दहेज के कारण मौत का मामला इसलिए रद्द किया जा सकता है, क्योंकि महिला की मौत कथित तौर पर हार्ट-अटैक से हुई? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सास के खिलाफ दहेज के कारण मौत का मामला रद्द करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि यह तथ्य कि महिला की मौत मायोकार्डियल इन्फार्क्शन (हार्ट अटैक) के कारण हुए शॉक से हुई, इसे अकेले ही मामले को रद्द करने के चरण में इस बात का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता कि उसकी मौत पूरी तरह से प्राकृतिक थी।
जस्टिस चवन प्रकाश की बेंच ने कहा कि जब शादी के सात साल के भीतर किसी युवा महिला की मौत दहेज से जुड़ी क्रूरता या उत्पीड़न के खास आरोपों के बीच होती है तो शुरुआती चरण में यह अपने आप नहीं माना जा सकता कि उसकी मौत पूरी तरह से प्राकृतिक थी, सिर्फ इसलिए कि मेडिकल राय में इसे मायोकार्डियल इन्फार्क्शन का नतीजा बताया गया।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि मामला रद्द करने के चरण में ऐसी दलील को स्वीकार करना एक्सपर्ट मेडिकल सबूतों के आधार पर अभियोजन (Prosecution) के बारे में जल्दबाजी में फैसला करने जैसा होगा।
कोर्ट ने कहा:
"ऐसा करना अभियोजन की वैधता का पता लगाने और एक्सपर्ट मेडिकल सबूतों के आधार पर जल्दबाजी में ट्रायल करने जैसा होगा, जो कानून के तहत मंजूर नहीं है।"
इसके अनुसार, कोर्ट ने निर्मला देवी की अर्जी खारिज की। उन्होंने BNS की धाराओं 80(2), 85, 61 और 115(2) और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत दर्ज मामले से जुड़ी चार्जशीट, संज्ञान/समन आदेश और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की।
मामले का संक्षिप्त विवरण
मृतका की शादी 4 मई, 2021 को याचिकाकर्ता के बेटे से हुई। 18 फरवरी, 2025 को वह अपने ससुराल में बेहोश पाई गई और उसे फिरोजाबाद के एक अस्पताल ले जाया गया। बाद में उसे आगरा के एक अस्पताल में शिफ्ट किया गया, जहां 25 फरवरी, 2025 को उसकी मौत हो गई।
पोस्टमॉर्टम जांच में मौत का कारण "मायोकार्डियल इन्फार्क्शन के कारण शॉक" बताया गया। जांच में दोनों कंधों पर चोट के निशान और खरोंचें भी पाई गईं।
याचिकाकर्ता के मामले के अनुसार, मृतका को बुखार, ठंड और सिरदर्द की शिकायत थी, जिसके बाद उसे उल्टी, होश खोने (altered sensorium) और मुंह से झाग आने की समस्या हुई। उन्हें वायरल एन्सेफलाइटिस के शक में न्यूरो ICU में भर्ती किया गया, लेकिन बाद में उनकी हालत अचानक बिगड़ गई और उन्हें कार्डियक अरेस्ट (दिल की धड़कन रुकना) हो गया।
आवेदक ने तर्क दिया कि मौत पूरी तरह से प्राकृतिक थी और मेडिकल दिक्कतों के कारण हुई। यह भी कहा गया कि ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि मौत शरीर पर चोट, जलने, ज़हर या किसी अन्य बाहरी या अप्राकृतिक कारण से हुई।
इसी आधार पर आवेदक ने तर्क दिया कि दहेज हत्या के अपराध के लिए ज़रूरी तत्व मौजूद नहीं है।
दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि मृतका को उसके पति और ससुराल वालों द्वारा दहेज के लिए परेशान किया जाता था।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पाया कि आवेदक के खिलाफ लगाए गए आरोप खास प्रकृति के थे और जांच के दौरान दर्ज शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयानों से इनकी पुष्टि होती है।
