कर्जदार के डिफॉल्ट पर बैंक सीधे गारंटर से कर सकता है वसूली, पहले मुख्य कर्जदार के खिलाफ कार्रवाई जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-08-11 12:20 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि मुख्य कर्जदार के कर्ज चुकाने में डिफॉल्ट करने पर बैंक को पहले उसके खिलाफ अपने सभी वसूली उपाय समाप्त करना जरूरी नहीं है। बैंक सीधे गारंटर के खिलाफ भी वसूली की कार्रवाई कर सकता है।

जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 128 का हवाला देते हुए कहा कि गारंटर की देनदारी मुख्य कर्जदार की देनदारी के समान और सह-विस्तृत होती है। इसका अर्थ है कि गारंटर उतनी ही राशि के लिए जिम्मेदार है, जितनी राशि के लिए मुख्य कर्जदार जिम्मेदार है, जब तक गारंटी के अनुबंध में इसके विपरीत कोई शर्त न हो।

अदालत ने कहा,

गारंटर उस पूरी राशि के लिए उत्तरदायी है जिसके लिए मुख्य कर्जदार उत्तरदायी है। उसकी देनदारी न तो उससे अधिक है और न कम जब तक गारंटी के अनुबंध में अन्यथा प्रावधान न हो। यह संयुक्त और पृथक दोनों रूप से लागू होने वाली देनदारी है और लेनदार किसी एक या दोनों के खिलाफ एक साथ कार्रवाई कर सकता है।”

खंडपीठ ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश पोस्टल प्राइमरी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड से कर्ज लेने वाले एक कर्मचारी के दो सहकर्मियों द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए की।

दोनों याचिकाकर्ताओं ने अपने सहकर्मी के कर्ज के लिए गारंटर बनने के बाद बैंक द्वारा उनके वेतन से हर महीने 10 हजार रुपये काटकर वसूली करने के प्रस्ताव को चुनौती दी थी।

मामले के अनुसार मुख्य कर्जदार विक्रांत दुबे ने वर्ष 2022-23 में बैंक से तीन अलग-अलग कर्ज लिए थे। इनमें 50 हजार रुपये का त्योहार कर्ज, 3 लाख रुपये का अल्पकालिक कर्ज और 18 लाख रुपये का व्यक्तिगत कर्ज शामिल था। कर्ज की किस्तों का भुगतान नहीं होने पर बैंक ने मुख्य कर्जदार के खिलाफ वसूली की कार्रवाई शुरू की और साथ ही दोनों गारंटरों से भी बकाया राशि की वसूली की प्रक्रिया शुरू की।

बैंक ने डाक विभाग को पत्र भेजकर दोनों याचिकाकर्ताओं के वेतन से प्रति व्यक्ति हर महीने 10 हजार रुपये काटकर बकाया कर्ज की वसूली करने का अनुरोध किया। इसके खिलाफ दोनों कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का रुख किया।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि बैंक को पहले मुख्य कर्जदार के खिलाफ उपलब्ध सभी उपाय आजमाने चाहिए थे और उसके बाद भी यदि कोई राशि बकाया रह जाती, तभी गारंटरों से वसूली की जा सकती थी। उनका कहना था कि मुख्य कर्जदार और गारंटरों से एक साथ वसूली करना गारंटी की कानूनी अवधारणा के विपरीत है।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के राम किशुन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का भी हवाला दिया। उन्होंने 6 मार्च 2026 को जारी एक पत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि संबंधित अधिकारी ने बैंक से पूछा था कि मुख्य कर्जदार से वसूली क्यों नहीं की जा रही है और यह भी संकेत दिया था कि मुख्य कर्जदार की स्थिति स्पष्ट होने तक गारंटरों से वसूली उचित नहीं होगी। इसके बावजूद बैंक ने 15 अप्रैल 2026 को दोनों याचिकाकर्ताओं के वेतन से हर महीने 10 हजार रुपये काटने की मांग की।

