हुक्का बार पर फैसले के बाद जस्टिस शेखर बी. सराफ ने लिखी कविता, युवाओं से तंबाकू से दूर रहने की अपील
उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक स्थानों पर निर्धारित धूम्रपान क्षेत्रों में हुक्का सेवा देने को अवैध ठहराने वाले 90 पन्नों के फैसले के अंत में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर बी. सराफ ने अपने धूम्रपान के अनुभव पर एक कविता लिखी। उन्होंने अपने अनुभव के जरिए युवाओं को तंबाकू की लत से दूर रहने की सलाह दी।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अभ्देश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि उत्तर प्रदेश में हुक्का बार निर्धारित धूम्रपान क्षेत्रों में हुक्का सेवा देकर कानूनी रूप से संचालित नहीं किए जा सकते।
फैसले के अंत में “तंबाकू सेवन के साथ मेरा अनुभव” शीर्षक से जस्टिस सराफ ने लिखा कि अपने धूम्रपान के अनुभव से प्रेरित होकर वह देश की युवा पीढ़ी को तंबाकू सेवन की हानिकारक और लंबे समय तक बनी रहने वाली आदत का शिकार होने से बचाने के लिए ये अंतिम पंक्तियां लिख रहे हैं।
उन्होंने कविता में कानून की पढ़ाई के दिनों को याद किया। उन्होंने लिखा कि शुरुआत में वह धूम्रपान करने वालों को देखकर उनका मजाक उड़ाते थे और मानते थे कि वह कभी धूम्रपान नहीं करेंगे। लेकिन एक दिन चाय के दौरान एक सीनियर ने उन्हें केवल मजाक के तौर पर सिगरेट पीने की पेशकश की और उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया।
इसके बाद कभी-कभार पी जाने वाली सिगरेट धीरे-धीरे आदत में बदल गई। उन्होंने लिखा कि शुरुआत में वह खुद को “सामाजिक धूम्रपान करने वाला” मानते रहे और उन्हें लगता रहा कि उनका इस पर नियंत्रण है, लेकिन धीरे-धीरे सिगरेट की संख्या बढ़ती चली गई।
कविता में जस्टिस सराफ ने धूम्रपान के बाद होने वाली खांसी और बलगम का भी जिक्र किया। उन्होंने धूम्रपान छोड़ने के लिए निकोटीन पैच और गम का इस्तेमाल करने की कोशिशों का उल्लेख करते हुए लिखा कि कई बार छोड़ने का संकल्प लेने के बावजूद वह उस पर कायम नहीं रह सके। हर साल नए संकल्प के साथ शुरुआत होती, लेकिन आदत बनी रहती।
उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए लिखा कि पहली सिगरेट भले ही नुकसानरहित लगे, लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर युवाओं से उस रास्ते पर न जाने की अपील की, जिस पर चलकर वह खुद धूम्रपान की आदत में फंस गए।
खंडपीठ ने फैसले में हुक्का सेवन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को भी गंभीरता से रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि करीब एक घंटे तक चलने वाले हुक्का सेवन के दौरान लगभग 200 कश लिए जाने का अनुमान है और इसका नुकसान करीब 100 सिगरेट पीने के बराबर बताया गया।
अदालत ने इस धारणा को भी खारिज किया कि हुक्का सिगरेट की तुलना में जरूरी तौर पर कम नुकसानदायक है। खंडपीठ ने कहा कि हुक्का सिगरेट जितना ही नशीला और हानिकारक है तथा इसमें सिगरेट के समान जहरीले रसायन पाए जाते हैं।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि गुजरात, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक समेत कई राज्यों ने सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम में राज्य स्तर पर संशोधन कर हुक्का बार पर विशेष रूप से रोक लगाई और उल्लंघन के लिए सजा एवं जुर्माने में वृद्धि की।
हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को भी नागरिकों के स्वास्थ्य और कल्याण को ध्यान में रखते हुए इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने चाहिए। अदालत ने उम्मीद जताई कि राज्य सरकार अन्य राज्यों की तर्ज पर अधिसूचना जारी कर निर्धारित धूम्रपान क्षेत्रों में भी हुक्का सेवा देने पर कड़ी सजा का प्रावधान करेगी।
फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को भी सूचना एवं आवश्यक अनुपालन के लिए भेजने का निर्देश दिया गया।