हाईकोर्ट ने लखनऊ और प्रयागराज में कुत्तों के काटने वाले 'हॉटस्पॉट' की पहचान करने का निर्देश दिया; आक्रामक कुत्तों को मानवीय तरीके से हटाने का आदेश दिया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ और प्रयागराज के नगर आयुक्तों को अपने क्षेत्रों/शहरों में कुत्तों के काटने वाले 'हॉटस्पॉट' (ज्यादा घटनाएं होने वाली जगहें) की पहचान करने और वहां से कुत्तों को मानवीय तरीके से पकड़कर हटाने का निर्देश दिया।
नगर प्रशासन से कहा गया कि वे उन कुत्तों को प्राथमिकता दें, जिनके बारे में जांच से पता चलता है कि उन्होंने बार-बार लोगों पर हमला किया है या आक्रामक व्यवहार दिखाया है—खासकर उन जगहों पर जहां से ऐसी कई शिकायतें मिली हैं।
कोर्ट ने पिछले 3 वर्षों में कुत्तों के काटने की रिपोर्ट की गई घटनाओं का विवरण मांगा। साथ ही नगर निगम में दर्ज शिकायतों और पशु चिकित्सा रिकॉर्ड की जानकारी भी मांगी।
अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे साल-वार और क्षेत्र-वार एक रिपोर्ट तैयार करें, जिसमें यह बताया जाए कि कुत्ते काटने की घटनाएं कहां-कहां हुईं। साथ ही उन इलाकों की पहचान करें जहां ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं या बढ़ रही हैं। इसके अलावा, उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए एक विस्तृत हलफनामा (एफिडेविट) भी जमा करना होगा।
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने 1 अक्टूबर को यह निर्देश दिए। यह आदेश 'सुओ मोटो' (स्वतः संज्ञान) कार्यवाही के तहत दिया गया, जो आवारा कुत्तों और उनके द्वारा लोगों को काटने की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन से जुड़ी है।
इस मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर को होगी।
अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि हालांकि राज्य और अन्य अधिकारियों द्वारा दाखिल हलफनामों में कई प्रशासनिक कदमों की जानकारी दी गई है, लेकिन यह जांचना जरूरी है कि क्या ये कदम वास्तव में ज़मीनी स्तर पर लागू किए गए हैं या नहीं।
इसलिए कोर्ट ने लखनऊ और प्रयागराज में नगर निगम की सीमाओं के भीतर, एक व्यावहारिक और चरणबद्ध प्रक्रिया के ज़रिए इन निर्देशों के पालन की सीधी निगरानी करने का फैसला किया।
नगर आयुक्तों से यह भी कहा गया है कि वे कुत्तों के काटने के रिकॉर्ड के आधार पर पहचानी गई जगहों के अलावा, निरीक्षण के लिए कम से कम 30 और जगहों की पहचान करें।
इनमें बड़े अस्पताल, स्कूल, रेलवे स्टेशन, बाज़ार, पार्क और सार्वजनिक आवाजाही वाली अन्य जगहें शामिल हो सकती हैं—जिसमें उनके परिसर, आस-पास की सड़कें और वहां तक पहुंचने के रास्ते भी शामिल हैं।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह पूरी प्रक्रिया 1 महीने के भीतर पूरी कर ली जाए।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि हर पहचानी गई जगह का निरीक्षण करने के लिए पशु चिकित्सा और नगर निगम के अधिकारियों को तैनात किया जाए। ये अधिकारी वहां मौजूद कुत्तों की अनुमानित संख्या दर्ज करेंगे। साथ ही यह भी बताएंगे कि यह अनुमान किस तारीख को और किस तरीके से लगाया गया। अधिकारियों को ऐसे कुत्तों की पहचान करनी चाहिए, जो बार-बार हमला करते हैं या आक्रामक व्यवहार दिखाते हैं। साथ ही पिछले 3 वर्षों में इन कुत्तों को हटाने, उनकी नसबंदी करने और उन्हें टीका लगाने के लिए उठाए गए कदमों का रिकॉर्ड रखना चाहिए, जिसमें (जहाँ भी उपलब्ध हो) कुत्तों की संख्या भी शामिल हो।
