फ़ाइनल रिपोर्ट मंज़ूर होने से आगे की जांच नहीं रुकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-08-11 14:31 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जुडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा फ़ाइनल रिपोर्ट मंज़ूर कर लेने से जांच एजेंसी को CrPC की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच करने से नहीं रोका जा सकता।

जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने यह बात तब कही, जब उन्होंने मैनपुरी के चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती देने वाली अर्ज़ी खारिज की, जिसमें लगभग दो दशक पुराने मर्डर केस में आगे की जांच की इजाज़त दी गई।

कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि जांच के चरण में आरोपी को अपनी बात रखने का कोई अधिकार नहीं है और वह इस बात पर सवाल नहीं उठा सकता कि पुलिस आगे की जांच किस तरह से कर रही है।

मामले का संक्षिप्त विवरण

6 अगस्त 2005 को एक FIR दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि अर्ज़ी देने वाले और कई अन्य लोगों ने शिकायतकर्ता के पिता की हत्या कर दी थी और उसकी माँ को गोली मारकर घायल कर दिया था, जिनकी अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई।

हालांकि, जांच के दौरान शिकायतकर्ता ने मजिस्ट्रेट के सामने एक हलफ़नामा दायर किया, जिसमें कहा गया कि उसने घटना को नहीं देखा था और अज्ञात लोगों ने उसके माता-पिता पर गोली चलाई थी। उसने कहा कि अर्ज़ी देने वाले और अन्य लोगों को गलत तरीके से फंसाया गया।

बाद में उसका और उसकी बहन का बयान CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज किया गया, जिसमें उन्होंने कहा कि अर्ज़ी देने वाले ने हत्या नहीं की थी और उन्हें नहीं पता कि उनके माता-पिता की हत्या किसने की थी।

अर्ज़ी देने वाले के खिलाफ कोई सबूत न मिलने पर जांच अधिकारी ने फरवरी 2006 में एक फ़ाइनल रिपोर्ट सौंपी। सक्षम कोर्ट ने अप्रैल 2006 में रिपोर्ट मंज़ूर की।

लगभग दो दशक बाद शिकायतकर्ता ने आगे की जांच की मांग करते हुए मैनपुरी के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस से संपर्क किया। इसके बाद पुलिस ने आगे की जांच करने की इजाज़त मांगी।

हालांकि, चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट ने 5 अगस्त 2025 को आदेश पारित किया, जिसमें कहा गया कि CrPC की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच के लिए मजिस्ट्रेट की इजाज़त की ज़रूरत नहीं है। इसलिए जांच अधिकारी ने सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के निर्देश पर आगे की जांच शुरू की।

इस आगे की जांच को चुनौती देते हुए अर्ज़ी देने वाले ने हाई कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि फ़ाइनल रिपोर्ट मंज़ूर होने के बाद मामला पहले ही अंतिम रूप ले चुका था और कार्यवाही को अंतहीन रूप से जारी रखने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। यह तर्क दिया गया कि बिना किसी नई जानकारी या सबूत के 20 साल बाद किसी केस को फिर से खोलना असल में दोबारा जांच या नए सिरे से जांच (de-novo investigation) है, जिसकी कानून में इजाज़त नहीं है।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि पुलिस खुद से (suo motu) जांच फिर से शुरू नहीं कर सकती। इस मामले में उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया, जिनमें प्रमोद कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) और विनय त्यागी बनाम इरशाद अली (2012) शामिल हैं।

दूसरी ओर, राज्य ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि क्लोजर रिपोर्ट (मामला बंद करने की रिपोर्ट) दाखिल करने और कोर्ट द्वारा उसे स्वीकार कर लेने के बाद भी CrPC की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच करने पर कोई रोक नहीं है।

यह भी बताया गया कि रिकॉर्ड में नई जानकारी/सबूत लाए गए और पुलिस ने आगे की जांच के लिए संबंधित कोर्ट से संपर्क किया।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

CrPC की धारा 173(8) और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, जैसे विनय त्यागी (2012), विनूभाई हरिभाई मालविया (2019), राजस्थान राज्य बनाम अरुणा देवी (1994), के. चंद्रशेखर बनाम केरल राज्य (1998) और अन्य मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि फाइनल रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद भी आगे की जांच कानूनी रूप से की जा सकती है।

कोर्ट ने खास तौर पर यह निष्कर्ष निकाला:

"CrPC की धारा 173(2) के तहत दाखिल फाइनल रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद CrPC की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच करने पर कोई रोक नहीं है।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि आगे की जांच शुरू करने से पहले यह ज़रूरी नहीं है कि संबंधित कोर्ट फाइनल रिपोर्ट स्वीकार करने वाले आदेश को वापस ले या उसकी समीक्षा करे।

हालांकि, जस्टिस सिंह ने यह भी साफ़ किया कि भले ही पुलिस के लिए आगे की जांच करने से पहले कोर्ट को बताना और औपचारिक अनुमति लेना बेहतर होता है। फिर भी CrPC की धारा 173(8) के तहत पुलिस के पास आगे की जांच करने की कानूनी शक्ति बनी रहती है।

केस के तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट ने पाया कि यह मामला बिना किसी नई जानकारी या सबूत के जांच को फिर से शुरू करने की कोशिश मात्र नहीं थी।

बेंच ने ध्यान दिया कि शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि घटना के समय वह और उसके भाई-बहन नाबालिग थे और उन्हें आरोपियों ने बंधक बनाकर रखा था। यह भी आरोप लगाया गया कि उन्हें कई हलफनामों/कागज़ों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया। हालांकि वे घटनास्थल पर मौजूद थे, लेकिन पुलिस ने उनके बयान दर्ज नहीं किए।

इन अहम दावों पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता की अर्जी के बाद "नई जानकारी और सबूत रिकॉर्ड पर लाए गए"। इसलिए कोर्ट की राय थी कि CrPC की धारा 173(8) के तहत जांच आगे बढ़ाई जा सकती है, जो आगे की जांच (Further Investigation) का प्रावधान करती है, न कि दोबारा जांच (Re-Investigation) का।

कोर्ट ने इस सवाल पर भी विचार किया कि क्या आरोपी जांच के चरण में आगे की जांच को चुनौती दे सकते हैं।

यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम डब्ल्यू.एन. चड्ढा 1992 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि CrPC के अध्याय XII के तहत, जब पुलिस जांच कर रही होती है, तो आरोपी को पहले से सूचना पाने या सुनवाई का कोई सामान्य अधिकार नहीं होता है।

बेंच ने साफ़ किया,

"इसलिए यह बिल्कुल स्पष्ट है कि जांच के चरण में आरोपी को अपनी बात रखने का कोई अधिकार नहीं है।"

इसलिए कोर्ट ने पाया कि आगे की जांच को चुनौती देने वाली अर्जी "गलतफहमी पर आधारित" थी।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने विवादित आदेश पारित करने में कोई गैर-कानूनी काम नहीं किया और BNSS की धारा 528 के तहत दी गई अर्जी में कोई दम नहीं था। तदनुसार, कोर्ट ने अर्जी खारिज की।

साथ ही कोर्ट ने जांच अधिकारी से यह सुनिश्चित करने की अपेक्षा की कि आगे की जांच "निष्पक्ष, विवेकपूर्ण और पारदर्शी तरीके से" की जाए।

Case Title - Anurag Dubey @ Dabban vs State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 570

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