'पैसा और रुतबा' से न्याय नहीं मिल सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹126 करोड़ के PMLA मामले में बिल्डर की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को 'उन्नति फॉर्च्यून होल्डिंग्स लिमिटेड' के मुख्य प्रमोटर और बिल्डर अनिल मिठास की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की। उन पर घर खरीदारों के ₹126.30 करोड़ के कथित हेरफेर को लेकर PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हैं।
एक अहम टिप्पणी में बेंच ने कहा कि व्हाइट-कॉलर अपराध इतने "व्यापक और नुकसानदेह" हो गए हैं कि उनसे निपटने के लिए "सख्त और बिना किसी समझौते के सख्ती" ही एकमात्र तरीका है।
बेंच ने आगे कहा कि ऐसे अपराधों से "सख्ती से" निपटने पर यह धारणा खत्म हो जाएगी कि "पैसा और रुतबा होने पर नरम न्याय मिलता है"।
जस्टिस कृष्ण पहल की बेंच ने मिठास को राहत देने से इनकार किया। बेंच ने कहा कि स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट से यह साबित हुआ है कि अलग-अलग आवंटियों से लिए गए ₹126.30 करोड़ का हेरफेर किया गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के वकील "ट्रायल में देरी" कर रहे थे।
हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि उसकी टिप्पणियां ज़मानत अर्ज़ी पर फैसला करने के लिए उसके सामने मौजूद तथ्यों तक ही सीमित थीं और ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर इनका कोई असर नहीं पड़ेगा।
मामले का संक्षिप्त विवरण
एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED) ने 23 दिसंबर, 2024 को लखनऊ में एक ECIR दर्ज की। इसमें आरोप लगाया गया कि मिठास ने 'अरण्य प्रोजेक्ट' में 1,468 यूनिट्स के लिए घर खरीदारों से ₹522.90 करोड़ जमा किए, लेकिन सिर्फ़ 35 घर खरीदारों को कब्ज़ा सौंपा। खबरों के मुताबिक, एक ऑडिट रिपोर्ट में ₹107 करोड़ के हेरफेर का पता चला।
इसके बाद ED ने आरोप लगाया कि उसकी जांच में ₹126.30 करोड़ को अपराध से हुई कमाई (Proceeds of Crime) के तौर पर पहचाना गया। आरोप है कि इस रकम का हेरफेर इक्विटी निवेश, डिबेंचर, बॉन्ड, प्रेफरेंस शेयर और सहयोगी कंपनियों को दिए गए लोन और एडवांस जैसे कई वित्तीय तरीकों से किया गया।
एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि ₹88 करोड़ एडवांस के तौर पर दिए गए और अकाउंट की किताबों में इसे 'वसूली न हो पाने वाली रकम' (Irrecoverable) के तौर पर दिखाया गया।
पेश की गई दलीलें
अभियोजन पक्ष के मामले को चुनौती देते हुए मिठास के वकील ने कहा कि जिन रकमों के हेरफेर का आरोप लगाया गया, वे असल में प्रमोटर का योगदान, इंटर-कॉर्पोरेट लोन, संस्थागत उधार या सिक्योरिटी डिपॉजिट थीं। यह भी बताया गया कि कंपनी को घर खरीदारों से लगभग ₹500 करोड़ मिले थे, लेकिन उसने करीब ₹670 करोड़ खर्च किए। इस वजह से कंपनी गंभीर आर्थिक संकट में फंस गई।
आवेदक ने तर्क दिया कि इस आर्थिक स्थिति से पता चलता है कि मनी लॉन्ड्रिंग या गलत तरीके से लाभ कमाने जैसी कोई बात नहीं थी।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने जांच एजेंसी का सहयोग किया और मार्च और अप्रैल 2025 में कई तारीखों पर व्यक्तिगत रूप से उनके सामने पेश हुए। चूंकि अभियोजन पक्ष की शिकायत पहले ही दायर की जा चुकी थी, इसलिए यह तर्क दिया गया कि सबूतों के साथ छेड़छाड़ का कोई जोखिम नहीं था।
ED का रुख
ज़मानत अर्ज़ी का विरोध करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने आरोपों का समर्थन किया और कहा कि याचिकाकर्ता की अचल संपत्तियों को ज़ब्त कर लिया गया है और अगर उसे रिहा किया जाता है तो उसके और अपराध करने की संभावना है।
