बिना रिकॉर्ड की मौखिक हिदायत के आधार पर नहीं हो सकती विभागीय कार्रवाई, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कर अधिकारी की सजा रद्द की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य कर विभाग के अधिकारी के खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई रद्द करते हुए कहा कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठकों में दी गई कथित मौखिक हिदायतों का पालन नहीं करने के आरोप के आधार पर दंड नहीं दिया जा सकता, जब उन बैठकों की तारीख और कार्यवाही का कोई रिकॉर्ड पेश ही न किया गया हो। कोर्ट ने कहा कि ऐसे आधार पर की गई कार्रवाई काल्पनिक आरोपों पर आधारित मानी जाएगी।
जस्टिस राजीव सिंह ने राज्य कर अधिकारी पर लगाई गई निंदा प्रविष्टि और एक वेतनवृद्धि संचयी प्रभाव से रोकने की सजा रद्द की। कोर्ट ने 5 मार्च 2026 के दंड आदेश के साथ 9 जून 2025 की जांच रिपोर्ट और 14 नवंबर 2024 की आरोप पत्र को भी निरस्त किया।
याचिकाकर्ता अक्टूबर 2024 में अपर आयुक्त, ग्रेड-2 (SIB), राज्य कर, कानपुर जोन-प्रथम के पद पर तैनात थे। उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के नियम 7 के तहत 14 नवंबर 2024 को आरोप पत्र जारी किया गया। आरोप है कि कानपुर जोन की विनिर्माण इकाइयों से पान मसाला ले जाने वाले वाहनों के ई-वे बिल की 100 प्रतिशत स्कैनिंग सुनिश्चित नहीं की गई, जबकि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई समीक्षा बैठकों में ऐसा करने का निर्देश दिया गया था। इसके कारण राजस्व संग्रह का निर्धारित लक्ष्य भी हासिल नहीं हो सका।
दूसरा आरोप उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956 के नियम 3(1) और 3(2) के उल्लंघन से संबंधित था, जिसे पहले आरोप के आधार पर लगाया गया।
अधिकारी ने अपने जवाब में राज्य कर आयुक्त की 9 मई 2024 की सर्कुलर का हवाला दिया। इसमें ई-वे बिल की 245 स्कैनिंग का लक्ष्य निर्धारित किया गया। अधिकारी के अनुसार, अक्टूबर 2024 में उनके नियंत्रण वाली मोबाइल स्क्वॉड इकाइयों ने 474 ई-वे बिल स्कैन किए, जो निर्धारित संख्या से 93.47 प्रतिशत अधिक थे। उन्होंने यह भी कहा कि जांच रिपोर्ट 21 नवंबर 2024 को जारी सर्कुलर संख्या 1263 पर आधारित थी और उससे पहले 100 प्रतिशत स्कैनिंग का कोई लिखित निर्देश जारी नहीं हुआ।
सरकार की ओर से दलील दी गई कि 21 नवंबर 2024 से पहले कई मौकों पर मौखिक निर्देश दिए गए थे, लेकिन उनका पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने जब पूछा कि क्या आबकारी आयुक्त की ओर से इस तरह का मौखिक सर्कुलर जारी किया जा सकता था, तो सरकारी पक्ष इस पर स्पष्ट जवाब नहीं दे सका। यह भी स्वीकार किया गया कि जिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठकों में कथित तौर पर 100 प्रतिशत स्कैनिंग के निर्देश दिए गए, उनकी तारीखें न तो जांच रिपोर्ट में दर्ज थीं और न ही दंड आदेश में।
कोर्ट ने कहा कि इन बैठकों की कार्यवाही भी अधिकारी को उपलब्ध नहीं कराई गई। इससे स्पष्ट है कि जिस निर्देश के उल्लंघन को आधार बनाया गया, उसका कोई लिखित रिकॉर्ड मौजूद नहीं था। कोर्ट ने दंड आदेश में लगाए गए आरोपों को भी सामान्य और अस्पष्ट माना।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के टी.एस.आर. सुब्रमणियन एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में दिए गए उस सिद्धांत का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि सामान्य परिस्थितियों में मौखिक आदेश जारी नहीं किया जाना चाहिए। यदि किसी अपरिहार्य परिस्थिति में मौखिक निर्देश देना पड़े तो उसे जल्द से जल्द दर्ज कर लिखित रूप में पुष्ट किया जाना चाहिए।
जस्टिस राजीव सिंह ने कहा कि 21 नवंबर 2024 से पहले याचिकाकर्ता को पान मसाला ले जाने वाले वाहनों के ई-वे बिल की 100 प्रतिशत स्कैनिंग सुनिश्चित करने का कोई निर्देश दिए जाने का साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है। इसलिए दंड आदेश काल्पनिक आरोपों पर आधारित है।
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए दंड आदेश, जांच रिपोर्ट और आरोप पत्र रद्द किया। साथ ही उत्तर प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी को निर्देश दिया कि भविष्य में मौखिक निर्देशों के स्थान पर आवश्यक निर्देश लिखित रूप में जारी किए जाएं। यदि किसी अपरिहार्य परिस्थिति में मौखिक निर्देश देना पड़े तो उसे जल्द से जल्द रिकॉर्ड किया जाए।
कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति चीफ सेक्रेटरी, मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव और उत्तर प्रदेश सरकार के विधि परामर्शदाता को भेजने का भी निर्देश दिया।