इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'लिस पेंडेंस' का सिद्धांत कोर्ट की नीलामी से हुई बिक्री (जो बिना मर्ज़ी के संपत्ति हस्तांतरण है) पर भी लागू होता है और नीलामी में खरीदने वाला व्यक्ति उस संपत्ति को इस शर्त के साथ खरीदता है कि उस पर पहले से चल रहे मुकदमे का नतीजा क्या होगा।

कोर्ट ने साफ़ किया कि इस सिद्धांत को लागू करने का आधार पहले से किए गए दावे या समझौते की जानकारी (नोटिस) नहीं है; यह सिद्धांत इसलिए लागू होता है, क्योंकि मुकदमा खुद लंबित होता है।

'ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट' की धारा 52 में 'लिस पेंडेंस' का नियम दिया गया। कोर्ट ने बताया कि यह नियम इसलिए है ताकि मुकदमे में शामिल पक्ष विवादित संपत्ति को किसी और को न सौंप दें और इस तरह उन अधिकारों को खत्म न कर दें, जिन्हें कोर्ट आखिर में घोषित कर सकता है।

जस्टिस अरुण कुमार ने कहा,

“अपील करने वाले का यह तर्क कि उसने बिना जानकारी के संपत्ति खरीदी थी, 'लिस पेंडेंस' के लागू होने को रोक नहीं सकता। जानकारी (नोटिस) इस सिद्धांत का आधार नहीं है। यह सिद्धांत मुकदमे के लंबित होने की वजह से ही लागू होता है।”

बेंच ने आगे कहा,

“जब अचल संपत्ति से जुड़ा 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) का मुकदमा लंबित हो और उससे पहले उस संपत्ति की कोर्ट द्वारा नीलामी हो जाए तो नीलामी में खरीदने वाला व्यक्ति उस संपत्ति को लंबित मुकदमे के नतीजे के अधीन खरीदता है। 'लिस पेंडेंस' का सिद्धांत तब भी लागू होता है जब नीलामी बिना मर्ज़ी के संपत्ति हस्तांतरण हो। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि वादी को 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के लिए अपना स्वतंत्र अधिकार साबित करने की ज़रूरत नहीं है।”

नवाब सिंह बुलंदशहर ज़िले के गाँव कलाकुरी में कृषि भूमि के रिकॉर्डेड भूमिधर और मालिक थे। बाबू सिंह ने दावा किया कि नवाब सिंह ने 22 अप्रैल 1972 को उन्हें 7,500 रुपये में ज़मीन बेचने पर सहमति जताई, 3,500 रुपये बयाना (एडवांस) के तौर पर दिए गए थे और कब्ज़ा तुरंत सौंप दिया गया। जब कानूनी नोटिस के बाद भी सेल डीड (बिक्री विलेख) नहीं बनी तो उन्होंने 24 अक्टूबर 1973 को 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के लिए मुकदमा दायर किया।

इस बीच छज्जू राम ने जुलाई 1973 में एक कथित बॉन्ड के आधार पर 10,000 रुपये के लिए नवाब सिंह पर मुकदमा किया और फैसले से पहले उसी ज़मीन की कुर्की (अटैचमेंट) करवा ली। मनी सूट (पैसे के लिए मुकदमा) उनके पक्ष में तय हुआ और उन्होंने 17 अप्रैल 1974 को कोर्ट की नीलामी में खुद वह ज़मीन खरीद ली। 12,250. बाबू सिंह की नीलामी बिक्री के खिलाफ़ आपत्ति (जो CPC की धारा 47 और ऑर्डर XXI नियम 58 के तहत थी) 14 दिसंबर 1974 को खारिज कर दी गई। उन्होंने चल रहे मुकदमे में छज्जू राम को पक्षकार बनाया और आरोप लगाया कि बॉन्ड नकली था और डिक्री व नीलामी मिलीभगत से हुई।

दोनों ट्रायल कोर्ट ने समझौते को असली माना और पाया कि वादी इसे पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक था। उन्होंने 'लिस पेंडेंस' (मुकदमा लंबित रहने के दौरान संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक) का सिद्धांत लागू किया क्योंकि नीलामी मुकदमा शुरू होने के बाद हुई, और 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) का आदेश दिया।

हाईकोर्ट में दूसरी अपील इस सवाल पर स्वीकार की गई कि क्या मालिक के खिलाफ डिक्री के निष्पादन में खरीदार के खिलाफ 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' लागू किया जा सकता है और क्या निष्पादन कार्यवाही में यह निष्कर्ष कि समझौता असली नहीं था, 'रेस ज्यूडिकाटा' (पहले तय हो चुके मामले का सिद्धांत) के रूप में लागू होगा।

