फर्जी तरीके से पैदा की गई अल्पकालिक रिक्ति पर नियुक्ति को नियमितीकरण का लाभ नहीं दिया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-08-11 12:38 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी शिक्षक की नियुक्ति जिस अल्पकालिक रिक्ति पर की गई, वह रिक्ति ही फर्जी तरीके से पैदा की गई हो, तो उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अधिनियम, 1982 की धारा 33-एफ के तहत ऐसी नियुक्ति को नियमितीकरण का लाभ नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने कहा कि कानून का सहारा लेकर किसी अवैध या धोखाधड़ी से हासिल नियुक्ति को वैध नहीं बनाया जा सकता।

चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कथित अल्पकालिक रिक्ति का पैदा होना और उस पर शिक्षक की नियुक्ति, दोनों ही फर्जी और गैरकानूनी पाए गए हैं। ऐसी स्थिति में अदालत किसी गलत काम करने वाले व्यक्ति को केवल किसी वैधानिक प्रावधान के आधार पर लाभ नहीं दे सकती।

अदालत ने कहा,

“अल्पकालिक रिक्ति का उत्पन्न होना और उस पर अपीलकर्ता की नियुक्ति, दोनों ही फर्जी और गैरकानूनी थे। ऐसा कोई कानून नहीं हो सकता कि अदालत किसी गैरकानूनी या फर्जी तरीके से रिक्ति पैदा करने और उसे भरने के मामले को नजरअंदाज कर केवल संबंधित प्रावधान के आधार पर गलत काम करने वाले व्यक्ति को लाभ दे।”

मामला बागपत जिले के मान्यता प्राप्त एवं सहायता प्राप्त शास्त्री स्मारक इंटर कॉलेज, अहमद शाहपुर से जुड़ा था।

अपीलकर्ता का दावा था कि एलटी ग्रेड के सहायक अध्यापक वेद प्रकाश हरित 9 सितंबर 1992 से दो वर्ष के अवैतनिक अवकाश पर चले गए। इससे अल्पकालिक रिक्ति पैदा हुई और तत्कालीन अधिकृत नियंत्रक ने 24 नवंबर 1992 को आवेदन आमंत्रित किए।

इसके बाद अपीलकर्ता की 18 दिसंबर 1992 को नियुक्ति कर दी गई। उसका दावा था कि जिला विद्यालय निरीक्षक, बागपत की स्वीकृति भी मानी गई। वेतन नहीं मिलने पर उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने जिला विद्यालय निरीक्षक को नियुक्ति की स्वीकृति के संबंध में निर्णय लेने का निर्देश दिया और तब तक अपीलकर्ता को काम करते रहने की अनुमति दी।

23 मई 1995 को तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक एस.एस. रावत ने नियुक्ति को 1400-2300 रुपये के वेतनमान में स्वीकृति दी। यह स्वीकृति इस शर्त के साथ थी कि मूल शिक्षक के वापस आने पर अल्पकालिक रिक्ति समाप्त हो जाएगी। इसके बाद अपीलकर्ता वेतन प्राप्त करता रहा।

मामला वर्ष 2010 में अंतिम सुनवाई के लिए आया। उस समय जिला विद्यालय निरीक्षक ने हलफनामा दाखिल कर बताया कि संस्था ने वेद प्रकाश हरित के अवकाश आवेदन, सेवा पुस्तिका या वेतन बिल से संबंधित कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया था। उनके कार्यालय में भी ऐसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे। यह भी सामने आया कि अवकाश समाप्त होने के बाद हरित ने न तो ड्यूटी ज्वाइन की और न ही किसी प्रकार का आवेदन दिया।

इसी दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक एस.एस. रावत के खिलाफ 96 फर्जी नियुक्तियों में सहायता करने के आरोप सिद्ध हो चुके थे। राज्य सरकार ने 24 मार्च 2009 के आदेश के जरिए उनकी पूरी ग्रेच्युटी जब्त कर ली थी और उनकी पेंशन का आधा हिस्सा स्थायी रूप से काटने का आदेश दिया था।

हाईकोर्ट ने प्रबंधन और अपीलकर्ता को यह प्रमाण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया कि वेद प्रकाश हरित को वास्तव में राज्य के खजाने से कभी वेतन दिया गया था। अगली सुनवाई में अपीलकर्ता के वकील ने कहा कि वह जवाब दाखिल नहीं करना चाहते और याचिका निष्प्रभावी हो चुकी है।

अदालत ने पाया कि वर्ष 1991 से 1993 के वेतन बिलों में वेद प्रकाश हरित का नाम तक नहीं था। इसके आधार पर रिट अदालत ने याचिका को निष्प्रभावी मानते हुए खारिज कर दिया और अंतरिम आदेश समाप्त कर दिया।

इसके बाद अपीलकर्ता की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। एकल जज ने सेवा समाप्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए 2.16 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह राशि उस अवधि के लिए 1,000 रुपये प्रति माह के हिसाब से तय की गई, जिसमें अपीलकर्ता ने वेतन प्राप्त किया था। राशि की वसूली भू-राजस्व के बकाये की तरह किए जाने का निर्देश दिया गया। इसके खिलाफ विशेष अपील दायर की गई।

खंडपीठ ने नियुक्ति से संबंधित अभिलेखों और रिक्ति के नोटिस की जांच की। अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता आरक्षित वर्ग से नहीं था और उसे इस आधार पर चयनित किया गया कि आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार उपस्थित नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि यह स्थिति अपने आप में नियुक्ति को वैध नहीं बनाती।

अदालत को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि वेद प्रकाश हरित ने कभी राज्य के खजाने से वेतन प्राप्त किया। यहां तक कि उनके अवकाश पर जाने और वापस लौटने की तारीखों का भी कोई विश्वसनीय रिकॉर्ड नहीं था।

अदालत ने तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। उसने कहा कि उन्होंने नियुक्ति को मंजूरी देने से पहले यह तक सत्यापित नहीं किया कि वेद प्रकाश हरित नाम का कोई शिक्षक वास्तव में था भी या नहीं।

अदालत ने टिप्पणी की कि यह भी संभव है कि वेद प्रकाश हरित को केवल इस उद्देश्य से काल्पनिक रूप से सामने लाया गया हो कि किसी तरह अपीलकर्ता को नियुक्त करने के लिए अल्पकालिक रिक्ति पैदा की जा सके।

हाईकोर्ट ने सार्वजनिक रोजगार की संवैधानिक पवित्रता पर जोर देते हुए कहा कि अदालतें धोखाधड़ी, गलत प्रस्तुतीकरण या न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के जरिए हासिल की गई नियुक्तियों को संरक्षण नहीं दे सकतीं।

अदालत ने कहा,

“सार्वजनिक पद एक सार्वजनिक विश्वास है और कानून के विरुद्ध की गई प्रत्येक नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता, निष्पक्षता और पारदर्शिता के संवैधानिक आदेश पर सीधा आघात है।”

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिम आदेश से कोई स्वतंत्र अधिकार पैदा नहीं होता। अंतरिम आदेश हमेशा अंतिम निर्णय के अधीन होता है। इसलिए जब मूल रिट याचिका खारिज हो गई और अंतरिम आदेश समाप्त हो गया, तो उसके आधार पर मिले लाभ को वापस लिया जाना आवश्यक था।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के जैनेन्द्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का भी हवाला दिया, जिसमें धोखाधड़ी से हासिल नियुक्ति को नियोक्ता के विकल्प पर समाप्त किए जाने योग्य माना गया।

अदालत ने कहा कि लंबे समय तक सेवा में बने रहने से ऐसी नियुक्ति के पक्ष में कोई न्यायसंगत अधिकार या रोक पैदा नहीं होती।

हाईकोर्ट ने कहा कि रिट याचिका खारिज होने और अंतरिम आदेश समाप्त होने के बाद अपीलकर्ता की सेवा समाप्त करने के अलावा अधिकारियों के पास कोई अन्य विकल्प नहीं था। इसलिए राज्य के खजाने से प्राप्त वेतन की वसूली भी उचित थी।

अदालत ने धारा 33-एफ(4) के तहत मामले को राज्य सरकार के पास भेजने की मांग भी खारिज की। अदालत ने कहा कि जब नियुक्ति की बुनियाद ही धोखाधड़ी और गैरकानूनी तरीके से तैयार की गई रिक्ति पर आधारित हो, तो नियमितीकरण के प्रावधान का सहारा नहीं लिया जा सकता।

अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि अपीलकर्ता ने अपनी पिछली रिट याचिका में उत्तर प्रदेश सरकार को पक्षकार ही नहीं बनाया। उस मामले में केवल जिला विद्यालय निरीक्षक को पक्षकार बनाया गया था, जबकि बाद में यही अधिकारी 96 अवैध नियुक्तियों में सहायता करने के लिए दंडित हुआ था।

इस पर अदालत ने कहा कि यह तथ्य भी दर्शाता है कि अपीलकर्ता राज्य सरकार की अनुपस्थिति में अपने पक्ष में फैसला हासिल करने का प्रयास कर रहा था और वह अपने उद्देश्य में लगभग सफल भी हो गया।

खंडपीठ ने अंततः नियुक्ति को उसकी जड़ से ही गैरकानूनी मानते हुए न केवल नियमितीकरण का लाभ देने से इनकार किया, बल्कि वेतन की वसूली के खिलाफ राहत देने से भी इनकार किया। अदालत ने दोनों अपीलों को खारिज किया।

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