बिना शपथपत्र Class-I अधिकारी के खिलाफ शिकायत पर Vigilance Inquiry नहीं हो सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि राज्य के Class-I/Group-A अधिकारी के खिलाफ ऐसी शिकायत, जो अनिवार्य शपथपत्र (Affidavit) के साथ दाखिल नहीं की गई हो, उसके आधार पर Vigilance Inquiry शुरू नहीं की जा सकती, खासकर तब जब मामले को State Vigilance Committee के समक्ष मंजूरी के लिए नहीं रखा गया हो।
जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने एक IAS अधिकारी के खिलाफ शुरू की गई Vigilance Inquiry को रद्द करते हुए कहा कि संबंधित सरकारी आदेशों का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को फर्जी और झूठी शिकायतों के आधार पर प्रताड़ित होने से बचाना है।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता 2006 बैच के IAS अधिकारी हैं और उस समय Invest UP के Chief Executive Officer के पद पर कार्यरत थे।
20 मार्च 2025 को SAEL Solar P6 Private Limited के एक अधिकारी ने मुख्य सचिव के समक्ष शिकायत की। आरोप था कि कंपनी के Solar Manufacturing Project के प्रस्ताव पर विचार के दौरान Invest UP के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें एक निजी व्यक्ति निकांत जैन का नंबर दिया, जो कथित तौर पर प्रस्ताव को Cabinet स्तर तक मंजूर कराने में मदद कर सकता था।
आरोप लगाया गया कि निकांत जैन ने प्रोजेक्ट की लागत का 5% मांगा और मांग पूरी नहीं होने पर कंपनी का प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ा।
इसी दिन निकांत जैन के खिलाफ FIR दर्ज की गई, IAS अधिकारी को निलंबित कर उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई और Vigilance Inquiry का आदेश दिया गया।
शिकायत के साथ नहीं लगाया गया था Affidavit
हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत के समर्थन में आवश्यक Affidavit दाखिल नहीं किया गया था।
इसके बावजूद शिकायत वाले दिन ही शाम 7:47:17 बजे Vigilance Inquiry शुरू करने के लिए पत्र जारी कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया संबंधित सरकारी आदेशों के विपरीत थी।
सरकार के 1991, 1995, 1997 और 2018 के आदेशों में Group-A अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों के संबंध में Affidavit की आवश्यकता निर्धारित की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि इन प्रावधानों का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को फर्जी या झूठी शिकायतों के आधार पर उत्पीड़न से बचाना है।
State Vigilance Committee की मंजूरी भी नहीं ली गई
कोर्ट ने यह भी पाया कि Vigilance Inquiry शुरू करने से पहले मामले को State Vigilance Committee, जिसकी अध्यक्षता मुख्य सचिव करते हैं, के समक्ष मंजूरी के लिए नहीं रखा गया।
कोर्ट ने कहा कि विभागीय कार्यवाही शुरू होने के बाद अधिकारियों ने उसके परिणाम की प्रतीक्षा किए बिना Vigilance Department को जांच के लिए मामला भेज दिया।
शिकायतकर्ता ने बाद में आरोपों को गलतफहमी बताया
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि निकांत जैन के खिलाफ आरोपों को चुनौती देने वाली कार्यवाही में शिकायतकर्ता ने स्वयं Counter Affidavit दाखिल कर कहा कि शिकायत भ्रम और गलतफहमी में की गई थी।
हाईकोर्ट ने Evaluation Committee के रिकॉर्ड का भी परीक्षण किया। रिकॉर्ड से पता चला कि कंपनी का प्रस्ताव 200 एकड़ जमीन की उपलब्धता को लेकर YEIDA की पुष्टि और बिजली शुल्क संबंधी UPPCL की जानकारी लंबित होने के कारण स्थगित किया गया था।
“आधार ही हट गया तो पूरी कार्यवाही भी गिर जाएगी”
हाईकोर्ट ने “Sublato Fundamento Cadit Opus” के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि जब किसी कार्यवाही की बुनियाद ही हटा दी जाती है, तो उस पर खड़ी पूरी संरचना भी गिर जाती है।
कोर्ट ने कहा कि जब शिकायतकर्ता ने स्वयं शिकायत को गलत बताया है, तो उस शिकायत के आधार पर शुरू की गई पूरी कार्यवाही भी कायम नहीं रह सकती।
इसके बाद हाईकोर्ट ने IAS अधिकारी के खिलाफ जारी 20 मार्च 2025 और 28 मार्च 2025 के आदेशों तथा Open Vigilance Enquiry No. 64/2025 को रद्द कर दिया।