इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी को जलाकर मारने के आरोप में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में दर्ज dying declaration पर सुरक्षित रूप से भरोसा नहीं किया जा सकता।

जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने जगराम द्वारा दायर आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए 2018 में Additional District & Sessions Judge, Fast Track Court No. 3, Moradabad द्वारा IPC की धारा 304 के तहत दी गई life imprisonment की सजा रद्द कर दी।

मामला 23 दिसंबर 2015 का है। अभियोजन के अनुसार, जगराम ने अपनी पत्नी त्रिवेणी पर केरोसिन डालकर आग लगा दी थी। उसे Government Hospital, Moradabad ले जाया गया, जहां डॉक्टर द्वारा उसे बयान देने के लिए फिट घोषित किए जाने के बाद उसका dying declaration दर्ज किया गया। इसमें त्रिवेणी ने अपने पति पर केरोसिन डालकर आग लगाने का आरोप लगाया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने dying declaration की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया। मृतका के भाई PW-1 ने जिरह में बताया था कि मजिस्ट्रेट ने बयान परिवार के सभी सदस्यों की मौजूदगी में, जिसमें मृतका का बेटा, उसकी पत्नी और बुआ शामिल थीं, दर्ज किया था।

इस पर कोर्ट ने कहा, “जब dying declaration सभी परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में दर्ज किया गया था, तो इसे कोई महत्व नहीं दिया जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि पत्नी को बचाने की कोशिश में पति स्वयं भी झुलस गया था। बचाव पक्ष के डॉक्टर ने भी बताया कि उसकी चोटें किसी जलते हुए व्यक्ति को बुझाने की कोशिश के दौरान हो सकती थीं।

पीठ ने यह भी पाया कि दंपति की शादी को करीब 18 वर्ष हो चुके थे और उनके कोई बच्चे नहीं थे। रिकॉर्ड से संकेत मिला कि विवाद इस बात को लेकर था कि परिवार में किस पक्ष के बच्चे को गोद लिया जाए।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने केरोसिन डालकर अपनी पत्नी को आग लगाई थी। कोर्ट ने माना कि पति को इस घटना के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने trial court का 2018 का फैसला रद्द करते हुए आरोपी पति को आरोपों से सम्मानपूर्वक बरी (honourably acquitted) कर दिया।

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