इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सहायता प्राप्त संस्थान में लंबे समय तक सेवा करने या बाद में प्रशासनिक स्तर पर मिली मान्यता के आधार पर कर्मचारी सरकारी खजाने से वेतन का अधिकार नहीं मांग सकता, यदि सक्षम प्राधिकारी ने मूल नियुक्ति को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था और नए सिरे से चयन का निर्देश दिया था।

जस्टिस इरशाद अली ने कहा कि सरकारी धन से वेतन के भुगतान का आदेश देने से पहले यह साबित होना जरूरी है कि जिस नियुक्ति के आधार पर वेतन का दावा किया जा रहा है, वह कानूनी रूप से वैध थी। केवल लंबे समय तक सेवा में बने रहने से नियुक्ति की मूल कानूनी खामी दूर नहीं हो जाती।

अदालत ने कहा,

“लंबे समय तक सेवा में बने रहने के सिद्धांत के आधार पर ऐसी नियुक्ति के लिए सरकारी धन से भुगतान का आदेश नहीं दिया जा सकता, जिसकी मूल वैधता ही स्थापित नहीं हुई।”

मामला गोंडा जिले के पीढ़ीन कौरिया स्थित श्री गणेश संस्कृत पाठशाला से जुड़ा था। याचिकाकर्ता नंबर एक को 8 जुलाई 1992 को संस्था का प्राचार्य नियुक्त किया गया था, जबकि याचिकाकर्ता नंबर दो और तीन को सहायक अध्यापक नियुक्त किया गया।

वेतन नहीं मिलने पर तीनों ने 2005 में हाईकोर्ट का रुख किया और बकाया वेतन के साथ 1 जनवरी 2005 से नियमित मासिक वेतन जारी करने की मांग की। हाईकोर्ट ने 8 फरवरी 2005 के अंतरिम आदेश के जरिए जनवरी 2005 से वेतन भुगतान का निर्देश दिया। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता नंबर दो की मृत्यु हो गई, जबकि याचिकाकर्ता नंबर तीन 31 मार्च 2025 को रिटायर हो गए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि नियुक्ति की कार्यवाही संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय को भेजी गई और विश्वविद्यालय ने अलग-अलग पत्रों के माध्यम से याचिकाकर्ता नंबर एक को प्राचार्य के रूप में मान्यता दी थी। जिला विद्यालय निरीक्षक ने भी 31 जुलाई 2015 के आदेश से उन्हें प्राचार्य के रूप में मान्यता दी थी।

यह भी बताया गया कि 2019 और 2020 में हुई जांच में नियुक्तियों में कोई अनियमितता नहीं पाई गई। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि याचिकाकर्ता नंबर एक करीब 32 वर्षों तक सेवा कर चुके हैं।

नियुक्ति की तारीख को लेकर भी विवाद सामने आया। याचिका में पहले 8 जुलाई 1989 की तारीख बताई गई थी, जिसे बाद में संशोधन के जरिए 8 जुलाई 1992 किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि पहली तारीख लिखना महज लिपिकीय त्रुटि थी और वास्तविक नियुक्ति 30 जून 1992 के नियुक्ति पत्र के आधार पर 8 जुलाई 1992 को हुई।

वहीं, प्रतिवादी की ओर से नियुक्ति की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए गए। कहा गया कि मूल नियुक्ति आदेश ही अदालत के सामने पेश नहीं किया गया। याचिकाकर्ता नंबर एक ने 1986 में पूर्व मध्यमा परीक्षा पास की थी जो हाईस्कूल के समकक्ष थी और मूल रूप से बताई गई नियुक्ति तारीख पर वह प्राचार्य या प्रवक्ता के पद के लिए आवश्यक योग्यता नहीं रखते थे।

यह भी बताया गया कि उस समय उनके पिता संस्था के प्रबंधक थे और विश्वविद्यालय ने 5 अक्टूबर 1993 के आदेश से नियुक्ति को मंजूरी देने से इनकार किया। विश्वविद्यालय ने नए सिरे से चयन प्रक्रिया कराने का निर्देश दिया, लेकिन ऐसी कोई नई चयन प्रक्रिया कराए जाने का प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं था।

हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के 5 अक्टूबर 1993 के आदेश को मामले की जड़ माना। अदालत ने कहा कि जब सक्षम प्राधिकारी ने नियुक्ति को मंजूरी देने से इनकार कर नए चयन का निर्देश दिया, तब याचिकाकर्ताओं को यह साबित करना था कि बाद में वैध तरीके से नया चयन हुआ।

अदालत ने कहा,

“जिस नियुक्ति को सक्षम वैधानिक प्राधिकारी की मंजूरी आवश्यक हो, उसे केवल लंबे समय तक सेवा में बने रहने के आधार पर वैध नियुक्ति में परिवर्तित नहीं किया जा सकता, विशेष रूप से तब, जब सक्षम प्राधिकारी पहले ही मंजूरी देने से इनकार कर चुका हो।”

बाद के वर्षों में जारी प्रशासनिक पत्रों और मान्यता के संबंध में अदालत ने कहा कि ये पत्र संस्थागत कामकाज और पत्राचार के लिए मान्यता दर्शाते हैं, लेकिन इनसे यह निर्णायक रूप से साबित नहीं होता कि मूल नियुक्ति कानून के अनुसार वैध थी।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका में नियुक्ति की तारीख बदलने की अनुमति मिल जाना उस बदली हुई तारीख की सत्यता या कानूनी शुद्धता पर अदालत की मुहर नहीं है।

पीठ ने कहा,

“संशोधन की अनुमति देना केवल प्रक्रियात्मक कदम है। इसका अर्थ यह नहीं है कि संशोधित दावे की सत्यता या कानूनी शुद्धता पर कोई निर्णय दे दिया गया।”

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता नंबर एक के पक्ष में दिए गए पुराने फैसलों को भी नियुक्ति की वैधता का अंतिम प्रमाण मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि उन मामलों में केवल यह सवाल तय किया गया कि प्रतिद्वंद्वी दावेदार कृष्ण देव त्रिपाठी प्राचार्य के पद पर याचिकाकर्ता को हटा सकता है या नहीं। यह सवाल अलग था कि स्वयं याचिकाकर्ता की नियुक्ति कानून के मुताबिक वैध थी या नहीं।

अदालत ने कहा,

“किसी प्रतिद्वंद्वी दावेदार का अपने अधिकार को साबित न कर पाना इस आवश्यकता को समाप्त नहीं करता कि याचिकाकर्ता को अपनी नियुक्ति की वैधता स्वतंत्र रूप से साबित करनी होगी।”

कोर्ट ने यह भी माना कि बाद में हुई जांच में नियुक्ति में कोई गड़बड़ी न पाए जाने की रिपोर्ट मूल नियुक्ति की कानूनी कमी को दूर नहीं कर सकती। इसी तरह, अंतरिम आदेश के तहत किया गया वेतन भुगतान अंतिम निर्णय के अधीन था और इससे याचिकाकर्ताओं के पक्ष में कोई स्वतंत्र या स्थायी अधिकार पैदा नहीं हुआ।

हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अदालत केवल इस आधार पर सरकारी धन से वेतन भुगतान का आदेश नहीं दे सकती कि किसी व्यक्ति ने एक निश्चित अवधि तक काम किया है। सहायता प्राप्त संस्थान से सरकारी धन के जरिए वेतन पाने का अधिकार तभी बनता है जब नियुक्ति कानून के अनुसार स्वीकृत और निर्धारित प्रक्रिया के तहत की गई हो।

इन आधारों पर हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की। अदालत ने स्पष्ट किया कि 8 फरवरी 2005 का अंतरिम आदेश अंतिम फैसले में समाहित माना जाएगा और उसके आधार पर याचिकाकर्ताओं के पक्ष में कोई स्वतंत्र या स्थायी अधिकार नहीं माना जाएगा।

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