अदालत ने निर्देश दिया कि कुत्तों को हटाने के बाद, उन्हें किसी निर्धारित 'एनिमल बर्थ कंट्रोल' (ABC) केंद्र या पशु चिकित्सा सुविधा केंद्र ले जाया जाए। वहाँ उनकी जांच, इलाज, नसबंदी और टीकाकरण किया जाए, जैसा कि चिकित्सकीय रूप से उचित हो।
जो कुत्ते आक्रामक व्यवहार दिखाते हैं या जिनके रेबीज से ग्रस्त होने का संदेह है, उनका अलग से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। उन्हें अन्य कुत्तों से अलग रखकर या क्वारंटाइन (अलग-थलग) करके प्रबंधित किया जाना चाहिए।
अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया कि वे प्रत्येक कुत्ते की जगह और उसकी पहचान का आधार, उसे कहाँ ले जाया गया, और उस पर क्या कार्रवाई की गई, इसका पूरा रिकॉर्ड रखें।
उनकी रिपोर्ट में अदालत के आदेश के बाद हटाए गए कुत्तों का अलग से विवरण होना चाहिए। साथ ही बार-बार हमला करने वाले या आक्रामक व्यवहार दिखाने वाले कुत्तों को अभी कहां रखा गया है या उनके साथ क्या किया गया है, इसकी जानकारी भी देनी होगी।
अदालत ने मौजूदा व्यवस्थाओं में कमियों का विवरण भी मांगा है, जैसे कि टीमों, कर्मचारियों, विशेषज्ञता, उपकरणों और सही तरीकों की कमी।
अधिकारियों को ABC (एनिमल बर्थ कंट्रोल) केंद्र की क्षमता, कर्मचारियों की योग्यता, आगे के इलाज, और कुत्तों को कानूनी रूप से कहीं रखने या छोड़ने से जुड़ी चुनौतियों के बारे में बताना होगा।
कार्य योजनाओं में यह बताना होगा कि हर चिह्नित इलाके में लगभग कितने कुत्ते बचे हैं, कितने आक्रामक कुत्तों को हटाया जाना बाकी है। ऐसी घटनाओं को दोबारा होने से रोकने तथा संस्थानों के परिसर को सुरक्षित बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।
इसके अलावा, लखनऊ नगर आयुक्त को एक नोट जमा करने का निर्देश दिया गया। इसमें यह बताना होगा कि तथाकथित "लखनऊ मॉडल" कैसे काम करता है, जरहारा प्रशिक्षण केंद्र की वर्तमान भूमिका क्या है, और इसकी सफलता के दावे को साबित करने वाले परिणाम क्या हैं। इस नोट में उन तौर-तरीकों का भी जिक्र होना चाहिए, जो दूसरे शहरों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
मुख्य चिकित्सा अधिकारियों, नगर निगम और पशुपालन विभाग के अधिकारियों, संस्थानों के प्रमुखों और नोडल अधिकारियों को इस काम में मदद करने का निर्देश दिया गया। संबंधित जिलाधिकारियों को इस प्रक्रिया में तालमेल बिठाना होगा और आने वाली दिक्कतों को दूर करना होगा।
अदालत ने निर्देश दिया कि सभी कदम सुप्रीम कोर्ट के आदेशों, 'एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल्स, 2023' और 'एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया' द्वारा जारी मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) के अनुरूप होने चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि लखनऊ और प्रयागराज में चलाए जा रहे इस विशेष अभियान का असर पूरे उत्तर प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन पर नहीं पड़ेगा, और न ही इससे पहले दिए गए निर्देशों का महत्व कम होगा।
'एमिक्स क्यूरी' (अदालत के सहयोगी) से कहा गया कि वे राज्य सरकार, केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों, तथा 'नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया' द्वारा दाखिल हलफनामों और दस्तावेजों की जांच करें। साथ ही, वे अदालत को यह समझने में मदद करें कि निर्देशों का कितना पालन हुआ है और क्या आगे और निर्देश देने की जरूरत है।
नगर आयुक्तों को 5 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई से पहले, उठाए गए कदमों का विवरण देते हुए अनुपालन हलफनामे (compliance affidavits) दाखिल करने होंगे।