इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुलंदशहर सिविल बार एसोसिएशन की कार्यकारिणी का चुनाव रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि चुनाव के बाद चार महिला वकीलों को कार्यकारिणी में नामित किए जाने से महिलाओं के 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पूरी हो गई। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भविष्य के सभी चुनावों में महिलाओं को 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए बार एसोसिएशन को अपने उपनियमों में संशोधन करना होगा।

चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने यह आदेश बुलंदशहर जिला अदालत में प्रैक्टिस करने वाले एक वकील की जनहित याचिका पर दिया। याचिका में 16 अप्रैल 2026 को हुए चुनाव और उसके परिणाम को रद्द कर महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण के साथ नए चुनाव कराने तथा कोषाध्यक्ष का पद महिला वकील के लिए निर्धारित करने की मांग की गई।

मामले में सुप्रीम कोर्ट के 13 मार्च 2026 के दीक्षा एन. अमृतैश बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य मामले में दिए गए आदेश का हवाला दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि बार एसोसिएशन की शासी या कार्यकारिणी संस्था के चुनाव में शामिल बार के सदस्यों में कम से कम 30 प्रतिशत महिलाएं हों। इससे पहले यह व्यवस्था केवल कर्नाटक के लिए लागू थी।

बुलंदशहर बार एसोसिएशन के चुनाव का कार्यक्रम 4 अप्रैल 2026 को जारी किया गया और मतदान 16 अप्रैल को हुआ। मतदाता सूची में 79 महिला सदस्य थीं लेकिन इनमें से कोई भी महिला पदाधिकारी के रूप में निर्वाचित नहीं हुई। चुनाव में कार्यकारिणी के लिए कुल 12 पद भरे जाने थे।

बार एसोसिएशन की ओर से बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट का 13 मार्च का आदेश उन्हें जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बुलंदशहर के माध्यम से 8 अप्रैल को प्राप्त हुआ। उस समय तक चुनाव कार्यक्रम घोषित हो चुका था। इसके बाद 20 अप्रैल को निर्वाचित पदाधिकारियों ने चार महिला वकीलों को कार्यकारिणी में नामित किया। इनमें एक को संयुक्त कोषाध्यक्ष और तीन को कार्यकारिणी सदस्य बनाया गया।

याचिकाकर्ता ने इन नामांकनों को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए कहा कि बार एसोसिएशन में संयुक्त कोषाध्यक्ष का कोई पद ही नहीं था और कार्यकारिणी के सभी पद पुरुष अधिवक्ताओं को मिल चुके थे।

हाईकोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के कारण बार एसोसिएशन सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अनजान था। पीठ ने कहा कि अधिवक्ताओं की संस्था होने के कारण बार एसोसिएशन से सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की जानकारी रखने की अपेक्षा की जाती है। खासकर तब जब विवाद ही बार एसोसिएशन के चुनाव को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप कराने से जुड़ा हो। कोर्ट ने कहा कि आदेश सार्वजनिक रूप से उपलब्ध था, इसलिए उसके बारे में अनभिज्ञता स्वीकार नहीं की जा सकती।

हालांकि, कोर्ट ने माना कि केवल 12 निर्वाचित पद होने की स्थिति में महिलाओं के 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व को इन्हीं पदों के भीतर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इस लिहाज से चुनाव के समय ऐसा न किया जाना 13 मार्च के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप नहीं था।

खंडपीठ ने यह भी ध्यान दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने 16 अप्रैल 2026 को, यानी बुलंदशहर में चुनाव के दिन ही, अपने पहले के आदेश के पैराग्राफ 6 में संशोधन किया। संशोधित व्यवस्था में कहा गया कि यदि महिला अधिवक्ता उपलब्ध नहीं हैं या चुनाव नहीं लड़ती हैं तो महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी को नामांकन के जरिए पूरा किया जाएगा।

चूंकि नामांकन प्रक्रिया के दौरान कोई महिला वकील चुनाव के लिए आगे नहीं आई, हाईकोर्ट ने माना कि संशोधित प्रावधान लागू होता है और महिलाओं का नामांकन अपने आप में अवैध नहीं कहा जा सकता। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि नामांकन उस प्रक्रिया के अनुसार नहीं किया गया, जिसमें प्रशासनिक जज या संबंधित पोर्टफोलियो जज को जिला एवं सत्र जज, निर्वाचित पदाधिकारियों और वरिष्ठतम महिला सदस्यों से परामर्श करना है।

कोर्ट ने इस मामले में अलग से जांच कराने से भी इनकार किया। खंडपीठ ने कहा कि जांच का निर्देश देना न्याय व्यवस्था के सीमित प्रशासनिक संसाधनों की बर्बादी होगा और इससे न्याय के उद्देश्य को कोई समानुपाती लाभ नहीं मिलेगा।

अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए बुलंदशहर सिविल बार एसोसिएशन को एक महीने के भीतर अपने उपनियमों में संशोधन करने का निर्देश दिया ताकि भविष्य के सभी चुनावों में महिला वकीलों के लिए 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। इसी अवधि में नामांकन की जानकारी और चुनाव की पूरी कार्यवाही प्रशासनिक जज, बुलंदशहर को भेजने का भी निर्देश दिया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक प्रशासनिक जज इसके विपरीत कोई आदेश नहीं देते, मौजूदा चुनाव और नामांकन प्रभावी रहेंगे। फिलहाल रजिस्ट्रार जनरल की ओर से किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है, हालांकि भविष्य में आदेश के उल्लंघन की स्थिति में इस संबंध में कार्रवाई का रास्ता खुला रखा गया।

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