FIR दर्ज होने से पुलिसकर्मी की विभागीय जांच नहीं रुकेगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ उसी घटना को लेकर FIR दर्ज होने मात्र से विभागीय जांच पर रोक नहीं लगती। आपराधिक मामला और विभागीय कार्रवाई अलग-अलग उद्देश्यों के लिए हैं और दोनों समानांतर चल सकते हैं।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की पीठ ने एक सब-इंस्पेक्टर की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अधिकारी पर पुलिस हिरासत में मौजूद आरोपी बदन सिंह उर्फ बड्डो के फरार होने के मामले में लापरवाही का आरोप था।
अधिकारी पांच पुलिसकर्मियों की एस्कॉर्ट टीम का प्रभारी था। आरोपी को गाजियाबाद कोर्ट में पेश करने के बाद वापसी के दौरान टीम निर्धारित रास्ते से हटकर मेरठ के मुकुट महल होटल पहुंची, जहां आरोपी अपने साथियों की मदद से फरार हो गया।
इसके बाद अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज हुई और विभागीय जांच भी शुरू की गई। जांच में लापरवाही और अनुशासनहीनता साबित होने पर उसे 31 जुलाई 2020 को बर्खास्त कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में यह तय होगा कि अधिकारी किसी अपराध या साजिश में शामिल था या नहीं, जबकि विभागीय जांच का उद्देश्य यह देखना है कि उसने ड्यूटी के दौरान लापरवाही या कदाचार किया या नहीं।
कोर्ट ने U.P. Police Regulations के Paragraph 489 और 1991 के सेवा नियमों का हवाला देते हुए कहा कि FIR या आपराधिक मुकदमा लंबित होने के बावजूद विभागीय कार्रवाई जारी रखी जा सकती है।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि 1991 के नियमों के तहत जांच अधिकारी सजा की सिफारिश कर सकता है, जबकि अंतिम निर्णय अनुशासनिक प्राधिकारी को स्वतंत्र रूप से लेना होगा।
इन आधारों पर कोर्ट ने विभागीय कार्रवाई में कोई कानूनी खामी नहीं पाई और पुलिस अधिकारी की याचिका खारिज कर दी।