ED ने यह भी आरोप लगाया कि उसके भागने का जोखिम है और उसका आपराधिक इतिहास रहा है, जिसमें नौ मामले शामिल हैं।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
ज़मानत अर्ज़ी पर विचार करते हुए कोर्ट ने व्हाइट-कॉलर अपराधों के बारे में विस्तार से टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा:
"व्हाइट-कॉलर अपराध इतने व्यापक और महंगे हो गए हैं कि उनसे निपटने के लिए सख़्त और बिना किसी समझौते के प्रवर्तन की ज़रूरत है"।
कोर्ट ने कहा कि कॉर्पोरेट धोखाधड़ी, गबन, इनसाइडर ट्रेडिंग और बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी अक्सर पेंशन, बचत और आजीविका को ऐसे पैमाने पर बर्बाद कर देती है जो, कोर्ट के शब्दों में, "कई सड़क-छाप अपराधों से होने वाले नुकसान को भी छोटा साबित कर देता है"।
कोर्ट ने यह भी देखा कि अपराधियों को अक्सर अपेक्षाकृत हल्की सज़ा मिलती है, या ऐसे जुर्माने लगते हैं, जिन्हें उनकी कंपनियाँ कारोबार की लागत के तौर पर आसानी से चुका सकती हैं, या फिर ऐसी 'प्ली-डील्स' (समझौते) होती हैं जिनसे "असली जवाबदेही" से बचा जा सके।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे अपराधों से "सख़्ती" से निपटने के लिए अनिवार्य जेल की सज़ा, कॉर्पोरेट सुरक्षा के बावजूद अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही, संपत्ति ज़ब्ती और सख़्त मुक़दमे जैसे उपाय किए जाने चाहिए। इससे इस धारणा को दूर करने में मदद मिलेगी कि "दौलत और रुतबे से नरम न्याय खरीदा जा सकता है"।
कोर्ट ने कहा कि "सख़्त रुख" अपनाने से एक "साफ़ संदेश" जाएगा कि आर्थिक अपराधों से होने वाला नुकसान अक्सर "अदृश्य और फैला हुआ" होता है, इसलिए उन्हें हथियारों से किए गए अपराधों से कम गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट से पता चला कि याचिकाकर्ता कई तारीखों पर मौजूद था, जबकि उसके वकील कई मौकों पर अनुपस्थित रहे।
रिपोर्ट में यह भी पता चला कि आरोप तय करने के लिए याचिकाकर्ता की ओर से बहस 30 जुलाई, 2026 को पूरी हो गई और मामले में संज्ञान लेने के आदेश के लिए 24 अगस्त, 2026 की तारीख तय की गई।
कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ता पर विभिन्न आवंटियों से ₹126.30 करोड़ का गबन करने का आरोप है और ज़मानत के चरण में, कोर्ट ने पाया कि स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट से यह राशि साबित हो गई।
ट्रायल की कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता के वकील के आचरण के बारे में कोर्ट की इन बातों को ध्यान में रखते हुए जस्टिस पहल ने माना कि यह ज़मानत के लिए उपयुक्त मामला नहीं है। इसके बाद ज़मानत की अर्ज़ी खारिज कर दी गई।
फिर भी कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर कोई कानूनी अड़चन न हो तो ट्रायल कोर्ट में लंबित मामले का निपटारा तेज़ी से और कानून के अनुसार किया जाए, और किसी भी पक्ष को अनावश्यक रूप से सुनवाई टालने की अनुमति न दी जाए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ज़मानत की अर्ज़ी पर फ़ैसला करते समय की गई टिप्पणियों का ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
आवेदक की ओर से सीनियर एडवोकेट विनय सरन पेश हुए, जिनकी सहायता सौमित्र द्विवेदी और पंकज साहनी ने की।
ED की ओर से एडवोकेट सुशांत चंद्रा पेश हुए।
Case Title - Anil Mithas vs. Directorate of Enforcement 2026 LiveLaw (AB) 717