ससुराल में पत्नी की अस्वाभाविक मौत पर पति और परिजनों को देना होगा जवाब, चुप्पी भी बन सकती है दोष साबित करने की कड़ी : इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला की ससुराल में घर के भीतर अस्वाभाविक परिस्थितियों में मृत्यु होती है और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की मजबूत श्रृंखला आरोपियों की ओर संकेत करती है तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत घर में मौजूद लोगों की जिम्मेदारी है कि वे उसकी मौत की परिस्थितियों का संतोषजनक स्पष्टीकरण दें। यदि वे ऐसा नहीं कर पाते तो यह उनके खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन जाती है।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए पति सुधाकर तथा उसके माता-पिता गौरी शंकर और मुन्नी देवी की अपीलें खारिज कर दीं। तीनों को निचली अदालत ने वर्ष 2017 में अपनी बहू की हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
मामले के अनुसार 10 मई 2015 को मृतका के पिता ने प्राथमिकी दर्ज कर आरोप लगाया कि दहेज में एक लाख रुपये और पल्सर मोटरसाइकिल की मांग पूरी नहीं होने पर उसकी बेटी की हत्या कर दी गई।
हालांकि मुकदमे के दौरान मृतका के पिता और उसके भाइयों सहित सभी नौ प्रमुख गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए। यहां तक कि मृतका के पिता ने अदालत में अपनी ही FIR से इनकार करते हुए दावा किया कि बाद में उन्हें पता चला कि कुछ अज्ञात बदमाशों ने उनकी बेटी की हत्या की थी।
इसके बावजूद निचली अदालत ने मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर तीनों आरोपियों को हत्या का दोषी ठहराया। हालांकि, दहेज मृत्यु के आरोप से उन्हें बरी कर दिया गया।
हाईकोर्ट में अपील के दौरान आरोपियों ने तर्क दिया कि यह साबित नहीं हुआ कि मृतका की गला दबाकर हत्या की गई। उनका कहना था कि उसकी मौत फांसी लगाने से भी हो सकती थी।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि शव परीक्षण रिपोर्ट में गर्दन पर लगातार क्षैतिज निशान, त्वचा के नीचे रक्तस्राव और दाईं ओर हायॉइड हड्डी का टूटा होना गला दबाकर हत्या किए जाने के स्पष्ट संकेत हैं। इसके अलावा शरीर पर छह अन्य चोटें भी थीं जो मौत से पहले हुए हिंसक संघर्ष की ओर इशारा करती हैं।
अदालत ने यह दलील भी खारिज की कि कुछ अज्ञात बदमाश घर में घुसे और केवल मृतका की हत्या कर चले गए। पीठ ने कहा कि यदि ऐसा होता तो घर में मौजूद पति और सास-ससुर पूरी तरह सुरक्षित कैसे रह गए। साथ ही यह भी कोई कारण नहीं बताया गया कि बदमाश बिना चोरी या डकैती किए केवल बहू की हत्या क्यों करते।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि पूरी घटनाक्रम की जानकारी घर में मौजूद पति और सास-ससुर के विशेष ज्ञान में थी। इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत उन पर यह दायित्व था कि वे महिला की अस्वाभाविक मौत का कारण बताएं।
अदालत ने कहा,
"इन परिस्थितियों में आरोपियों पर यह दायित्व था कि वे बताएं कि ससुराल के घर के भीतर मृतका की इतनी हिंसक मृत्यु कैसे हुई। लेकिन उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत अपने बयान में भी इसका कोई संकेत तक नहीं दिया। यह उनके खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की एक निर्णायक कड़ी है।"
पीठ ने आगे कहा,
"आरोपियों ने यह बताने का कोई प्रयास नहीं किया कि मृतका की अस्वाभाविक अथवा हिंसक मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई। अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के साथ इसे देखने पर यही अपरिहार्य निष्कर्ष निकलता है कि मृतका की हत्या इन्हीं आरोपियों ने की।"
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में कोई त्रुटि नहीं पाई और सभी अपीलें खारिज कर दीं। साथ ही जमानत पर चल रहे मृतका के सास और ससुर को तत्काल आत्मसमर्पण कर आजीवन कारावास की सजा भुगतने का निर्देश दिया।