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 128 के तहत गारंटर की देनदारी तत्काल और पूर्ण होती है, हालांकि वह गारंटी अनुबंध की शर्तों के अधीन रहती है। यह देनदारी मुख्य कर्जदार की देनदारी के समान होती है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के बैंक ऑफ बिहार लिमिटेड बनाम डॉ. दामोदर प्रसाद, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम इंडेक्सपोर्ट रजिस्टर्ड और इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड बनाम बिस्वनाथ झुनझुनवाला के फैसलों का भी हवाला दिया। इन फैसलों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि लेनदार के लिए मुख्य कर्जदार के खिलाफ पहले अपने सभी उपाय समाप्त करना आवश्यक नहीं है।

अदालत ने कहा,

“लेनदार मुख्य कर्जदार के खिलाफ अपने उपाय पहले समाप्त किए बिना भी गारंटर के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।”

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की ओर से राम किशुन मामले पर भरोसा किए जाने को भी खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा कि उस फैसले में भी यह सिद्धांत स्पष्ट किया गया था कि गारंटर तब तक अपने खिलाफ वसूली की कार्रवाई को नहीं रोक सकता, जब तक लेनदार मुख्य कर्जदार के खिलाफ अपने उपाय समाप्त न कर दे।

खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को उनके लिए ही नुकसानदेह बताते हुए कहा कि जिस फैसले पर उन्होंने भरोसा किया, वह वास्तव में उनके ही खिलाफ जाता है।

अदालत ने कहा,

याचिकाकर्ताओं को इस आधार पर उनके खिलाफ डिक्री के निष्पादन को रोकने का कोई अधिकार नहीं है कि बैंक ने अभी मुख्य कर्जदार के खिलाफ अपना उपाय समाप्त नहीं किया है। यह देखना गारंटर का काम है कि मुख्य कर्जदार ने भुगतान किया है या नहीं, लेनदार का नहीं।”

हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों याचिकाकर्ताओं ने स्वेच्छा से मुख्य कर्जदार द्वारा लिए गए कर्ज के लिए गारंटी दी थी। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई दस्तावेज नहीं था जिससे यह साबित हो कि गारंटी अनुबंध में गारंटरों की देनदारी को बाद के चरण के लिए टाला गया था या बैंक के लिए पहले मुख्य कर्जदार के खिलाफ कार्रवाई करना अनिवार्य बनाया गया।

अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में बैंक को गारंटरों के वेतन से मासिक कटौती के जरिए बकाया राशि वसूलने का पूरा अधिकार है। 6 मार्च 2026 को जारी अधिकारी के पत्र के संबंध में भी हाईकोर्ट ने कहा कि वह पत्र वैधानिक देनदारी और सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले से तय कानून को नहीं बदल सकता।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि 15 अप्रैल 2026 को वेतन से वसूली का प्रस्ताव जारी करने से पहले उन्हें व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, इसलिए यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

हाईकोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि उनकी देनदारी सीधे गारंटी के अनुबंध से उत्पन्न होती है और संविदा अधिनियम की धारा 128 के तहत मुख्य कर्जदार की देनदारी के समान है।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास अपनी देनदारी चुकाने या उचित दीवानी उपाय अपनाने के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं और रिट याचिका के जरिए संविदात्मक तथा वैधानिक देनदारी से बचा नहीं जा सकता।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि गारंटर बैंक की देनदारी चुका देते हैं तो वे मुख्य कर्जदार के खिलाफ कानून के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं और उससे राशि की वसूली या योगदान की मांग कर सकते हैं। लेकिन वे बैंक को गारंटी लागू करने से नहीं रोक सकते।

अंततः हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि दोनों कर्मचारियों के वेतन से हर महीने 10 हजार रुपये की कटौती कर बैंक द्वारा कर्ज की वसूली करना कानूनी रूप से उचित है

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