हो सकतीं। इसलिए महानगरपालिका द्वारा मातृत्व लाभ से इनकार करने का निर्णय टिकाऊ नहीं है।
इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए संबंधित डॉक्टर को शीघ्र मातृत्व लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया।