इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' के तहत 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्राधिकरण' (LARRA) का अवॉर्ड एक 'डीम्ड डिक्री' (मान ली गई डिक्री) होता है, जिसे ज़िला अदालत लागू कर सकती है।

जस्टिस जसप्रीत सिंह ने कहा कि इसे लागू करने वाली ज़िला अदालत केवल इसे लागू करने वाली एजेंसी के तौर पर काम करती है और अवॉर्ड के मेरिट पर आपत्तियों पर विचार नहीं कर सकती या उसके पीछे नहीं जा सकती, चाहे वह 'सिविल प्रक्रिया संहिता' (CPC) की धारा 47 के तहत हो या 'ऑर्डर XXI CPC' के न्यायिक प्रावधानों के तहत। कोर्ट ने यह भी कहा कि LARRA अवॉर्ड को लागू करने के मकसद से ज़िला अदालत पर अधिनियम की धारा 63 के तहत सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र की रोक लागू नहीं होती।

यह निष्कर्ष अनुच्छेद 227 के तहत 45 याचिकाओं के एक समूह में सामने आया, जिसमें सशस्त्र सीमा बल (जिसे SSB या 'ज़रूरत वाली संस्था' कहा गया), उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण और लखनऊ विकास प्राधिकरण ने LARRA की अपने अवॉर्ड खुद लागू करने की क्षमता को चुनौती दी, जबकि तीन ज़मीन मालिकों ने उसके पास लंबित अपने निष्पादन मामलों में तेज़ी लाने की मांग की।

जस्टिस जसप्रीत सिंह ने कहा कि LARRA के पास अपना अवॉर्ड लागू करने की कोई शक्ति नहीं है। फिर उन्होंने इस बात पर विचार किया कि ऐसे अवॉर्ड के धारक को कहाँ जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि भले ही अधिनियम में लागू करने की शक्ति का ज़िक्र नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अवॉर्ड धारक के पास कोई उपाय नहीं है। अवॉर्ड एक 'डीम्ड डिक्री' का दर्जा हासिल कर लेता है, उसी तरह लागू करने योग्य हो जाता है, और इसे सक्षम अधिकार क्षेत्र वाली अदालत - यानी ज़िला अदालत - द्वारा लागू किया जाना है, जिसके पास डिक्री को लागू कराने के लिए ज़बरदस्ती करने की शक्तियों सहित न्यायिक और कानूनी साधन मौजूद हैं।

"यह भी स्पष्ट किया जा सकता है कि अवॉर्ड को लागू करने की हकदार ज़िला अदालत, 'मूल सिविल अधिकार क्षेत्र की प्रधान अदालत' यानी ज़िला जज की अदालत होगी।"

चूंकि LARRA में डिस्ट्रिक्ट जज के रैंक का कोई ज्यूडिशियल ऑफिसर या कम से कम सात साल के अनुभव वाला कोई वकील होता है, इसलिए कोर्ट ने माना कि इसके अवॉर्ड को उसी स्तर और ग्रेड की कोर्ट लागू करेगी, न कि डिस्ट्रिक्ट जज से नीचे की कोई कोर्ट। उस कोर्ट की शक्तियों के दायरे पर कोर्ट ने कहा कि डिक्री का दर्जा मिलने से अवॉर्ड को लागू करने के लिए डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में ले जाया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

“इस स्टेज पर यह साफ़ करना भी ज़रूरी है कि भले ही अवॉर्ड को डिक्री का दर्जा मिल जाए और ज़रूरत पड़ने पर उसे लागू करने के लिए डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में पेश किया जा सके, लेकिन डिक्री लागू करने वाली कोर्ट सिर्फ़ लागू करने का काम करती है। वह खुद को सिर्फ़ लागू करने तक ही सीमित रखती है और CPC के तहत 'एक्जीक्यूटिंग कोर्ट' (लागू करने वाली कोर्ट) की न्यायिक शक्तियों और भूमिका को नहीं अपनाती। इसलिए डिक्री लागू करने वाली कोर्ट LARRA के अवॉर्ड के गुण-दोष (Merits) पर सवाल नहीं उठाएगी, न ही उसके पीछे जाकर या CPC की धारा 47 या CPC के ऑर्डर XXI जैसे प्रावधानों के आधार पर कोई चुनौती स्वीकार करेगी।”

कोर्ट ने माना कि ज़्यादा से ज़्यादा, लागू करने वाली कोर्ट उन प्रावधानों के प्रक्रियात्मक उल्लंघन पर विचार कर सकती है, जिनका इस्तेमाल वह खुद अवॉर्ड को लागू करने के लिए करती है। हालाँकि, कोर्ट ने यह भी माना कि लागू करने वाली कोर्ट किसी ऐसे ठोस (Substantive) आधार पर आपत्ति नहीं सुन सकती जो LARRA के निर्णय (Adjudication) पर असर डालता हो; अवॉर्ड को सिर्फ़ 2013 के एक्ट में दी गई अपील की प्रक्रिया के ज़रिए ही चुनौती दी जा सकती है।

कोर्ट ने आगे कहा,

“इस तरह 2013 के एक्ट के तहत, जब अवॉर्ड को 'डीम्ड डिक्री' (मान ली गई डिक्री) का दर्जा मिल जाता है और उसे लागू करने के लिए डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में पेश किया जाता है तो डिस्ट्रिक्ट कोर्ट को सिर्फ़ उसे लागू करने का काम करना होता है, उसमें निर्णय लेने (Adjudicate) की शक्ति शामिल नहीं होती।”

कोर्ट ने कहा कि जब निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रक्रियात्मक तकनीकी बारीकियों से मुक्त रखा गया तो उसे लागू करने की प्रक्रिया पर CPC के ऑर्डर XXI की पूरी सख्ती लागू करना बेतुका होगा।

कोर्ट ने कहा,

“इसके अलावा, जहाँ 2013 के एक्ट के तहत रेफरेंस की कार्यवाही (प्रक्रिया के अनुसार) संक्षिप्त प्रकृति की होती है, तो यह कहना विरोधाभासी होगा कि निष्पादन (Execution) के लिए Order XXI CPC के सभी कड़े नियम लागू होंगे। इससे ऐसी स्थिति पैदा होगी कि नए एक्ट से एक हाथ से जो हासिल हुआ, वह दूसरे हाथ से अवार्ड को प्रक्रिया के सभी औपचारिक और तकनीकी नियमों के अधीन करके गंवा दिया जाए। निश्चित रूप से, कानून का इरादा यह नहीं हो सकता।”

इसलिए कोर्ट ने उन संस्थाओं के वकील की दलील को खारिज किया, जिन्होंने कहा कि जब अवार्ड को निष्पादन के लिए सिविल कोर्ट भेजा जाएगा तो वह कोर्ट सीपीसी धारा 47 के तहत आपत्तियों पर विचार करके उसे निष्पादित करेगा। कोर्ट ने कहा कि एक्ट की योजना में ऐसी कोई परिकल्पना नहीं की गई।

कोर्ट ने आगे कहा,

“इसके अलावा, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट द्वारा निष्पादन के दौरान अवार्ड को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाली किसी भी आपत्ति पर विचार करना अधिकार क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन होगा, जो स्वीकार्य नहीं है। इसलिए इससे निष्पादन करने वाले कोर्ट की कार्रवाई कानून के विपरीत हो जाएगी और यह 2013 के एक्ट के धारा 63 के दायरे में आ जाएगी।”

धारा 63 में लगी रोक पर कोर्ट ने कहा कि यह सीमित है और केवल उन मामलों पर लागू होती है, जिन पर धारा 51 और 64 के तहत LARRA का विशेष अधिकार क्षेत्र है। यह LARRA द्वारा पारित अवार्ड को निष्पादित करने के उद्देश्य से डिस्ट्रिक्ट कोर्ट पर लागू नहीं होती है।

कोर्ट ने आगे कहा कि अंतिम रूप से पारित अवार्ड रखने वाला ज़मीन मालिक केवल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के समक्ष निष्पादन तक ही सीमित नहीं है। यह देखते हुए कि संविधान के अनुच्छेद 300-A द्वारा मान्यता प्राप्त संपत्ति के मामले में नागरिक के पास महत्वपूर्ण अधिकार हैं, कोर्ट ने कहा कि ज़मीन की मांग करने वाली संस्था खुद अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' की परिभाषा में आ सकती है, और मुआवज़ा देने के मामले में राज्य और उसकी संस्थाओं को कोई विशेष दर्जा नहीं मिलता है।

कोर्ट ने कहा,

“एक्ट के इस उद्देश्य को पूरा करते समय यह नहीं माना जा सकता कि निर्णय तो तेज़ी से हो जाए, लेकिन जब भुगतान का समय आए तो ज़मीन मालिकों को एक फोरम से दूसरे फोरम तक दौड़ाकर अवार्ड के निष्पादन या प्रवर्तन में देरी की स्थिति पैदा कर दी जाए।”

कोर्ट ने यह माना कि हाई कोर्ट की शक्तियों को किसी भी एक्ट के ज़रिए कम या खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अगर ज़मीन की ज़रूरत वाली संस्था उचित समय के भीतर भुगतान करने में विफल रहती है या अमल (Execution) में भी बेवजह देरी करती है, तो ज़मीन का मालिक संवैधानिक उपायों का सहारा ले सकता है।

कोर्ट ने कहा,

“इस प्रकार, एक बार जब अवार्ड (फैसला) अंतिम हो जाता है और राशि, अधिकार और दायित्व तय हो जाते हैं, तो यह अवार्ड पाने वाले के पक्ष में एक निर्विवाद अधिकार बन जाता है और उस व्यक्ति/संस्था के लिए एक पारस्परिक और निर्विवाद दायित्व बन जाता है, जिसके खिलाफ ऐसा अवार्ड लागू होता है। ऐसी परिस्थितियों में, पीड़ित व्यक्ति अवार्ड को लागू करवाने के लिए रिट याचिका दायर कर सकता है।”

विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जहां संविदात्मक दायित्वों से उत्पन्न धन के दावे राज्य के खिलाफ तय हो जाते हैं और राज्य की कार्रवाई मनमानी हो जाती है, तो कोई व्यक्ति रिट अधिकार क्षेत्र के माध्यम से अधिकार को लागू करवा सकता है। यही रास्ता 2013 के एक्ट के तहत तय अधिकारों को लागू करवाने के लिए भी खुला है।

इसके अनुसार, ज़मीन की ज़रूरत वाली संस्थाओं की याचिकाओं को स्वीकार कर लिया गया और LARRA द्वारा अपनी कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पारित आदेशों को रद्द कर दिया गया। LARRA को अपने अवार्ड्स को लागू करने से रोकने का निर्देश दिया गया। ज़मीन मालिकों द्वारा LARRA के समक्ष अपनी कार्यकारी कार्यवाही में तेज़ी लाने के लिए दायर तीन याचिकाओं को अब कोई आधार नहीं माना गया और तदनुसार उनका निपटारा कर दिया गया।

Case Title : Lucknow Development Authority through Secretary Lucknow vs. Ramrati and connected matters 2026 LiveLaw (AB) 788

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