इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक नवजात की मौत के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को पूरे घटनाक्रम की जांच कराने और 15 दिन के भीतर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। नवजात की जन्म के 24 घंटे के भीतर मौत हो गई थी और उसे इलाज के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाया गया। कोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया कि राज्य सरकार प्रदेश के नागरिकों की मेडिकल संबंधी जरूरतों पर गंभीरता से ध्यान दे।

जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजिव शुक्ला की खंडपीठ ने 11 सितंबर को पारित 10 पन्नों के आदेश में कहा कि फिलहाल कोर्ट ने किसी डॉक्टर या अस्पताल की लापरवाही के संबंध में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला है। हालांकि, जांच में यदि बच्चे को जरूरी उपचार और सुविधाएं उपलब्ध कराने में कोई कमी या लापरवाही सामने आती है तो संबंधित लोगों की जवाबदेही तय करने पर विचार किया जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में केवल यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है कि नवजात को पर्याप्त मेडिकल उपचार और देखभाल क्यों नहीं मिल सकी, बल्कि इससे कई बड़े मुद्दे भी सामने आते हैं। इनमें लखनऊ के अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों पर बढ़ते दबाव को कम करने का सवाल भी शामिल है।

खंडपीठ ने प्रदेश में मेडिकल सेवाओं और सुविधाओं के विकेंद्रीकरण की जरूरत पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में पर्याप्त मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराए बिना लखनऊ के अस्पतालों पर दबाव कम नहीं किया जा सकता। लोगों को इलाज के लिए लगातार लखनऊ आना पड़ता रहेगा और लखनऊ में मौजूद अस्पतालों तथा चिकित्सा संस्थानों की भी मरीजों की इतनी बड़ी संख्या संभालने की एक सीमा है।

हाईकोर्ट ने कहा कि हाल में खोले गए मेडिकल कॉलेजों को आवश्यक बुनियादी ढांचे से लैस करना जरूरी है। इनमें विशेष और अति-विशेषज्ञता वाली चिकित्सा सुविधाएं तथा विशेष रूप से वेंटिलेटर जैसी जीवनरक्षक सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि लोगों को अपने घर के आसपास ही बेहतर उपचार मिल सके और उन्हें इलाज के लिए दूर-दराज के शहरों की ओर भागना न पड़े।

मामले में कोर्ट ने पाया कि नवजात ऐसी बीमारी से पीड़ित था, जिसमें तत्काल मेडिकल सहायता की जरूरत थी। इसके बावजूद उसे सुल्तानपुर से लखनऊ के रेफरल अस्पताल तक एक सामान्य एंबुलेंस से ले जाया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में एंबुलेंस में आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए।

कोर्ट के अनुसार परिवार बच्चे को सबसे पहले लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) ले गया। इसके बाद उसे डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और फिर संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज ले जाया गया।

KGMU के डॉक्टरों के अनुसार बच्चा एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचा था और उसके परिजन चौथी मंजिल पर स्थित नवजात गहन मेडिकल यूनिट की ओर चले गए। उन्हें बताया गया कि वहां कोई बेड उपलब्ध नहीं है। डॉक्टरों ने कहा कि बच्चे के मेडिकल दस्तावेज देखे गए और परिजनों से बच्चे को चौथी मंजिल पर लाने के लिए कहा गया, लेकिन वे उसे वहां नहीं ले गए।

परिवार ने इसके विपरीत दावा किया कि KGMU में उन्हें बताया गया कि बेड उपलब्ध नहीं होने के कारण बच्चे को डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज ले जाएं। परिवार का यह भी कहना था कि उन्होंने एंबुलेंस में ही बच्चे की कम से कम जांच करने का अनुरोध किया था। केजीएमयू ने इन दावों का खंडन किया है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस पहलू पर आगे विचार किया जाएगा।

हालांकि पीठ ने कहा कि दोनों पक्षों के अलग-अलग दावों के बावजूद यदि अस्पताल में ऐसे कर्मचारी उपलब्ध होते, जो बच्चे के परिजनों को सही तरीके से मार्गदर्शन और सलाह दे सकते, तो संभव है कि स्थिति अलग होती।

कोर्ट ने याद किया कि संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की स्थापना के समय वहां सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर योग्यता रखने वाले कर्मचारी मरीजों की समस्याएं समझते थे, उनके समाधान के विकल्प सुझाते थे और डॉक्टरों तथा अन्य कर्मचारियों के साथ समन्वय कर समाधान कराने में मदद करते थे।

खंडपीठ ने सवाल उठाया कि ऐसी व्यवस्था प्रदेश के प्रत्येक सरकारी अस्पताल में क्यों नहीं लागू की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है, खासकर इसलिए क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों के पास निजी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने फरवरी 2018 में कांती (देवी) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में दिए अपने फैसले का भी उल्लेख किया। उस फैसले में मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में मेडिकल दस्तावेज लेकर भटकने से बचाने के लिए ऑनलाइन रेफरल प्रणाली की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज को दूसरे अस्पताल भेजने से पहले रेफर करने वाले अस्पताल को संबंधित अस्पताल से वहां उपलब्ध बेड, जरूरी सुविधाओं और सेवाओं के बारे में जानकारी लेनी चाहिए। इससे मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने में कीमती समय बर्बाद होने से बचाया जा सकेगा और उसे सीधे उस अस्पताल पहुंचाया जा सकेगा जहां बेड या आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो।

इसी संदर्भ में खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार को अब प्रदेश के नागरिकों की चिकित्सा जरूरतों के प्रति जागना होगा। कोर्ट ने राज्य सरकार से केवल यह कहने के बजाय कि मामला उच्च स्तर पर विचाराधीन है एक ठोस और स्पष्ट कार्ययोजना पेश करने को कहा है जिसमें इसे लागू करने की समयसीमा भी तय हो।

कोर्ट ने यह भी कहा कि उसने कई बार राज्य के बजट में मेडिकल सुविधाओं और सेवाओं के लिए आवंटित राशि का प्रतिशत बताने को कहा था लेकिन उसे अब तक इसका जवाब नहीं मिला। पीठ ने कहा कि धन की कमी नागरिकों को मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराने में बाधा नहीं बननी चाहिए और राज्य को अन्य प्रावधानों की तुलना में नागरिकों को उच्च गुणवत्ता वाली मेडिकल सुविधाएं और सेवाएं उपलब्ध कराने को प्राथमिकता देनी चाहिए।

नवजात की मौत के मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ जांच कराने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि जांच से भविष्य की कार्रवाई के लिए दिशा तय करने में मदद मिलेगी और यदि जरूरी उपचार या सुविधाएं उपलब्ध कराने में कोई कमी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय की जा सकेगी।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि यदि जांच में राज्य या अन्य संबंधित अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है तो परिवार को मुआवजा देने के सवाल पर भी विचार किया जाएगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जांच के दौरान परिवार का पक्ष दर्ज किया जाए और उस पर भी विचार किया जाए।

जांच रिपोर्ट 15 दिन के भीतर हाईकोर्ट में पेश करनी होगी। मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर 2026 को होगी।

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