इस तर्क को खारिज करते हुए कि यह सिद्धांत केवल स्वेच्छा से किए गए हस्तांतरण तक सीमित है, कोर्ट ने कहा कि हालांकि धारा 52 सख्ती से कोर्ट की बिक्री पर लागू नहीं होती, लेकिन 'लिस पेंडेंस' का सिद्धांत लागू होता है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने समरेंद्र नाथ सिन्हा बनाम कृष्ण कुमार नाग मामले में कहा और केदारनाथ लाल (मृत) के कानूनी उत्तराधिकारियों व अन्य बनाम शिवनारायण व अन्य मामले में दोहराया था। उस मामले में यह भी कहा गया कि पहले की गई कुर्की (अटैचमेंट) अधिग्रहण को इस सिद्धांत के दायरे से बाहर नहीं करती, क्योंकि कुर्की केवल संपत्ति के हस्तांतरण को रोकने के लिए प्रभावी होती है, न कि मालिकाना हक बनाने के लिए।

आगे कहा गया,

“नीलामी बिक्री को केवल इसलिए शून्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह मुकदमा लंबित रहने के दौरान (पेंडेंट लाइट) हुई थी। इसका कानूनी नतीजा यह है कि नीलामी में संपत्ति खरीदने वाला व्यक्ति लंबित मुकदमे के नतीजे के अधीन संपत्ति का अधिकार प्राप्त करता है।”

'रेस जुडिकाटा' (Res Judicata) के मामले में कोर्ट ने कहा कि 1973-74 की एग्जीक्यूशन कार्यवाही (Execution Proceedings) CPC के ऑर्डर XXI नियम 58 और 63 के तहत होती थी, जो 1976 के संशोधन से पहले लागू थे। इसके तहत अटैचमेंट (कुर्की) के खिलाफ दावे की जांच सरसरी तौर पर की जाती थी और दावा करने वाले को नियम 63 के तहत मुकदमा करने के लिए छोड़ दिया जाता था।

सुप्रीम कोर्ट के 'मंगरू महतो बनाम ठाकुर तारकनाथजी तारकेश्वर मठ' मामले के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी दावा कार्यवाही कोई मुकदमा या उसके जैसी कोई चीज़ नहीं थी। साथ ही, जहां नियम 63 के तहत कोई मुकदमा दायर नहीं किया गया, वहां आदेश केवल इस बात पर अंतिम (Conclusive) माना जाता था कि क्या उस डिक्री के एग्जीक्यूशन में संपत्ति को अटैच और बेचा जा सकता है या नहीं।

आगे कहा गया,

“नियम 63 के तहत कानूनी रूप से अंतिम होने का दायरा केवल इस सवाल तक सीमित था कि क्या संपत्ति को उस खास डिक्री के एग्जीक्यूशन में अटैच और बेचा जा सकता है या नहीं। यह इस स्वतंत्र सवाल पर लागू नहीं होता था कि क्या वादी उस व्यक्ति के खिलाफ अपने पुराने कॉन्ट्रैक्ट के 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (Specific Performance) का हकदार है, जिसने बाद में मुकदमे के दौरान (Pendente Lite) संपत्ति हासिल की थी।”

कोर्ट ने देखा कि 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' का मुकदमा पहले से ही लंबित था, जब एग्जीक्यूशन में आपत्ति पर फैसला लिया गया था, इसलिए वादी एग्जीक्यूशन दावे पर दोबारा फैसला नहीं मांग रहा था।

कोर्ट ने कहा,

“बिना संशोधन वाले ऑर्डर XXI नियम 58 के तहत दावे या आपत्ति पर पारित आदेश, जहाँ नियम 63 के तहत तय समय सीमा के भीतर कोई मुकदमा दायर नहीं किया गया, नियम 63 द्वारा परिकल्पित सीमित कानूनी अंतिमता (Statutory Conclusiveness) केवल इस सवाल के संबंध में प्राप्त करता है कि क्या संपत्ति उस खास डिक्री के एग्जीक्यूशन में अटैच और बेची जा सकती थी या नहीं, जिससे दावा कार्यवाही उत्पन्न हुई। ऐसा आदेश केवल इसलिए कि वह नियम 63 के तहत अंतिम हो गया, कोई ऐसा फैसला नहीं है जो किसी स्वतंत्र 'कॉज़ ऑफ़ एक्शन' (Cause of Action) पर या पार्टियों के बीच पुराने कॉन्ट्रैक्ट से उत्पन्न सभी अधिकारों और दायित्वों पर 'रेस जुडिकाटा' के रूप में काम करे, जिसमें 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के लिए लंबित दावा भी शामिल है।”

पहले सवाल का जवाब हाँ में देते हुए (इस शर्त के साथ कि वादी स्वतंत्र रूप से 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के अपने अधिकार को साबित करे) और दूसरे सवाल का जवाब ना में देते हुए कोर्ट ने दोनों डिक्री को बरकरार रखा और दूसरी अपील खारिज की।

Case Title: Chhajju Ram v. Babu Singh

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