आय से अधिक संपत्ति मामले में FIR से पहले स्पष्टीकरण मांगना जरूरी नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी लोक सेवक को उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से पहले कथित आय से अधिक संपत्ति का स्पष्टीकरण देने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले आरोपी से जवाब मांगना कानूनन आवश्यक नहीं है।
जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक सरकारी कर्मचारी द्वारा दायर याचिका खारिज करते हुए की। याचिकाकर्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(b) और 13(2) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप था कि उसने करीब 2.51 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि उसकी वैध आय लगभग 1.95 करोड़ रुपये थी।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 के तहत मामला तभी दर्ज किया जा सकता है, जब आरोपी अपनी आय के स्रोतों का संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे। उसका कहना था कि एफआईआर दर्ज करने से पहले उससे स्पष्टीकरण मांगा जाना चाहिए था, जो इस मामले में नहीं किया गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—State of Karnataka Vs. Sri Channakeshava H.D., CBI Vs. Thommandru Hannah Vijaylakshmi और K. Veeraswami Vs. Union of India—पर भरोसा करते हुए कहा कि प्रारंभिक जांच या आरोपी से पूर्व स्पष्टीकरण न लेने मात्र से एफआईआर अवैध नहीं हो जाती।
कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 के तहत लोक सेवक द्वारा अवैध तरीके से संपत्ति अर्जित करना आपराधिक कदाचार की श्रेणी में आता है। साथ ही, कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो एफआईआर दर्ज करने से पहले आरोपी से स्पष्टीकरण मांगना अनिवार्य बनाता हो।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।