इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि विभागीय रिकॉर्ड में नियुक्ति का अनुमोदन आदेश नहीं मिलना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अनुमोदन कभी दिया ही नहीं गया। इससे भी कम आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित कर्मचारी ने दस्तावेज तैयार कराकर या उनमें हेराफेरी करके नियुक्ति हासिल की थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार किसी नियुक्ति को धोखाधड़ी से प्राप्त बताना चाहती है तो उसे यह बताना होगा कि कौन-सा गलत तथ्य पेश किया गया या कौन-सा दस्तावेज जाली है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है और उसका संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति से क्या संबंध है।

जस्टिस मंजू रानी चौहान की पीठ मऊ जिले के 15 सहायक अध्यापकों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन शिक्षकों की नियुक्तियां वर्ष 2010 से 2016 के बीच उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त निजी प्रबंधन वाले बेसिक विद्यालयों में हुई थीं। इन विद्यालयों को समाज कल्याण विभाग से अनुदान मिलता है, जो शिक्षकों के वेतन भुगतान तक सीमित है।

अदालत ने कहा कि किसी दस्तावेज का रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं होना और उसका कभी अस्तित्व में ही नहीं होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। रिकॉर्ड कक्ष में कोई अनुमोदन आदेश कई कारणों से नहीं मिल सकता। केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि आदेश जारी ही नहीं हुआ या याचिकाकर्ता ने उसे जाली बनाया।

इन शिक्षकों की नियुक्तियां संबंधित विद्यालयों की प्रबंध समितियों ने मऊ के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से अनुमोदन मिलने के बाद की थीं। इसके बाद नियुक्तियों से संबंधित कागजात जिला समाज कल्याण अधिकारी और समाज कल्याण निदेशक लखनऊ के माध्यम से राज्य सरकार तक पहुंचे। राज्य सरकार ने वर्ष 2016 से 2017 के बीच अलग-अलग आदेश जारी कर इन नियुक्तियों को वित्तीय मंजूरी दी थी। इसके बाद शिक्षकों को वेतन भी दिया जाने लगा।वर्ष 2018 में मऊ के जिलाधिकारी के आदेश पर शिक्षकों का वेतन रोक दिया गया। विद्यालयों के प्रबंधकों और नियुक्त शिक्षकों के खिलाफ FIR भी दर्ज की गई। इसके बाद राजेश तिवारी एवं 10 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 9 अन्य मामले में हाईकोर्ट ने 23 अप्रैल 2018 को शिक्षकों के वेतन का भुगतान हर महीने करने का निर्देश दिया। हालांकि, अदालत ने अधिकारियों को कानून के अनुसार नियुक्तियों की जांच करने की छूट भी दी थी।

इसके बाद 10 अगस्त 2018 को गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने 28 नवंबर 2018 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार ने 24 जुलाई 2019 को चार शिक्षकों की नियुक्तियों का अनुमोदन रद्द किया, क्योंकि उनकी शैक्षणिक योग्यताओं का सत्यापन नहीं हो पाया। हालांकि वर्तमान याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियों को उस समय प्रभावित नहीं किया गया। शिक्षकों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी की जांच के बाद 7 जून 2020 को फाइनल रिपोर्ट दाखिल की गई जिसे सक्षम अदालत ने स्वीकार कर लिया था।

वर्ष 2025 में यह मामला दोबारा खुला। विधानसभा में समाज कल्याण विभाग से अनुदान प्राप्त संस्थानों में वर्ष 2014 के बाद नियुक्त सहायक अध्यापकों की नियुक्तियों को लेकर सवाल उठाए गए। इसके बाद 29 जुलाई 2025 को अपर मुख्य सचिव ने जिलाधिकारियों के माध्यम से नए सिरे से जांच कराने का निर्देश दिया। इसी तारीख को जारी एक अन्य आदेश में FIR दर्ज करने और पहले भुगतान किए जा चुके वेतन की वसूली करने का निर्देश भी दिया गया।

मऊ के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 25 अप्रैल 2025, 13 जून 2025, 17 जून 2025 और 23 जून 2025 को जारी पत्रों में बताया कि संबंधित शिक्षकों की नियुक्तियों के अनुमोदन से जुड़े आदेश कार्यालय के रिकॉर्ड में नहीं मिल रहे हैं। इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर जिला समाज कल्याण अधिकारी ने 18 जुलाई 2025 को आदेश जारी कर विद्यालय प्रबंधनों को शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

