इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक दस साल की बच्ची की कस्टडी उसके पिता को सौंपने का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब कस्टडी बदलने का एकमात्र कारण बच्ची की स्कूल की पढ़ाई में रुकावट थी, तो कोर्ट को पहले यह देखना चाहिए कि क्या वह अपनी माँ के साथ रहते हुए भी पढ़ाई जारी रख सकती है, खासकर तब जब बच्ची ने कहा हो कि वह अपनी माँ के साथ रहना चाहती है।

चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की बेंच ने कहा,

"हमारी राय है कि संबंधित सिंगल जज को इस संभावना पर विचार करना चाहिए कि बच्ची अपनी माँ के साथ रहते हुए भी समरविले स्कूल में अपनी पढ़ाई जारी रख सके, खासकर उसकी माँ के साथ रहने की इच्छा को देखते हुए। ऐसा लगता है कि सिंगल जज ने इस विकल्प पर विचार नहीं किया।"

वैवाहिक विवाद के कारण माँ 17.05.2026 को ससुराल छोड़कर अपनी बेटी के साथ अपने माता-पिता के घर रहने लगी। पिता ने कस्टडी के लिए 'हेबियस कॉर्पस' याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि समरविले स्कूल, गौतम बुद्ध नगर, नोएडा में पांचवीं कक्षा की छात्रा बच्ची, माँ के जाने के बाद स्कूल नहीं जा रही थी। यह बात मानी गई कि बच्ची तब से स्कूल नहीं गई। इसका कारण यह बताया गया कि उसे हेरिटेज स्कूल में दाखिला दिलाना था, जहाँ उसकी माँ पढ़ाती है, लेकिन पिता ने दाखिले के लिए ज़रूरी 'नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) नहीं दिया।

सिंगल जज ने माता-पिता और बच्ची, तीनों से बात की। बच्ची ने कहा कि वह किसी स्कूल में नहीं जा रही है, क्योंकि अभी तक उसका कहीं दाखिला नहीं हुआ, लेकिन वह अपनी माँ के साथ रहना चाहती है। यह मानते हुए कि उसकी पढ़ाई पर बुरा असर पड़ रहा है। पिता के नियमित स्कूलिंग और उचित देखभाल के वादे पर भरोसा करते हुए सिंगल जज ने कस्टडी पिता को सौंप दी। साथ ही माँ को बच्ची से मिलने का अधिकार (विज़िटेशन राइट्स), रोज़ाना वीडियो कॉल करने और छुट्टियों में कस्टडी पाने का अधिकार दिया। अपील में माँ ने तर्क दिया कि जब बच्चे ने उसके साथ रहने की इच्छा जताई तो ट्रांसफर का आदेश नहीं दिया जाना चाहिए। साथ ही पिता हेरिटेज स्कूल के लिए 'नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) नहीं दे रहे थे, जिसके लिए उसने 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890' के तहत गौतम बुद्ध नगर की फैमिली कोर्ट में अर्जी दी।

पिता के वकील ने तर्क दिया कि बच्चे को स्कूल न भेजने का माँ का व्यवहार ही सब कुछ बयां करता है। जब कोर्ट ने पूछा कि क्या वह हेरिटेज स्कूल में एडमिशन होने तक बच्चे को समरविले स्कूल वापस भेजेगी तो माँ ने अपने वकील के ज़रिए इसके लिए सहमति दी।

कोर्ट ने गौर किया कि सिंगल जज ने दस साल के बच्चे की अपनी माँ के साथ रहने की इच्छा को दर्ज किया, लेकिन इसके बावजूद दूसरा आदेश दिया, क्योंकि बच्चे की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है। अब जब माँ समरविले स्कूल में बच्चे की पढ़ाई जारी रखने के लिए सहमत हो गई तो कोर्ट ने माना कि जिस आधार पर कस्टडी मांगी और दी गई, वह आधार अब खत्म हो गया।

आगे कहा गया,

"इस बात को देखते हुए कि रेस्पोंडेंट (पिता) को बच्चे की कस्टडी सौंपने का मुख्य कारण बच्चे की पढ़ाई जारी रखना था - जो अब अपीलकर्ता (माँ) की कस्टडी में रहते हुए भी जारी रह सकती है, क्योंकि वह इस बात पर सहमत हो गई कि बच्चा हेरिटेज स्कूल में एडमिशन मिलने तक समरविले स्कूल में अपनी पढ़ाई जारी रखेगा - इसलिए याचिका दायर करने/कस्टडी मांगने और कोर्ट द्वारा उसे मंज़ूरी देने का कारण अब खत्म हो गया।"

माँ को कस्टडी वापस सौंपते हुए कोर्ट ने पिता को हर दूसरे रविवार को तीन घंटे के लिए ससुराल में बच्चे से मिलने (विज़िटेशन), स्कूल की लंबी छुट्टियों के दौरान लगातार पांच दिनों के लिए अस्थायी कस्टडी, और उचित समय पर मोबाइल फोन से संपर्क करने की अनुमति दी।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगले दिन बच्चे को वापस सौंप दिया जाए और गौतम बुद्ध नगर के पी.एस. फेज-I के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि दोनों पक्षों में से कोई भी इसमें बाधा न डाले।

इसके अनुसार, सिंगल जज का आदेश रद्द किया गया और अपील मंज़ूर की गई।

Case Title : V v. State of U.P. and 4 others

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