आर्य समाज मंदिर का विवाह प्रमाणपत्र अकेले हिंदू विवाह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आर्य समाज मंदिर की ओर से जारी विवाह प्रमाणपत्र पेश कर यह साबित नहीं किया जा सकता कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैध विवाह संपन्न हुआ था। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैध हिंदू विवाह के लिए कानून में निर्धारित आवश्यक हिंदू रीति-रिवाज और रस्में पूरी होना जरूरी है।
जस्टिस राजीव सिंह ने यह टिप्पणी सशस्त्र सीमा बल के अधिकारी रोहित पांडेय की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। अधिकारी को वैवाहिक स्थिति के संबंध में गलत घोषणा करने के आरोप में सेवा से हटा दिया गया। हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द करते हुए उन्हें तत्काल ड्यूटी पर वापस लेने का निर्देश दिया।
मामला 2007 में आर्य समाज मंदिर में कथित विवाह से जुड़ा था। शिकायतकर्ता सुचेता तिवारी ने आरोप लगाया कि रोहित पांडेय ने अगस्त 2007 में आर्य समाज मंदिर में उनसे विवाह किया। विभागीय अधिकारियों ने इस कथित विवाह को वैध और अस्तित्व में मानते हुए पांडेय के खिलाफ कार्रवाई की थी।
पांडेय की ओर से दलील दी गई कि हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार वैध विवाह संपन्न होने का कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सुचेता तिवारी ने स्वयं कहा कि उनका विवाह हिंदू रीति-रिवाजों और सप्तपदी के अनुसार नहीं हुआ।
वहीं, विभागीय अधिकारियों ने जांच में दिए गए तिवारी के बयान पर भरोसा किया। जांच के दौरान उन्होंने कहा कि अगस्त 2007 में आर्य समाज मंदिर में उनकी शादी हुई। आर्य समाज मंदिर के पुजारी से भी पूछताछ की गई। पुजारी ने कहा कि विवाह उनकी मौजूदगी में संपन्न हुआ था। मामले में नोटरी प्रमाणपत्र भी पेश किए गए।
इन्हीं दस्तावेजों और बयानों के आधार पर अधिकारियों ने माना कि पांडेय ने सेवा में नियुक्ति के समय खुद को अविवाहित बताकर गलत घोषणा की।
हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के प्रिया बाला घोष बनाम सुरेश चंद्र घोष मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह की वैधता के लिए आवश्यक हिंदू रीति-रिवाजों का पालन और सप्तपदी जैसी अनिवार्य रस्मों का संपन्न होना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने खास तौर पर इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि शिकायतकर्ता ने खुद आपराधिक मुकदमे की सुनवाई के दौरान कहा कि विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा,
“केवल आर्य समाज मंदिर का कोई प्रमाणपत्र पेश करने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार संपन्न हुआ था।”
अदालत ने इसके आधार पर कहा कि पांडेय और सुचेता तिवारी के बीच 2007 में हुआ कथित विवाह कानून की नजर में वैध विवाह नहीं माना जा सकता। इसलिए इस कथित विवाह को पांडेय को सेवा के लिए अनुपयुक्त ठहराने का आधार भी नहीं बनाया जा सकता।
विभागीय अधिकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि पांडेय ने पहले 16 अगस्त 2007 को सुचेता तिवारी से विवाह किया और बाद में 13 दिसंबर 2015 को साधना तिवारी से शादी की। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानूनी सिद्धांत के अनुसार 2007 का कथित विवाह कानून की नजर में विवाह नहीं माना जा सकता।
इसके चलते अदालत ने पांडेय को सेवा से हटाने के लिए जारी 28 अप्रैल 2022 के आदेश को टिकाऊ नहीं माना और उसे रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों को रोहित पांडेय को तत्काल ड्यूटी पर वापस लेने का निर्देश दिया। हालांकि, 28 अप्रैल 2022 से फैसले की तारीख तक की अवधि को “काम नहीं तो वेतन नहीं” के सिद्धांत के तहत माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अवधि को उनकी सेवा में व्यवधान या सेवा टूटने के रूप में नहीं माना जाएगा।