पांच साल पहले खत्म हो चुका था प्रधान का कार्यकाल, फिर भी हटाने के लिए जांच बैठाई: हाईकोर्ट ने हरदोई डीएम को किया तलब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हरदोई के जिलाधिकारी (DM) अनुनय झा को व्यक्तिगत रूप से तलब करते हुए पूछा कि जिस ग्राम प्रधान का कार्यकाल पांच साल से अधिक पहले समाप्त हो चुका है, उसे पद से हटाने के लिए वर्ष 2026 में जांच समिति क्यों गठित की गई।
जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजिव शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश पूर्व ग्राम प्रधान के खिलाफ चल रही जांच से संबंधित जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया।
अदालत ने प्रथम दृष्टया इस पूरी कार्रवाई में अधिकारियों द्वारा मामले के तथ्यों पर ध्यान न देने और बिना सोचे-समझे कार्रवाई किए जाने पर गंभीर नाराजगी जताई।
अदालत ने पाया कि जिस ग्राम प्रधान के खिलाफ पद से हटाने की कार्यवाही की जा रही थी उसका कार्यकाल 25 दिसंबर 2020 को ही समाप्त हो चुका था। इसके बावजूद हरदोई के जिलाधिकारी ने 16 मई 2026 को उसके खिलाफ अंतिम जांच के लिए जांच समिति गठित की।
हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि जब संबंधित व्यक्ति अब ग्राम प्रधान ही नहीं है तो उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 95(1)(जी) और उत्तर प्रदेश पंचायत राज (प्रधानों, संचालकों और सदस्यों को हटाने की जांच) नियमावली, 1997 के तहत उसके खिलाफ पद से हटाने की कार्यवाही आखिर किस उद्देश्य से की जा रही है।
अदालत ने कहा,
“हम यह समझने में असमर्थ हैं कि 1997 की नियमावली के तहत कार्यवाही किस आधार और किस उद्देश्य से की जा रही है, जबकि जिस प्रधान के खिलाफ यह कार्यवाही चल रही है उसका कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका है।”
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जिला पंचायत राज अधिकारी से स्पष्ट रूप से पूछा था कि यह कार्यवाही किन प्रावधानों के तहत की जा रही है। अधिकारी ने बताया कि कार्यवाही पंचायत राज अधिनियम की धारा 95(1)(जी) और 1997 की नियमावली के तहत की जा रही है।
खंडपीठ ने यह भी गौर किया कि जिलाधिकारी द्वारा 16 मई को जांच समिति गठित करने वाले आदेश में स्वयं यह दर्ज था कि संबंधित ग्राम प्रधान का कार्यकाल समाप्त हो चुका है।
अदालत ने कहा,
“हम आश्चर्यचकित हैं कि जिलाधिकारी ने ऐसी जांच कैसे गठित की, जो केवल प्रधान को पद से हटाने के उद्देश्य से की जा सकती है, जबकि संबंधित व्यक्ति अब प्रधान ही नहीं है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि जिस तरीके से कार्यवाही शुरू की गई, उससे प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारियों ने मामले के तथ्यों और अभिलेखों पर उचित विचार नहीं किया।
खंडपीठ ने टिप्पणी की,
“ऐसा प्रतीत होता है कि सभी संबंधित अधिकारियों ने अभिलेख पर मौजूद तथ्यों पर बिना किसी विचार के कार्रवाई की।”
हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि पूर्व ग्राम प्रधान पर सरकारी धन के गबन, धन के दुरुपयोग या किसी राशि की वसूली का आरोप है, तो उसके लिए अलग कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। ऐसी स्थिति में उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 27 और संबंधित नियमों के तहत कार्यवाही की जा सकती है।
अदालत ने कहा,
“यदि ग्राम प्रधान द्वारा धन का दुरुपयोग या गबन किया गया है अथवा उससे किसी राशि की वसूली की जानी है, तो कार्यवाही उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 27 और संबंधित नियमों के तहत की जाएगी।”
खंडपीठ ने यह भी नाराजगी जताई कि अधिकारियों की इस कार्रवाई के कारण अदालत का महत्वपूर्ण न्यायिक समय ऐसी कार्यवाही पर खर्च हुआ, जिसका आधार ही प्रथम दृष्टया स्पष्ट नहीं था।
अदालत ने कहा कि वह अधिकारियों की इस तरह की बिना सोचे-समझे की गई कार्रवाई और अदालत का समय बर्बाद करने के लिए आगे और जुर्माना लगाने पर भी विचार कर रही है।
अदालत ने कहा कि यदि पूर्व प्रधान के खिलाफ कोई वास्तविक शिकायत या वसूली का मामला है तो अधिकारियों को कानून में उपलब्ध उचित प्रावधान के तहत आगे बढ़ना चाहिए।
मामले में हाईकोर्ट ने हरदोई डीएम को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि उन्होंने जांच समिति का गठन किस आधार पर और किस उद्देश्य से किया था।
अदालत में उपस्थित हरदोई के बेसिक शिक्षा अधिकारी को फिलहाल दोबारा उपस्थित होने से छूट दी गई, जब तक कि अदालत विशेष रूप से उन्हें तलब न करे।
मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर 2026 को होगी।