इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज़मानत मिलने के बाद अपील की सुनवाई टालने की मुक़दमेबाज़ों की 'आपत्तिजनक' चाल पर नाराज़गी जताई, कहा- बेंच या बार को दोष न दें

Update: 2026-03-24 04:36 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक अपीलों में ज़मानत हासिल करने और उसके बाद अपने वकीलों को अंतिम सुनवाई के लिए पेश न होने का निर्देश देने की मुक़दमेबाज़ों की "आपत्तिजनक प्रवृत्ति" की कड़ी आलोचना और निंदा की।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि सेमिनारों में जब अदालतों में देरी के कारणों पर बहस होती है तो मुक़दमेबाज़ों की भूमिका को ज़्यादातर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। मुक़दमेबाज़ को बार और बेंच के हाथों में एक बेबस इंसान के तौर पर देखा जाता है। हालाँकि, असल में ऐसा नहीं है।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने आगे कहा कि अब समय आ गया है, जब मुक़दमेबाज़ों को उनके अपने आचरण और कोर्ट में अपनी सीमित भूमिका निभाने के तरीके के बारे में आईना दिखाया जाए।

ये टिप्पणियां बेंच ने राम नारायण नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर आपराधिक अपील की सुनवाई करते हुए कीं। अपीलकर्ता को 8 जनवरी, 2025 को डिवीज़न बेंच द्वारा ज़मानत दी गई। कोर्ट ने पेपर-बुक्स (दस्तावेज़ों) को संकलित करने का निर्देश दिया था ताकि अपील की सुनवाई सही समय पर हो सके।

हालांकि, जब 30 जनवरी, 2026 को मामले को सुनवाई के लिए लिया गया तो अपीलकर्ता की ओर से कोई वकील पेश नहीं हुआ। कोर्ट ने और समय दिया और कार्यालय को अपीलकर्ता के वकील को सूचित करने का निर्देश दिया।

पेपर-बुक्स संकलित होने और अतिरिक्त सरकारी वकील को सौंपे जाने के बावजूद, जब 18 मार्च, 2026 को मामला सुनवाई के लिए आया तो अपीलकर्ता का वकील फिर से अनुपस्थित रहा।

इस बात का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वकीलों को पेश न होने के लिए दोष नहीं दिया जा सकता, जब मुक़दमेबाज़ खुद उन्हें अपील की सुनवाई के लिए पेश न होने का निर्देश देते हैं, क्योंकि वकीलों के पास मुवक्किल के निर्देशों से परे काम करने का कोई अधिकार नहीं होता है।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"इसमें कोई शक नहीं कि सम्मानित वकील कोर्ट का अधिकारी होता है और उसके अपने दायित्व होते हैं, लेकिन सिद्धांत के आदर्शवाद को यथार्थवादी सीमाओं से परे नहीं खींचा जा सकता। आखिरकार, यह एक आपराधिक मामला है, जहां मुक़दमेबाज़ को अपनी पसंद के सम्मानित वकील द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने का अधिकार होता है। यदि कोई मुक़दमेबाज़ सम्मानित वकील को पेश न होने का निर्देश देता है, तो सम्मानित वकील के पास आगे पेश होने का कोई अधिकार नहीं रह जाता है।"

बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कुछ अपवादों को छोड़कर ऐसा कोई वकील या जज नहीं है, जिसके सामने बहस या सुनवाई के लिए विधिवत सौंपा गया कोई मामला आए और वह अपना फ़र्ज़ न निभाए।

कोर्ट ने आगे इस बात पर ज़ोर दिया कि ये मुक़दमेबाज़ी करने वाली जनता के बीच प्रचलित कुछ ऐसी कुरीतियां हैं, जिन पर वे शायद ही कभी ध्यान देते हैं, जबकि वे कोर्ट में होने वाली देरी वगैरह जैसी बुराइयों की आलोचना करने के लिए अक्सर ज़ोर-शोर से अभियान चलाते हैं।

कोर्ट ने राय दी कि असली मुश्किल तब पैदा होती है, जब वे लोग जिनके हित दांव पर लगे होते हैं, जान-बूझकर पीछे हट जाते हैं या चाहते हैं कि कार्यवाही "ठंडे बस्ते में चली जाए"। इससे कोर्ट के पास ऐसे विकल्प बचते हैं, जिनमें उन्हें मुक़दमेबाज़ों से लगभग लड़ना पड़ता है, ताकि उन्हें मामले की मेरिट पर बहस करने के लिए मजबूर किया जा सके।

इसके अलावा, मौजूदा मामले को इस टालमटोल वाली रणनीति का एक उदाहरण मानते हुए हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता राम नारायण के ख़िलाफ़ एक ज़मानती गिरफ़्तारी वारंट जारी किया।

बेंच ने अपीलकर्ता को निर्देश दिया कि वह 23 मार्च को या उससे पहले सोनभद्र के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने आत्मसमर्पण करे और 20,000 रुपये की रक़म का निजी मुचलका और उतनी ही रक़म के दो ज़मानती पेश करे। साथ ही एक ऐसा वचनपत्र भी दे, जिसमें वह 25 मार्च को इस कोर्ट के सामने पेश होने के लिए खुद को बाध्य करे।

सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया गया कि वे यह सुनिश्चित करें कि यह वारंट अपीलकर्ता को बिना किसी चूक के तामील कराया जाए और किसी भी टालमटोल करने वाले या 'दोस्ताना' पुलिसकर्मी द्वारा यह कहकर वापस न लौटाया जाए कि राम नारायण उपलब्ध नहीं है।

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