इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते राज्य पर ₹1,00,000 का जुर्माना लगाया। यह जुर्माना काउंटर एफिडेविट दाखिल करने में 3 दशकों से ज़्यादा की बिना वजह देरी और अंतरिम आदेश का पालन न होने की बात कोर्ट के ध्यान में न लाने के लिए लगाया गया। साथ ही रिट याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज भी किया गया।

जस्टिस गरिमा प्रसाद ने कहा:

"राज्य इस चूक के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से सिर्फ़ इसलिए नहीं बच सकता, क्योंकि याचिकाकर्ता अपना मुख्य दावा साबित करने में नाकाम रहा है। इतनी लंबी देरी के कारण कोर्ट को संबंधित अधिकारियों से समय पर मदद नहीं मिल पाई और अंतरिम आदेश के पालन का मुद्दा तब तक अनसुलझा रहा जब तक याचिकाकर्ता रिटायरमेंट की उम्र पार नहीं कर गया। इसलिए याचिकाकर्ता हर्जाने (कॉस्ट) के रूप में मुआवज़ा पाने का हकदार है। हालांकि उसे सेवा से जुड़े वे लाभ नहीं मिल सकते जिनका कोई कानूनी अधिकार उसने साबित नहीं किया।"

याचिकाकर्ता को शुरू में बहराइच ज़िला सहकारी बैंक लिमिटेड में 'सहयोगी' के पद पर क्लास IV कर्मचारी के तौर पर नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति 07.09.1993 और 22.12.1993 के आदेशों के तहत हुई, जिनमें नियुक्ति को पूरी तरह से अस्थायी बताया गया। नियुक्ति 89 दिनों से ज़्यादा समय के लिए नहीं थी, इसे बिना किसी पूर्व सूचना के खत्म किया जा सकता था और यह नियमित चयन प्रक्रिया से पद भरे जाने की शर्त के अधीन है।

प्रतिवादियों ने दलील दी कि जिस अधिकारी ने नियुक्ति का आदेश जारी किया, उसे सेक्रेटरी/जनरल मैनेजर की मौत के बाद उनके काम को संभालने के लिए अधिकृत किया गया और वह नियुक्ति करने के लिए सक्षम नहीं है।

सहकारी समिति के डिप्टी रजिस्ट्रार ने उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1965 की धारा 128 का इस्तेमाल करते हुए उस अधिकार और उसके तहत जारी नियुक्ति आदेशों को रद्द किया, जिसके बाद बैंक ने मार्च 1994 में याचिकाकर्ता को सेवा से हटा दिया।

02.05.1994 को हाईकोर्ट ने विवादित आदेश पर रोक लगाई और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को काम करने दें और उसे वेतन दें। याचिकाकर्ता के अनुसार, उस निर्देश का कभी पालन नहीं किया गया।

कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को तय समय के बाद भी काम करते रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं मिला, क्योंकि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे पता चले कि उसका कार्यकाल बढ़ाया गया या उसकी सेवा को रेगुलर किया गया। भले ही उस पद पर रेगुलर तरीके से चुने गए किसी उम्मीदवार ने काम न किया हो, कोर्ट ने माना कि एक तय समय वाली अस्थायी नियुक्ति अपने आप स्थायी नहीं बन जाती।

उसकी यह शिकायत कि डिप्टी रजिस्ट्रार ने न तो धारा 128 के प्रावधान के तहत पुनर्विचार के लिए कहा और न ही उसकी बात सुनी, उसे राहत पाने का हकदार नहीं बनाती; 'रिट ऑफ़ सर्टिओरारी' (निर्णय की समीक्षा का आदेश) कोर्ट की मर्जी पर निर्भर करता है। इसे तब जारी नहीं किया जाता, जब विवादित कार्रवाई रद्द करने से केवल ऐसी नियुक्ति फिर से शुरू हो जाए, जिसे बनाए नहीं रखा जा सकता था या जो समय बीतने के साथ पहले ही खत्म हो चुकी है।

अंतरिम आदेश के बारे में कोर्ट ने माना कि प्रतिवादियों द्वारा उसका पालन न करना असंतोषजनक है, लेकिन इससे याचिकाकर्ता के मुख्य दावे को कोई मदद नहीं मिली।

कोर्ट ने आगे कहा,

"फिर भी अंतरिम आदेश का मकसद अंतिम फैसले तक कार्यवाही के विषय को सुरक्षित रखना होता है। यह कोई ऐसा मुख्य अधिकार नहीं बना सकता या बढ़ा सकता है, जो याचिकाकर्ता के पास पहले से नहीं है।"

याचिकाकर्ता ने मार्च 1994 के बाद कोई काम नहीं किया, जबकि पालन न होने की शिकायत करने वाला पहला हलफनामा 2017 में ही दाखिल किया गया। वह 20.04.2026 को रिटायरमेंट की उम्र तक भी पहुंच गया। इसलिए उसे पद पर शामिल होने या बने रहने की अनुमति देने वाला कोई भी निर्देश लागू नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा,

"सिर्फ इसलिए कि रिट याचिका लंबित रही, 89 दिनों तक सीमित नियुक्ति रिटायरमेंट की तारीख तक वेतन, पेंशन या सेवा से जुड़े अन्य लाभों के दावे का आधार नहीं बन सकती।"

कोर्ट ने दर्ज किया कि प्रतिवादी नंबर 3 और 4, जिनके कार्यों के आधार पर विवादित आदेश दिए गए, उन्होंने 02.05.1994 के छह सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने के कोर्ट के निर्देश के बावजूद, 2025 में और आदेश पारित होने के बाद ही अपना जवाबी हलफनामा दाखिल किया।

तीन दशक से अधिक की देरी के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि उसके अंतरिम निर्देश का पालन न होने की बात कभी उसके ध्यान में नहीं लाई गई। इसके अनुसार, रिट याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज किया गया और अंतरिम आदेश रद्द कर दिया गया।

हालांकि, राज्य के अधिकारियों की ओर से हुई बिना वजह देरी और अंतरिम आदेश का पालन न होने की बात कोर्ट के ध्यान में न लाने की उनकी विफलता देखते हुए राज्य पर 1,00,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। प्रतिवादी नंबर 3 और 4 को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया कि यह राशि छह सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को भुगतान कर दी जाए।

Case Title : Uma Kant Tripathi vs. C/M Bahraich Coop Bank Ltd. 2026 LiveLaw (AB) 776

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