UPTET: दो सही विकल्प वाले सवाल मूल्यांकन से हटेंगे, सभी अभ्यर्थियों को मिलेगा समान लाभ: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET) 2026 से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी बहुविकल्पीय प्रश्न में उत्तर चुनने की अपेक्षा हो, लेकिन परीक्षा कराने वाला आयोग स्वयं दो विकल्पों को सही मान लेता है तो ऐसे प्रश्न को मूल्यांकन से हटा देना चाहिए। इसका लाभ सभी अभ्यर्थियों को समान रूप से दिया जाएगा, न कि केवल उन अभ्यर्थियों को जिन्होंने आयोग द्वारा सही माने गए दो विकल्पों में से कोई एक चुना था।
जस्टिस विनोद दीवाकर ने कहा कि चार विकल्पों वाले ऐसे प्रश्न में, जिसमें अभ्यर्थी को केवल एक सही उत्तर चुनना होता है, यदि परीक्षा कराने वाली संस्था दो विकल्पों को सही मान लेती है तो वह प्रश्न मूल्यांकन का उद्देश्य पूरा नहीं करता। ऐसे प्रश्न से यह पता नहीं लगाया जा सकता कि अभ्यर्थी को उत्तर पता था या नहीं।
मामला UPTET 2026 की प्राथमिक स्तर की परीक्षा के मास्टर सेट के प्रश्न संख्या 36 और 37 से जुड़ा था। उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग की ओर से जारी अंतिम उत्तर कुंजी में दोनों प्रश्नों के दो-दो विकल्प सही माने गए।
चार अभ्यर्थियों ने 3 जुलाई 2026 को आयोजित प्राथमिक स्तर की परीक्षा दी थी। 26 अगस्त 2026 को परिणाम के साथ जारी अंतिम उत्तर कुंजी में प्रश्न संख्या 36 के विकल्प (B) और (D), जबकि प्रश्न संख्या 37 के विकल्प (A) और (D) को सही माना गया।
चारों याचिकाकर्ताओं को अनुत्तीर्ण घोषित किया गया। उनके सामान्यीकृत अंक 80.40104 से 81.39740 के बीच थे, जबकि उत्तीर्ण होने के लिए 82 अंक आवश्यक थे। आयोग ने इन दोनों प्रश्नों के अंक केवल उन्हीं अभ्यर्थियों को दिए, जिन्होंने उसके द्वारा सही माने गए विकल्पों में से कोई एक चुना था। याचिकाकर्ताओं ने ऐसा कोई विकल्प नहीं चुना था।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने व्यक्तिगत रूप से अंक देने की मांग छोड़ते हुए केवल यह दलील दी कि त्रुटिपूर्ण दोनों प्रश्नों को मूल्यांकन से हटाया जाए या फिर सभी अभ्यर्थियों को समान अंक दिए जाएं, चाहे उन्होंने कोई भी विकल्प चुना हो।
इस मामले में शिमला सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के 19 दिसंबर 2018 के फैसले का हवाला दिया गया। उस मामले में हाईकोर्ट ने कहा था कि UPTET एक पात्रता परीक्षा है, जिसमें अभ्यर्थियों के बीच आपसी मेरिट के आधार पर प्रतिस्पर्धा नहीं होती। इसलिए एक से अधिक सही उत्तर वाले प्रश्नों पर प्रत्येक अभ्यर्थी को एक अंक देने का निर्देश दिया गया।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि आयोग ने इसी प्रश्नपत्र के प्रश्न संख्या 38 को स्वयं मूल्यांकन से हटा दिया।
आयोग की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ताओं ने दोनों प्रश्नों के लिए आयोग द्वारा स्वीकार किए गए किसी भी विकल्प को नहीं चुना था और उन्होंने प्रारंभिक उत्तर कुंजी पर आपत्ति भी नहीं की थी। आयोग ने यह भी कहा कि श्रीमती शिमला सिंह का फैसला सही कानून नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसमें डिवीजन बेंच के सुनील कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले पर विचार नहीं किया गया।
इसके जवाब में याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 अगस्त 2026 को सुनील कुमार सिंह के फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं की शिकायत उत्तर कुंजी में दिए गए उत्तरों से असहमति को लेकर नहीं थी। विवाद इसलिए पैदा हुआ, क्योंकि आयोग ने खुद दो विकल्पों को सही माना था।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग बनाम अशोक यादव मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। इसमें कहा गया कि जब ऐसे प्रश्न में दो उत्तर सही हो सकते हैं, जिसमें केवल एक उत्तर चुनना हो, तो अदालत उस प्रश्न को मूल्यांकन से हटाने का आदेश दे सकती है। हाईकोर्ट ने रण विजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें ऐसी स्थिति से निपटने के लिए प्रश्न को मूल्यांकन से हटाना उचित तरीका बताया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इसी परीक्षा में आयोग ने प्रश्न संख्या 38 को मूल्यांकन से हटाया था। ऐसे में यह समझने का कोई आधार नहीं है कि दो सही विकल्प वाले प्रश्न संख्या 36 और 37 के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जाए।
कोर्ट ने कहा कि आयोग की यह व्यवस्था उचित नहीं है, जिसमें दो स्वीकार्य विकल्पों में से किसी एक को चुनने वाले अभ्यर्थियों को ही अंक दिए गए। यह व्यवस्था ऐसे प्रश्न पर अभ्यर्थी के संयोगवश किए गए चयन को पुरस्कृत करने जैसी है, जिसमें एक निश्चित सही उत्तर था ही नहीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रश्न को मूल्यांकन से हटाने का तरीका सभी अभ्यर्थियों के साथ समान व्यवहार करता है। इससे किसी को त्रुटिपूर्ण प्रश्न के आधार पर न तो अतिरिक्त लाभ मिलता है और न ही किसी को नुकसान होता है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रश्न संख्या 36 और 37 को मूल्यांकन से हटाकर प्रश्नपत्र को 148 प्रश्नों का माना जाए। उत्तीर्ण होने के लिए निर्धारित प्रतिशत के आधार पर मानक तय किया जाए। इस संबंध में रिशाल बनाम राजस्थान लोक सेवा आयोग के फैसले का पालन करने का निर्देश दिया गया।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि दोनों प्रश्नों को मूल्यांकन से हटाने का लाभ सभी समान स्थिति वाले अभ्यर्थियों को समान रूप से दिया जाए। यह लाभ केवल उन अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहेगा, जिन्होंने आयोग द्वारा स्वीकार किए गए दो विकल्पों में से कोई एक चुना था। आयोग को याचिकाकर्ताओं के अंकों की दोबारा गणना कर उनके परिणाम में सुधार करने का निर्देश दिया गया।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस राहत के आधार पर किसी अभ्यर्थी को भविष्य की भर्ती में नियुक्ति या चयन का स्वतः अधिकार नहीं मिलेगा। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा किया।