इस बीच 5 अगस्त 2025 को एक नई FIR दर्ज की गई। इस मामले में भी जांच अधिकारी ने 7 अप्रैल 2026 को अंतिम रिपोर्ट दाखिल की। वहीं, 12 दिसंबर 2025 के आदेश से विद्यालयों को मिलने वाला अनुदान रोक दिया गया और शिक्षकों का वेतन भुगतान भी बंद कर दिया गया।

याचिकाकर्ता शिक्षकों ने अदालत में दलील दी कि सत्यापन की पूरी प्रक्रिया उनकी जानकारी के बिना और उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बगैर की गई। उन्होंने कहा कि जांच आधिकारिक रिकॉर्ड, सूचना का अधिकार कानून के तहत प्राप्त डिस्पैच रजिस्टर की प्रविष्टियों और खंड शिक्षा अधिकारी की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के विपरीत थी। शिक्षकों के अनुसार जिन अधिकारियों ने नियुक्तियों के अनुमोदन संबंधी आदेश जारी किए थे उन्होंने जांच अधिकारी को लिखे पत्रों में उन आदेशों की पुष्टि भी की थी।

शिक्षकों ने यह भी दलील दी कि जिन नियुक्तियों की विभागीय जांच हो चुकी थी और जिनके संबंध में दो बार आपराधिक जांच की जा चुकी थी, उन्हें वर्षों बाद एकतरफा प्रक्रिया के आधार पर धोखाधड़ी से प्राप्त नियुक्तियां घोषित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि विधानसभा में किसी नियुक्ति को लेकर सवाल उठने पर प्रशासनिक तंत्र को जांच शुरू करने का आधार मिल सकता है, लेकिन उस सवाल में लगाए गए आरोपों को उन सभी कर्मचारियों के खिलाफ साबित तथ्य नहीं माना जा सकता, जो उस सवाल के दायरे में आते हों। अदालत ने स्पष्ट किया कि विधानसभा में उठाया गया सवाल जांच शुरू करने का कारण हो सकता है लेकिन वह किसी कर्मचारी के दोषी होने का प्रमाण नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि वर्ष 2018 की जांच और उसके आधार पर राज्य सरकार की ओर से 24 जुलाई 2019 को पारित आदेश को ऐसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, मानो वे कभी अस्तित्व में ही नहीं थे। उस समय सरकार ने अलग-अलग शिक्षकों के मामलों की जांच कर चार शिक्षकों के अनुमोदन रद्द किए लेकिन वर्तमान याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियों को बरकरार रखा। ऐसे में अब विपरीत निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले राज्य सरकार को बताना होगा कि पहले की स्थिति के बाद ऐसा क्या नया सामने आया जिसके आधार पर वही आरोप दोबारा उठाए जा रहे हैं।

पीठ ने पाया कि अधिकारियों के तर्कों में भी विरोधाभास है। एक ओर राज्य सरकार के पक्ष में यह कहा गया कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की पूर्व मंजूरी नियुक्ति के लिए अनिवार्य वैधानिक शर्त थी जबकि पहले की विभागीय सामग्री में समाज कल्याण विभाग से अनुदान प्राप्त विद्यालयों पर लागू व्यवस्था की अलग व्याख्या दिखाई देती है। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार लागू कानून की दो परस्पर विरोधी व्याख्याएं अपनाकर उनमें से किसी एक का इस्तेमाल याचिकाकर्ताओं के खिलाफ प्रतिकूल परिणाम निकालने के लिए नहीं कर सकती।

अदालत ने धोखाधड़ी से संबंधित कानूनी सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि धोखाधड़ी साबित होने पर वह किसी वैधानिक या औपचारिक कार्रवाई को निष्प्रभावी कर सकती है लेकिन पहले धोखाधड़ी का प्रमाण होना आवश्यक है। केवल किसी कार्रवाई को धोखाधड़ी बता देने से आरोप साबित नहीं हो जाता।

सुप्रीम कोर्ट के नरेश कुमार सिन्हा बनाम बिहार राज्य एवं अन्य मामले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड का पता नहीं चलना अपने आप में नियुक्ति को जाली या फर्जी साबित नहीं करता। धोखाधड़ी के आरोप के समर्थन में उसके बुनियादी तथ्य प्रस्तुत करना जरूरी है। यदि विभागीय रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है तो पहले यह पता लगाया जाना चाहिए कि वह रिकॉर्ड कहां गया और उसकी देखरेख की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी। रिकॉर्ड की अनुपलब्धता के लिए सीधे उस कर्मचारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता जिसकी नियुक्ति की जांच हो रही है।

अदालत ने कहा कि यदि विभाग का दावा है कि संबंधित रिकॉर्ड गायब हो गया या उसका पता नहीं चल रहा है तो सबसे पहले रिकॉर्ड के गायब होने की परिस्थितियों और उसकी अभिरक्षा के लिए जिम्मेदार लोगों की जांच होनी चाहिए। कर्मचारी पर धोखाधड़ी का कलंक लगाने के लिए रिकॉर्ड का न मिलना अपने आप में पर्याप्त आधार नहीं है।

हाईकोर्ट ने इस दलील को भी खारिज किया कि यदि नियुक्ति शून्य या अवैध है तो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत सुनवाई देना जरूरी नहीं है। अदालत ने कहा कि नियुक्ति अवैध है या नहीं, यही तो जांच का मूल प्रश्न है। अधिकारी पहले नियुक्ति को अवैध मानकर उसी धारणा के आधार पर सुनवाई का अवसर देने से इनकार नहीं कर सकते।

पीठ ने कहा कि प्रशासनिक सत्यापन की प्रक्रिया धीरे-धीरे ऐसे निष्कर्ष में बदल गई, जिसका शिक्षकों की सेवा और आजीविका पर सीधा असर पड़ा। ऐसी स्थिति में शिक्षकों को उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा रही सामग्री देखने और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना आवश्यक था।

अदालत ने मोहिंदर सिंह गिल एवं अन्य बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त, नई दिल्ली एवं अन्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि किसी आदेश को बाद में नए कारण जोड़कर सही नहीं ठहराया जा सकता। वहीं क्रांति एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम मसूद अहमद खान एवं अन्य मामले के आधार पर अदालत ने कहा कि आदेश में दर्ज कारणों से यह स्पष्ट होना चाहिए कि जिन तथ्यों और सामग्री पर भरोसा किया गया, उनका निकाले गए निष्कर्ष से तार्किक संबंध है।

पीठ ने कहा कि राज्य सरकार को दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले आरोप साबित करने होंगे किसी कर्मचारी की निंदा करने से पहले सत्यापन करना होगा, उसके खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई से पहले सुनवाई का अवसर देना होगा और अपने पहले के विचारपूर्ण प्रशासनिक निर्णय को पलटने से पहले उसके कारण स्पष्ट करने होंगे।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने 25 अप्रैल 2025, 13 जून 2025 17 जून 2025 और 23 जून 2025 की जांच रिपोर्टों को तथा 18 जुलाई 2025 के परिणामी आदेश को याचिकाकर्ताओं के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष दर्ज किए जाने की सीमा तक रद्द किया। अदालत ने उन रिपोर्टों के आधार पर की गई कार्रवाई को भी निरस्त कर दिया, जो पूरी तरह इन्हीं रिपोर्टों पर आधारित थी।

हालांकि हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को नए सिरे से सत्यापन करने की छूट दी। अदालत ने इसके लिए कुछ शर्तें निर्धारित कीं। नई जांच विधानसभा में उठाए गए सवाल के संबंध में जारी निर्देशों के दायरे में ही रहनी चाहिए। जांच में 28 नवंबर 2018 की रिपोर्ट और 24 जुलाई 2019 के सरकारी आदेश पर विचार करना होगा। मूल रिकॉर्ड की जांच उन अधिकारियों या कार्यालयों से की जानी चाहिए, जिनके पास उसकी अभिरक्षा की जिम्मेदारी है।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि कोई प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित शिक्षक और विद्यालय की प्रबंध समिति को जांच में सामने आई सामग्री उपलब्ध कराई जाए तथा अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाए। यदि धोखाधड़ी का आरोप लगाया जाता है तो अंतिम आदेश में उस विशेष कृत्य या दस्तावेज की पहचान करनी होगी जिसके आधार पर धोखाधड़ी का निष्कर्ष निकाला जा रहा है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नई जांच पूरी होने तक संबंधित शिक्षकों को विवादित रिपोर्टों के आधार पर सेवा से हटाया हुआ नहीं माना जाएगा। साथ ही, जिस अवधि में उन्होंने वास्तव में अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, उस अवधि के वेतन के दावे पर सक्षम अधिकारी को दोबारा विचार करना होगा। इस दौरान रद्द की गई रिपोर्टों में दर्ज निष्कर्षों से प्रभावित हुए बिना वेतन संबंधी दावे पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

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