2014 में ही समाप्त हो चुका था 5% मुस्लिम आरक्षण, कोई कोटा खत्म नहीं किया गया: महाराष्ट्र सरकार ने हाईकोर्ट से कहा

Update: 2026-04-30 07:41 GMT

महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया कि वर्ष 2014 में मुस्लिम समुदाय को दिया गया 5 प्रतिशत आरक्षण उसी वर्ष दिसंबर में समाप्त हो गया था। इसलिए फरवरी 2026 के सरकारी प्रस्ताव द्वारा किसी भी मौजूदा आरक्षण को समाप्त नहीं किया गया।

जस्टिस रियाज़ छागला और जस्टिस अद्वैत सेठना की खंडपीठ वकील एजाज़ नक़वी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है।

याचिका में 17 फरवरी 2026 के उस सरकारी प्रस्ताव को चुनौती दी गई, जिसके जरिए राज्य ने 2014 के मुस्लिम आरक्षण संबंधी प्रावधान वापस लिए थे।

राज्य सरकार ने सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग की उप सचिव वर्षा देशमुख के हलफनामे के माध्यम से अदालत को बताया कि याचिका भ्रामक है और इसे भारी जुर्माने के साथ खारिज किया जाना चाहिए।

सरकार के अनुसार 9 जुलाई 2014 को जारी अध्यादेश के तहत मुस्लिम समुदाय की 50 जातियों को शैक्षणिक संस्थानों तथा सरकारी सेवाओं में 5 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया था।

इसके बाद 19 जुलाई और 28 अगस्त 2014 को सरकारी प्रस्ताव जारी कर इस आरक्षण के क्रियान्वयन की प्रक्रिया तय की गई।

हलफनामे में कहा गया कि बाद में इस अध्यादेश को अदालत में चुनौती दी गई और 14 नवंबर 2014 को हाइकोर्ट ने निजी गैर-सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों तथा सरकारी नौकरियों में इसके क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी थी।

राज्य ने कहा कि यह अध्यादेश 23 दिसंबर 2014 को स्वतः समाप्त हो गया और उसके बाद इसे किसी वैध कानून के रूप में लागू नहीं किया गया। इसलिए इसके आधार पर कोई प्रवर्तनीय अधिकार शेष नहीं है।

सरकार ने स्पष्ट किया कि 9 जुलाई 2014 से 23 दिसंबर 2014 के बीच जिन छात्रों को इस आरक्षण का लाभ मिला या जिन नियुक्तियों में इसका उपयोग हुआ, वे सुरक्षित रहेंगे।

राज्य ने अदालत को बताया कि फरवरी 2026 का सरकारी प्रस्ताव केवल उन पुराने प्रशासनिक आदेशों को निरस्त करता है, जो 2014 के समाप्त हो चुके अध्यादेश के अनुपालन हेतु जारी किए गए।

इस प्रस्ताव ने मुस्लिम समुदाय का कोई आरक्षण समाप्त नहीं किया।

हलफनामे में कहा गया,

“2014 का आरक्षण ढांचा जिस अध्यादेश पर आधारित था वह 23 दिसंबर 2014 को समाप्त हो गया और कभी कानून का रूप नहीं ले सका। इसलिए फरवरी 2026 का प्रस्ताव किसी आरक्षण को समाप्त नहीं करता बल्कि अप्रासंगिक हो चुके आदेशों को वापस लेता है।”

राज्य ने यह भी कहा कि संविधान केवल धर्म के आधार पर आरक्षण देने की परिकल्पना नहीं करता और याचिकाकर्ता ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर अदालत को भ्रमित करने का प्रयास किया।

वहीं याचिकाकर्ता का दावा है कि वर्ष 2014 में हाईकोर्ट ने मुस्लिम आरक्षण को शिक्षा के क्षेत्र में बरकरार रखा था और तब से मुस्लिम समुदाय की 50 पिछड़ी जातियां इसका लाभ ले रही थीं। उनका आरोप है कि राज्य ने बिना पर्याप्त कारण और बिना ठोस आंकड़ों के इस आरक्षण को वापस लिया है।

मामले की सुनवाई हाइकोर्ट में जारी है।

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