इलाहाबाद हाईकोर्ट ने युवा वकीलों को सलाह दी कि वे सोशल मीडिया पर लाइक्स बढ़ाने के बजाय अपनी पढ़ाई और केस की तैयारी पर ध्यान दें। कोर्ट ने यह सलाह बार (वकीलों) और बेंच (जजों) के बीच मतभेदों और अदालती कार्यवाही में बाधा डालने की घटनाओं पर चिंता जताते हुए दी।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने कहा कि युवा वकील हाई कोर्ट का भविष्य हैं, क्योंकि आगे चलकर यही लोग सीनियर वकील और हाईकोर्ट के जज बनते हैं।

कोर्ट ने यह टिप्पणी एक जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान की। इस मामले में कुछ वकीलों पर आरोप था कि उन्होंने अन्य वकीलों को अपने केस की बहस के लिए कोर्ट रूम में जाने से जबरन रोका, और सरकारी वकीलों को भी कोर्ट रूम से बाहर निकाल दिया।

कोर्ट ने पाया कि आवेदक के वकील जमानत अर्जी पर बहस करने के लिए पेश नहीं हो सके, क्योंकि कुछ वकीलों ने उन्हें कोर्ट रूम में जाने से जबरन रोक दिया। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि सरकारी वकीलों को जबरन कोर्ट रूम से बाहर निकाला गया।

जस्टिस देशवाल ने अपने आदेश में लिखा कि सुनवाई के दौरान उन्होंने एक महिला वकील के रोने की आवाज सुनी। वह अपने केस के लिए कोर्ट रूम में जाना चाहती थीं, लेकिन कथित तौर पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया और उन्हें अंदर जाने से जबरन रोक दिया गया।

इस तरह के व्यवहार को बार और कोर्ट की प्रतिष्ठा और गरिमा के लिए नुकसानदेह बताते हुए बेंच ने कहा:

"अदालत की कार्यवाही को केवल इसलिए नहीं रोका जा सकता, क्योंकि वकीलों का एक वर्ग नहीं चाहता कि कोर्ट काम करे, जबकि अधिकांश वकील अपने केस की बहस करना चाहते हैं।"

कोर्ट ने हाई कोर्ट के कामकाज और वकीलों से जुड़ी कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स का भी संज्ञान लिया, जिन्हें युवा वकीलों ने अपलोड किया।

सिंगल जज ने चेतावनी दी कि बिना सोचे-समझे साझा की गई अधूरी और तोड़-मरोड़ कर पेश की गई जानकारी, बार और बेंच के बीच के मतभेदों को "बेवजह और बढ़ा सकती है"।

इस संबंध में कोर्ट ने युवा वकीलों को सलाह दी कि वे सोशल मीडिया लाइक्स के पीछे भागने के बजाय, अपना करियर बनाने के लिए अपनी पढ़ाई और केस की तैयारी पर ध्यान दें।

उन्होंने आगे कहा कि इस कोर्ट के अधिकांश जज और सीनियर वकील, युवा वकीलों के भविष्य के लिए एक अच्छा माहौल बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। अदालत ने आगे कहा कि समाज में वकीलों का सम्मान इसलिए होता है, क्योंकि जनता का हाईकोर्ट पर भरोसा है। अदालत ने जोर देकर कहा कि हाईकोर्ट की गरिमा बनाए रखना केवल जज का ही नहीं, बल्कि वकीलों का भी कर्तव्य है।

अदालत ने आगे कहा,

"अगर हाईकोर्ट पर जनता का भरोसा कम हो जाता है तो माफिया और कुछ मनमाने सरकारी अधिकारी वकीलों को परेशान करने लगेंगे। हाल ही में कुछ जिलों में ऐसा हुआ भी है, जिसका जिक्र कई अखबारों में भी किया गया।"

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वकीलों की गरिमा में निजी वकील और सरकारी वकील दोनों शामिल हैं, क्योंकि सरकारी वकील भी 'बार' (वकीलों के निकाय) के ही सदस्य होते हैं।

इसके मद्देनजर, अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी से अपेक्षा की कि वे इस मुद्दे पर विचार करें और हाईकोर्ट की गरिमा बनाए रखने के लिए उचित कदम उठाएं।

न्यायहित में अदालत ने जमानत मामले की सुनवाई स्थगित की और इसे 26 नवंबर को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

Case Title : Rajesh vs. State of U.P.

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: