गोद लेने के आदेश का अधिकार जिला मजिस्ट्रेट को देना वैध, 2021 संशोधन बरकरार: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम (JJ Act) में वर्ष 2021 में किए गए उस संशोधन को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, जिसके तहत गोद लेने के आदेश जारी करने की शक्ति अदालतों से लेकर जिला मजिस्ट्रेट को सौंप दी गई।
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने कहा कि केवल मंच बदलने से संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं होता और यह संशोधन गोद लेने की प्रक्रिया को अधिक त्वरित एवं प्रभावी बनाने के उद्देश्य से किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि गोद लेने का आदेश देना न्यायिक कार्य है, जिसे जिला मजिस्ट्रेट जैसे कार्यपालिका अधिकारी को नहीं सौंपा जा सकता। उनका कहना था कि यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 14, 21 तथा शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि केवल इसलिए कि यह कार्य पहले अदालतें करती थीं, इसका अर्थ यह नहीं कि इसे किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी को नहीं सौंपा जा सकता।
अदालत ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट जिला प्रशासन और बाल संरक्षण तंत्र के प्रमुख होते हैं। इसलिए वे विभिन्न संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित कर गोद लेने की प्रक्रिया का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की उपयुक्त स्थिति में हैं।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि जिला मजिस्ट्रेट विभिन्न कानूनों के तहत अर्ध-न्यायिक शक्तियों का नियमित रूप से प्रयोग करते हैं और ऐसे कार्य करने में सक्षम हैं, जिनमें विधिक प्रावधानों का पालन तथा विवेकपूर्ण निर्णय आवश्यक होता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शक्तियों का पूर्ण पृथक्करण न तो व्यावहारिक है और न ही भारतीय विधि व्यवस्था में अनिवार्य। प्रशासनिक कानून में कार्यों का सीमित ओवरलैप स्वीकार्य है।
बच्चों के हितों की सुरक्षा को लेकर उठी चिंताओं पर हाईकोर्ट ने कहा कि अधिनियम और गोद ग्रहण विनियमों के तहत विस्तृत प्रक्रिया और पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। इनमें गृह अध्ययन रिपोर्ट विशेषज्ञ एजेंसियों द्वारा जांच तथा गोद लेने के बाद निगरानी जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
खंडपीठ ने कहा,
“ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि जिला मजिस्ट्रेट यह भूमिका प्रभावी ढंग से नहीं निभा सकेंगे। विशेषकर तब जब उनके पास संबंधित विनियमों और संस्थागत सहायता का ढांचा उपलब्ध है।”
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज कीं और लंबित गोद ग्रहण मामलों को जिला मजिस्ट्रेट के पास स्थानांतरित करने पर लगी अंतरिम रोक भी हटा दी।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतरिम अवधि के दौरान अदालतों द्वारा पारित किए गए गोद ग्रहण आदेश वैध बने रहेंगे।