बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी नाबालिग लड़की को यह कहकर साथ चलने के लिए मजबूर करे कि अन्यथा वह आत्महत्या कर लेगा, तो यह प्रलोभन की श्रेणी में आएगा और ऐसे हालात में अपहरण का अपराध बनता है।

सिंगल बेंच जज जस्टिस श्रीराम शिरसाट ने 16 फरवरी को दिए गए निर्णय में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 (अपहरण) और धारा 376 (बलात्कार) तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के तहत आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

अदालत के समक्ष पीड़िता ने अपने बयान में कहा कि आरोपी ने 11 दिसंबर, 2021 को उसे पणजी बस अड्डे पर मिलने के लिए बुलाया और स्पष्ट रूप से धमकी दी कि यदि वह नहीं आई तो वह आत्महत्या कर लेगा। पीड़िता ने बताया कि वह केवल इस डर से घर से निकली, क्योंकि उसे भय था कि आरोपी स्वयं को नुकसान पहुँचा सकता है।

जस्टिस शिरसाट ने कहा,

“पीड़िता ने अपने मन से घर नहीं छोड़ा, बल्कि आरोपी द्वारा उत्पन्न भय और दबाव के कारण ऐसा किया। आत्महत्या की धमकी देकर आरोपी ने उसके मन में भय उत्पन्न किया, जिसके परिणामस्वरूप उसने अपने विधिक संरक्षक की अभिरक्षा छोड़ दी। यह स्पष्ट रूप से प्रलोभन देकर ले जाने का मामला है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपहरण सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि आरोपी ने बलपूर्वक लड़की को घर से निकाला हो। यदि यह सिद्ध हो जाए कि आरोपी ने उसके मन में ऐसा प्रभाव उत्पन्न किया जिसके कारण वह घर छोड़ने के लिए प्रेरित हुई, तो वही पर्याप्त है।

न्यायालय ने कहा,

“आरोपी द्वारा भावनात्मक दबाव और आत्महत्या की धमकी देकर पीड़िता की मानसिक स्थिति को प्रभावित किया गया, जिससे वह अपनी माँ की अभिरक्षा से बाहर चली गई। इससे संदेह से परे यह सिद्ध होता है कि आरोपी ने धारा 363 के तहत दंडनीय अपराध किया।”

अभियोजन के अनुसार घटना के समय पीड़िता की आयु 16 वर्ष थी और आरोपी 32 वर्ष का था। उसे साथ लेकर आरोपी अहमदाबाद गया, जहां किराए का कमरा लिया गया। 3 जनवरी, 2022 को पीड़िता ने अपनी माँ को फोन कर बताया कि आरोपी ने उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए और वह वापस घर लौटना चाहती है।

इसके बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया। त्वरित न्यायालय ने उसे 10 वर्ष के कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई। हाइकोर्ट ने पीड़िता की गवाही को विश्वसनीय और भरोसेमंद मानते हुए कहा कि अभियोजन ने अपना मामला संदेह से परे सिद्ध कर दिया। परिणामस्वरूप, आरोपी की दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा गया।

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