इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गैर-जमानती वारंट जारी होने के बावजूद आरोपी को अदालत में पेश नहीं किए जाने पर मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) BBGTS मूर्ति को शाम 4 बजे तक अदालत में मौजूद रहने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि वारंट के निष्पादन में SSP के अधीनस्थ अधिकारियों की लापरवाही नजर आती है लेकिन वारंट तामील कराने के लिए जिम्मेदार अधिकारी होने के नाते आरोपी की हाईकोर्ट में उपस्थिति सुनिश्चित करना उनकी भी जिम्मेदारी थी।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने SSP के खिलाफ प्रतिकूल आदेश पारित करने के बजाय उन्हें शाम 4 बजे तक अदालत में रहने और भविष्य में अधिक सतर्क रहने का निर्देश दिया।

मामले में आरोपी को हाईकोर्ट में पेश करने के बजाय मेरठ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के समक्ष पेश किया गया। CJM ने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया लेकिन हाईकोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश नहीं दिया। हाईकोर्ट ने CJM के इस आचरण पर भी आपत्ति जताई और उनके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई करने के लिए मामला प्रशासनिक जज के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि यह घटना मेरठ के CJM की गंभीर लापरवाही और अनुशासनहीनता को दर्शाती है। अदालत ने अपने आदेश में निर्देश दिया कि आदेश की प्रति मेरठ के प्रशासनिक जज के समक्ष आगे की प्रशासनिक कार्रवाई के लिए प्रस्तुत की जाए।

हाईकोर्ट एक महिला की ओर से दायर जमानत रद्द करने की अर्जी पर सुनवाई कर रहा है। महिला ने आरोपी को 18 मार्च, 2026 को दी गई जमानत रद्द करने की मांग की थी। आरोपी को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 और 115(2) तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) की धारा 3(2)(5) के तहत दर्ज मामले से जुड़ी आपराधिक अपील में जमानत दी गई। BNS की धारा 69 छलपूर्ण साधनों से यौन संबंध बनाने से संबंधित अपराध से जुड़ी है।

जमानत प्राप्त करते समय आरोपी ने हाईकोर्ट की समकक्ष पीठ के समक्ष आश्वासन दिया कि रिहा होने के बाद वह आवेदक महिला से शादी करेगा। हालांकि, आरोपी ने अपने आश्वासन का पालन नहीं किया, जिसके बाद महिला ने उसकी जमानत रद्द करने की मांग की।

आरोपी के पहले अदालत में उपस्थित नहीं होने पर हाईकोर्ट ने 28 सितंबर, 2026 को उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया और उसे हाईकोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया। वारंट के निष्पादन के लिए मेरठ के SSP को भेजा गया।

हाईकोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए SSP ने बताया कि वह 28 सितंबर से 2 अक्टूबर तक अवकाश पर थे। उन्होंने कहा कि 3 अक्टूबर को काम पर लौटने के बाद संबंधित थाना प्रभारी को वारंट तत्काल तामील कराने का निर्देश दिया।

वारंट तामील होने के बाद आरोपी को मेरठ के CJM के सामने पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। SSP ने स्वीकार किया कि उनके अधीनस्थ अधिकारियों से लापरवाही हुई। उन्हें CJM के समक्ष आवेदन देकर आरोपी को हाईकोर्ट में पेश कराने का अनुरोध करना चाहिए था।

इन दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मेरठ SSP के अधीनस्थ अधिकारियों की ओर से लापरवाही हुई प्रतीत होती है लेकिन गैर-जमानती वारंट के निष्पादन के लिए SSP स्वयं जिम्मेदार अधिकारी हैं। इसलिए यह सुनिश्चित करना उनका कर्तव्य था कि आरोपी हाईकोर्ट के समक्ष पेश हो।

कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि CJM, मेरठ ने आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया जबकि उन्हें पता था कि हाईकोर्ट ने विशेष रूप से आरोपी को अपने सामने पेश करने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी किया।

हाईकोर्ट ने आरोपी के अदालत में पेश होने और जमानत लेते समय महिला से शादी करने के आश्वासन के बावजूद उससे विवाह करने से इनकार करने के बाद उसकी जमानत रद्द की। कोर्ट ने SSP को निर्देश दिया कि आरोपी को तत्काल हिरासत में लेकर न्यायिक हिरासत के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाए। साथ ही आवेदक महिला को नए सिरे से जमानत अर्जी दाखिल करने की स्वतंत्रता दी गई।

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