इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से अपने मामलों की पैरवी करने वाले वकीलों की पेशेवर फीस का भुगतान नहीं किए जाने पर नाराजगी जताई। हालांकि करीब 4.8 करोड़ रुपये की फीस और उस पर ब्याज की मांग को लेकर दायर चार रिट याचिकाओं को अदालत ने सुनवाई योग्य नहीं माना।

जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की पीठ ने कहा कि वकील और मुवक्किल के बीच पेशेवर फीस का विवाद सामान्य तौर पर अदालत में नहीं पहुंचना चाहिए। ऐसे विवादों को आपसी बातचीत, मध्यस्थता या सुलह के जरिए सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा कि वकील को भी फीस की वसूली के लिए मुवक्किल को सीधे अदालत में खींचने से संयम बरतना चाहिए।

अदालत ने राज्य सरकार की ओर से फीस का भुगतान नहीं किए जाने के रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह का व्यवहार वकीलों को अपनी फीस के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर कर सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा,

“पेशेवर फीस का भुगतान वकील और मुवक्किल के बीच एक निजी विषय होना चाहिए और सामान्य तौर पर इसे अदालत की कार्यवाही का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।”

मामले में याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के वकील और अवध बार एसोसिएशन के सदस्य हैं। उन्होंने स्वयं पेश होकर चार रिट याचिकाएं दायर की थीं। उनका दावा था कि वह करीब 16 वर्षों तक राज्य सरकार की ओर से मामलों में पैरवी करते रहे और 23 अप्रैल 2009 के शासनादेश के तहत उन्हें बेसिक शिक्षा विभाग से संबंधित सभी विशेष अपीलों में नोटिस प्राप्त करने और पैरवी करने के लिए अधिकृत किया गया।

याचिकाकर्ता ने 2 मार्च 2011 के शासनादेश का हवाला देते हुए प्रति मामले 15 हजार रुपये से 5 लाख रुपये तक फीस का दावा किया।

उनका कहना था कि उन्हें अधिकतम 5 लाख रुपये प्रति मामले की फीस मिलनी चाहिए। चार याचिकाओं में सीतापुर, हरदोई, लखनऊ और रायबरेली से जुड़े कुल 30, 41, 17 और 8 मामलों की फीस का दावा किया गया। सभी दावों को मिलाकर राशि करीब 4.80 करोड़ रुपये बताई गई।

याचिकाकर्ता का कहना था कि उनके बिल स्वीकार किए जा चुके थे लेकिन भुगतान नहीं किया गया। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 और 23(1) का उल्लंघन भी बताया।

राज्य सरकार ने याचिकाओं की सुनवाई योग्य होने पर ही आपत्ति जताई। सरकार का कहना था कि फीस का दावा पक्षों के बीच हुए पेशेवर अनुबंध से जुड़ा है और इसकी वसूली के लिए सिविल अदालत का रास्ता अपनाया जाना चाहिए।

राज्य की ओर से यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता को 6 फरवरी 2008 को बेसिक शिक्षा परिषद के पैनल में शामिल किया गया। 23 अप्रैल 2009 का आदेश केवल नोटिस प्राप्त करने के अधिकार से संबंधित था। उन्हें 13 अक्टूबर 2011 को पैनल से हटा दिया गया और विवादित बिल ऐसे मामलों से संबंधित थे, जो उनके पैनल में रहने की अवधि से बाहर के थे।

सरकार ने यह भी कहा कि 2 मार्च 2011 का शासनादेश पैनल से बाहर नियुक्त विशेष वकीलों के लिए फीस की सीमा से संबंधित था। याचिकाकर्ता के प्रत्येक मामले के लिए 5 लाख रुपये फीस तय करने वाला कोई नियुक्ति आदेश या स्वीकृति आदेश रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह तथ्य कि राज्य ने याचिकाकर्ता की विशेष वकील के रूप में नियुक्ति को स्वीकार किया है इसका मतलब यह नहीं है कि उसके द्वारा प्रस्तुत सभी बिल भी राज्य ने स्वीकार कर लिए हैं।

अदालत ने पाया कि बिलों को स्वीकार किए जाने का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं था और याचिकाकर्ता ने अपने बिल भी याचिका के साथ संलग्न नहीं किए।

पीठ ने कहा,

“याचिकाकर्ता की स्पेशल एडवोकेट के रूप में नियुक्ति स्वीकार होना अलग बात है और उसके द्वारा प्रस्तुत बिलों का राज्य की ओर से स्वीकार किया जाना अलग बात है।”

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें वकीलों की फीस की वसूली के लिए रिट याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना गया। हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में अलग दृष्टिकोण अपनाने का कोई आधार नहीं है।

पीठ ने माना कि मामला मूल रूप से संविदात्मक प्रकृति का है और इसमें फीस की राशि, नियुक्ति की अवधि, बिलों की स्वीकृति और भुगतान की जिम्मेदारी सहित कई विवादित तथ्य हैं। इन तथ्यों का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर नियमित सुनवाई में किया जाना जरूरी होगा।

अदालत ने स्पष्ट किया कि 2 मार्च 2011 का शासनादेश प्रत्येक मामले के लिए विशेष अधिवक्ता को स्वतः 5 लाख रुपये फीस देने का प्रावधान नहीं करता। यह केवल फीस तय करने के लिए एक सीमा बताता है और वास्तविक फीस प्रत्येक मामले में सहमति के आधार पर तय की जानी है।

हाईकोर्ट ने कहा,

“वर्तमान मामले में विवादित तथ्यों का एक जटिल जाल है, जिसका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इस अदालत के अधिकार क्षेत्र में फैसला नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने यह तय करने से भी इनकार किया कि याचिकाकर्ता का दावा समय-सीमा से बाधित है या नहीं, क्योंकि यह कानून और तथ्यों का मिला-जुला सवाल है। इसी तरह, 13 अक्टूबर 2011 को पैनल से हटाए जाने के बाद स्पेशल एडवोकेट के रूप में फीस के उनके अधिकार पर भी अदालत ने कोई राय नहीं दी, ताकि भविष्य की कार्यवाही प्रभावित न हो।

इन आधारों पर हाईकोर्ट ने चारों रिट याचिकाएं खारिज की। हालांकि याचिकाकर्ता को सक्षम सिविल कोर्ट का रुख करने की स्वतंत्रता दी गई।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार उन्हें परिसीमा अधिनियम की धारा 14 का लाभ मिल सकेगा।

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