चार दीवारों के भीतर, सार्वजनिक शांति में कोई खलल नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कथित गोहत्या के मामले में NSA हिरासत क्यों रद्द की?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को गोहत्या के आरोपी दो लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) के तहत जारी हिरासत आदेश रद्द किया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कथित घटना घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी, न कि किसी सार्वजनिक स्थान पर।
जस्टिस राजीव मिश्रा और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-II की खंडपीठ ने इस प्रकार इशम उर्फ इसम और समीर द्वारा दायर दो बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिकाओं को स्वीकार किया और निर्देश दिया कि उन्हें तत्काल हिरासत से रिहा किया जाए।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि कथित घटना, जिसमें केवल एक गाय की हत्या शामिल थी, उसके कारण न तो कोई हिंसा हुई, न ही सार्वजनिक शांति और व्यवस्था में कोई खलल पड़ा, और न ही सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ा।
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा,
"उपर्युक्त चर्चा के आलोक में यह अकाट्य निष्कर्ष निकलता है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ NSA के तहत जारी हिरासत आदेश न तो कानून की दृष्टि से और न ही तथ्यों के आधार पर कायम रखा जा सकता है। अतः, यह आदेश इस न्यायालय द्वारा रद्द किए जाने योग्य है।"
संक्षेप में मामला
हिरासत जारी करने वाले प्राधिकारी (जिला मजिस्ट्रेट, शामली) ने मूल रूप से NSA की धारा 3(2) के तहत विवादित हिरासत आदेश जारी किया। यह आदेश याचिकाकर्ताओं के खिलाफ 'यूपी गोहत्या निवारण अधिनियम, 1955' की धारा 3, 5A और 8 के तहत दर्ज FIR के आधार पर जारी किया गया।
हिरासत के कारणों के अनुसार, पुलिस को 23 अप्रैल, 2025 को शिकायतकर्ता से सूचना मिली थी कि कुछ लोग गोहत्या कर रहे हैं।
घर के भीतर तलाशी लेने पर पुलिस को एक कटा हुआ सिर, पैर, खाल और मांस बरामद हुआ। पशु चिकित्सक द्वारा किए गए वैज्ञानिक परीक्षण के बाद बरामद मांस की पहचान 'बीफ' (गोमांस) के रूप में हुई।
शेष सामग्री की पहचान गाय की संतान (बछड़े/बछिया) के अवशेषों के रूप में की गई। जहां आरोपी हासिम को अगले ही दिन (24 अप्रैल) गिरफ्तार कर लिया गया, वहीं आरोपी समीर को 27 जून को ही गिरफ्तार किया जा सका।
जब वे हिरासत में थे, तब संबंधित SHO ने संबंधित SP को रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कहा गया कि याचिकाकर्ताओं के कृत्य के कारण 5-6 दिनों तक तनावपूर्ण माहौल बना रहा।
यह दावा किया गया कि चूंकि हिंदू समुदाय की भावनाएं आहत हुई थीं, इसलिए आम जनता में असंतोष और बेचैनी फैल गई, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था। आगे भेजी गई रिपोर्ट मिलने पर ज़िला मजिस्ट्रेट ने 7 जुलाई, 2025 को हिरासत के आदेश जारी किए, जिसमें निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ताओं को 12 महीने की अवधि के लिए हिरासत में रखा जाए। राज्य सरकार ने आखिरकार 19 अगस्त को इस आदेश की पुष्टि की।
हिरासत को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं के वकील गौतम बघेल ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं का कथित कृत्य उनके घर की सीमाओं के बाहर नहीं हुआ। इसलिए यह निजी तौर पर, लोगों की नज़र से दूर किया गया।
यह भी कहा गया कि प्रतिवादियों द्वारा दायर जवाबी हलफनामे में ऐसा कोई दावा नहीं था कि याचिकाकर्ता के कृत्य के कारण कोई सांप्रदायिक हिंसा हुई हो, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक शांति भंग हुई हो या किसी व्यक्ति को चोट लगी हो।
इन तर्कों की पृष्ठभूमि में डिवीज़न बेंच ने 'फ़ैयाज़ कुरैशी बनाम भारत संघ 2019' मामले में हाईकोर्ट के फ़ैसलों का हवाला दिया, जिसमें हिरासत का आदेश रद्द किया गया। उस मामले में यह कहा गया कि ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे यह पता चले कि जानवरों को काटने का कृत्य घर की चारदीवारी के अंदर हुआ था, या जानवरों के अंग बेचने के लिए लोगों के सामने बाहर निकाले गए थे; इस प्रकार, यह एक पूरी तरह से गुप्त कृत्य था।
बेंच ने कहा कि हालांकि राज्य में गायों को काटना प्रतिबंधित है और याचिकाकर्ता के कृत्य को 'यूपी गो-वध निवारण अधिनियम' का उल्लंघन माना जा सकता है, लेकिन यह निर्विवाद तथ्य है कि कथित घटना घर की चारदीवारी के अंदर ही हुई थी।
बेंच ने कहा,
"...कथित घटना घर की चारदीवारी के अंदर हुई थी, न कि किसी सार्वजनिक स्थान पर। उपरोक्त के परिणामस्वरूप, न तो कोई हिंसा हुई, न ही सार्वजनिक शांति और व्यवस्था में कोई बाधा आई, और न ही सांप्रदायिक सौहार्द में कोई खलल पड़ा।"
इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कि हिरासत का आदेश न तो कानून की नज़र में और न ही तथ्यों के आधार पर सही ठहराया जा सकता है, बेंच ने हिरासत के आदेश को, और उसके बाद राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए पुष्टि आदेश को भी रद्द कर दिया।
Case title - Isham @ Isam vs. State Of Up And 5 Others 2026 LiveLaw (AB) 298