इसके बाद कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि सास के खिलाफ BNS की धारा 85, 61 और 115(2) के तहत कोई अपराध नहीं बनता है।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच असहमति, मनमुटाव या खराब व्यवहार की हर घटना अपने आप में BNS की धारा 85 के तहत 'क्रूरता' नहीं मानी जाएगी।
कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही लगातार कई घटनाओं का होना ज़रूरी नहीं है, लेकिन अपराध मानने के लिए एक ही घटना काफ़ी गंभीर होनी चाहिए और क्रूरता की कानूनी परिभाषा के दायरे में आनी चाहिए।
दहेज हत्या के आरोप के संबंध में कोर्ट ने BNS की धारा 80(1) के तहत ज़रूरी शर्तों का ज़िक्र किया। कोर्ट ने पाया कि इस प्रावधान के लिए ज़रूरी है कि महिला की मौत शादी के सात साल के भीतर हुई हो; मौत सामान्य परिस्थितियों के अलावा किसी अन्य तरीके से हुई हो; मौत से ठीक पहले उसे उसके पति या उसके रिश्तेदार द्वारा क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार बनाया गया हो। ऐसी क्रूरता या उत्पीड़न दहेज की मांग के लिए या उससे जुड़ा हुआ हो।
कान्स राज बनाम पंजाब राज्य (2000) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि "सामान्य परिस्थितियों के अलावा" वाक्यांश को केवल दिखाई देने वाली शारीरिक चोटों या जानलेवा ज़हर देने वाले मामलों तक सीमित नहीं किया जा सकता है।
अदालत ने कहा:
"...अगर किसी युवा महिला की शादी को बस तीन-चार साल ही हुए हों और उसे लगातार क्रूरता या मानसिक सदमे का सामना करना पड़ रहा हो। फिर उसे बुखार, दौरे और मायोकार्डियल इन्फार्क्शन (दिल का दौरा) के साथ अस्पताल लाया जाए तो शुरुआती चरण में यह मान लेना सही नहीं होगा कि उसकी मौत पूरी तरह से प्राकृतिक थी।"
अदालत ने आगे कहा कि शारीरिक तनाव, मानसिक प्रताड़ना, या कोई ऐसा ज़हर या पदार्थ जो दिखाई न दे, दौरे, कार्डियोजेनिक शॉक या मायोकार्डियल इन्फार्क्शन जैसी मेडिकल स्थितियां पैदा कर सकता है।
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि क्या मरने वाली महिला को हुआ बुखार, दौरे और मायोकार्डियल इन्फार्क्शन पूरी तरह से प्राकृतिक थे या फिर लगातार क्रूरता या अन्य गंभीर कारणों से हुए, इसका पक्का फ़ैसला BNSS की धारा 528 के तहत कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।
अदालत के अनुसार, इस मुद्दे को सुलझाने के लिए इलाज करने वाले डॉक्टरों और मेडिकल विशेषज्ञों से पूछताछ करनी होगी। साथ ही हिस्टोपैथोलॉजिकल और टॉक्सिकोलॉजिकल जांच, विसरा रिपोर्ट और कथित उत्पीड़न के समय से जुड़े सीधे बयानों पर भी विचार करना होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि एक बार जब दहेज के कारण मौत (डाउरी डेथ) के ज़रूरी तत्व प्रथम दृष्टया (Prima Facie) साबित हो जाते हैं तो BSA की धारा 118 (दहेज के कारण मौत के बारे में कानूनी धारणा) लागू हो जाती है।
आखिरकार बेंच ने माना कि दहेज की मांग, दहेज के कारण मौत और क्रूरता के आरोपों में तथ्य और कानून से जुड़े सवाल शामिल हैं, जिनका फ़ैसला केवल निष्पक्ष सुनवाई के ज़रिए ही किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि सुनवाई के दौरान आरोपी को अभियोजन पक्ष के गवाहों से जिरह करने और बचाव पक्ष के सबूत पेश करने का मौका मिलेगा।
इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने निर्मला देवी की उस अर्ज़ी को खारिज किया, जिसमें आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई।
Case Title - Nirmala Devi vs. State of UP and another 2026 LiveLaw (AB) 764