सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
18 Oct 2026 8:00 AM IST

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (12 अक्टूबर, 2026 से 15 अक्टूबर, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
राज्य मंदिर की ज़मीन का उपहार स्वीकार नहीं कर सकता; HR&CE Act के तहत सरकार मंदिर की संपत्तियों की केवल संरक्षक, मालिक नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार मंदिर की संपत्तियों की संरक्षक और नियामक (रेगुलेटर) है, न कि उनकी मालिक। इसलिए वह किसी ट्रस्टी से ऐसी संपत्ति का उपहार स्वीकार नहीं कर सकती, भले ही यह हस्तांतरण किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए ही क्यों न किया जा रहा हो।
मद्रास हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने एक 'गिफ्ट डीड' (उपहार विलेख) को अमान्य घोषित किया। इस डीड के ज़रिए, तमिलनाडु के इरोड ज़िले में स्थित 'नागापालयम मरियम्मन-पोन्नाचियम्मन मंदिर' के अस्थायी ट्रस्टी ने मंदिर की 1 एकड़ और 10 सेंट ज़मीन, तालुक कार्यालय बनाने के लिए राज्य सरकार को सौंप दी थी।
Case Title : K Ramalingam and Others v. Government of Tamil Nadu and Others
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इंटरनेट का इस्तेमाल करना बच्चों समेत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार, इससे पूरी तरह वंचित करना बेतुका होगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसके इस्तेमाल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अधिकार में बच्चे भी शामिल हैं और उनकी उम्र चाहे जो भी हो, उन्हें इससे पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने के अधिकार से पूरी तरह वंचित करना उतना ही बेतुका होगा, जितना यह कहना कि एक निश्चित उम्र से कम बच्चों की अंतरात्मा की रक्षा करने या उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व देने की जरूरत नहीं है।
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आर्बिट्रेशन क्लॉज़ होने से आपराधिक मामला दर्ज करने पर रोक नहीं लगती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी समझौते में 'आर्बिट्रेशन क्लॉज़' (मध्यस्थता खंड) होने का मतलब यह नहीं है कि आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि क्या लगाए गए आरोपों में अपराध के ज़रूरी तत्व मौजूद हैं या नहीं।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वह गुवाहाटी हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रहे थे। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने चाय कंपनी के CEO के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला रद्द करने से इनकार किया था। यह मामला चाय बागान की एक ऐसी डील से जुड़ा था, जो सफल नहीं हो पाई।
Case Title : Indroneel Goho v Razouvonuo Thong & Anr
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ग़ैर-हिंदू धर्म अपनाने वाले लोग केवल धर्म परिवर्तन से पहले की अपनी स्थिति के आधार पर पिछड़े वर्ग के कोटे का दावा नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का वह फैसला बरकरार रखा, जिसमें कहा गया कि इस्लाम अपनाने वाला कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन से पहले की अपनी स्थिति के आधार पर पिछड़े वर्ग के आरक्षण का हकदार नहीं है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने तमिलनाडु सरकार द्वारा हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर चुनौती को खारिज कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया: "कोई व्यक्ति जो इस्लाम अपनाता है, केवल इस कार्य से वह राज्य में अधिसूचित सात पिछड़े सामाजिक समुदायों में से किसी एक का सदस्य नहीं बन जाता। उसकी पुरानी जाति की स्थिति को मुस्लिम पिछड़े वर्ग की श्रेणी में नहीं जोड़ा जा सकता, और न ही उसका अपना धार्मिक निकाय यह तय कर सकता है कि वह इस दर्जे का हकदार है या नहीं।"
Case : The Secretary to Government v Sameer Ahamed | Diary No. 39624/2026
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प्रोफेशनल कोर्स के बीच में स्टूडेंट्स की फीस नहीं बढ़ाई जा सकती, सिवाय कुछ खास परिस्थितियों के: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेल्फ-फाइनेंसिंग उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेशनल कोर्स कर रहे स्टूडेंट्स की फीस, कोर्स के बीच में आमतौर पर नहीं बढ़ाई जा सकती। ऐसा केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही किया जा सकता है, जैसे कि खर्चों में अचानक और अप्रत्याशित बढ़ोतरी होना।
जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि स्टूडेंट्स और उनके परिवारों के लिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि उन्हें कितनी फीस देनी होगी। अक्सर स्टूडेंट और उनके परिवार अपनी आय और बचत का एक बड़ा हिस्सा प्रोफेशनल शिक्षा पर खर्च करते हैं, या इसके लिए एजुकेशन लोन लेते हैं।
Case Title : DR. B.C. ROY ENGINEERING COLLEGE & ANR. VERSUS THE STATE OF WEST BENGAL & ORS.
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भर्ती विज्ञापन में योग्यता की शर्त अस्पष्ट हो तो उम्मीदवार के पक्ष में होगा उसका अर्थ: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भर्ती विज्ञापन में निर्धारित पात्रता या योग्यता की शर्तों में अस्पष्टता होने पर उसका अर्थ ऐसे उम्मीदवार के पक्ष में लगाया जाना चाहिए, जो प्रथम दृष्टया आवश्यक योग्यता रखता हो। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया, जिसमें भर्ती विज्ञापन में अनुभव संबंधी शर्तों की अस्पष्टता के बावजूद एक उम्मीदवार को लाइब्रेरियन के पद पर नियुक्ति के लिए अयोग्य ठहराया गया।
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S. 62 IBC | अपील दायर करने की समय-सीमा NCLAT के आदेश सुनाए जाने की तारीख से शुरू होती है, न कि सर्टिफाइड कॉपी मिलने की तारीख से: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (14 अक्टूबर) को कहा कि इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 की धारा 62 के तहत अपील दायर करने की समय-सीमा उस तारीख से शुरू होती है, जब नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) अपना आदेश सुनाता है, न कि उस तारीख से जब अपील करने वाले को सर्टिफाइड कॉपी मिलती है।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने कहा कि सर्टिफाइड कॉपी के लिए आवेदन करने और उसे प्राप्त करने में वादी द्वारा बिताए गए समय को लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 12(2) के तहत हटाया जा सकता है, लेकिन कॉपी के लिए आवेदन करने से पहले कुछ न करने की अवधि को नहीं हटाया जा सकता।
Case Title : THE ASSISTANT COMMISSIONER OF CENTRAL TAX, CGST DIVISION VERSUS SREENIVASA RAO RAVINUTHALA AND ANOTHER
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PMLA | ED का गिरफ्तारी का आदेश एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी को भेजने में देरी से गिरफ्तारी अपने-आप गैर-कानूनी नहीं हो जाती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग के कथित अपराध में गिरफ्तारी के समय, अगर गिरफ्तारी करने वाला अधिकारी गिरफ्तारी का आदेश और उससे जुड़े कागजात एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी को तुरंत नहीं भेज पाता है तो भी देरी की वाजिब वजह होने पर गिरफ्तारी गैर-कानूनी नहीं मानी जाएगी।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि जब मनमानी गिरफ्तारी से बचाने वाले मुख्य नियमों का पालन किया गया हो - जैसे कि अधिकृत अधिकारी के पास सबूत हों, विश्वास करने के कारण लिखित में दर्ज हों, गिरफ्तारी के आधार बताए गए हों और आरोपी को 24 घंटे के भीतर सक्षम अदालत के सामने पेश किया गया हो - तो धारा 19(2) का पालन करने में हुई मामूली देरी कोई खास मायने नहीं रखती।
Case Title : SANJAY SUREKA @SANJAY KUMAR SUREKA VERSUS DIRECTORATE OF ENFORCEMENT
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सुप्रीम कोर्ट का रेलवे को निर्देश: ऑनलाइन टिकटों की तरह काउंटर से खरीदे गए टिकटों पर भी इंश्योरेंस कवर दें
एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को आदेश दिया कि वह 27 अक्टूबर से दो हफ़्ते के अंदर रेलवे रिज़र्वेशन काउंटर से खरीदे गए टिकटों पर भी इंश्योरेंस कवर दे। कोर्ट ने कहा कि इंश्योरेंस कवर वैसा ही होना चाहिए जैसा ऑनलाइन टिकट खरीदने पर मिलता है।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने आम लोगों की सुरक्षा और ट्रेन यात्रा के दौरान होने वाली अप्रिय घटनाओं को रोकने से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। इस मामले में उठाए गए मुद्दों में से एक इंश्योरेंस कवर का था, जो अभी सिर्फ़ उन लोगों को मिलता है जो थोड़ी अतिरिक्त रकम देकर ऑनलाइन रेलवे टिकट खरीदते हैं।
Case Title : UNION OF INDIA V RADHA YADAV
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बिहार SIR फ़ैसले के समय नया फ़ॉर्म 6 मौजूद नहीं था, हमने इस पर कोई फ़ैसला नहीं दिया: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को साफ़ किया कि उसने नए फ़ॉर्म 6 डिक्लेरेशन (नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन के लिए) को न तो मंज़ूरी दी और न ही इसे नामंज़ूर किया। इसकी वैधता पर अभी फ़ैसला होना बाकी है। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की पिछले हफ़्ते की टिप्पणी का मतलब सिर्फ़ यह बताना था कि मई 2026 के बिहार SIR फ़ैसले में नए फ़ॉर्म 6 की जांच नहीं की गई थी क्योंकि वह उस समय मौजूद ही नहीं था।
CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने भारत निर्वाचन आयोग से जुड़ी प्रिया मिश्रा की रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान ये मौखिक टिप्पणियां कीं।
Case : Priya Mishra v. Union of India | WP (c) 1291/2026
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पेंशन के लिए एड-हॉक सर्विस गिनी जा सकती है, लेकिन सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों के मुकाबले सीनियरिटी का दावा नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अस्थायी या एड-हॉक (कामचलाऊ) तौर पर नियुक्त कर्मचारी, सीधे भर्ती हुए कर्मचारियों के साथ सीनियरिटी तय करने के मामले में बराबरी का दावा नहीं कर सकते। असल में, एड-हॉक या अस्थायी कर्मचारियों की सीनियरिटी उनकी शुरुआती नियुक्ति की तारीख से नहीं, बल्कि सर्विस में पक्के (कन्फर्म) होने की तारीख से तय होगी।
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने कहा कि हालांकि एड-हॉक सर्विस को पेंशन के मकसद से ध्यान में रखा जा सकता है, लेकिन सीनियरिटी तय करने के लिए इसे नहीं गिना जा सकता।
Case Title : H. NAGARAJAN & ORS. Vs. STATE OF T.N. & ORS. (with connected cases)
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विरोध-प्रदर्शन के दौरान पाबंदियों के बीच वकीलों, पत्रकारों और दूसरे प्रोफेशनल्स को अपना काम करने से नहीं रोका जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने CEC विरोध-प्रदर्शन मामले की सुनवाई के दौरान साफ तौर पर कहा कि वकीलों, पत्रकारों और दूसरे प्रोफेशनल्स को उनके पेशेवर काम करने से नहीं रोका जाना चाहिए। दिल्ली पुलिस पर वकीलों और पत्रकारों को उनके पेशेवर काम करने से रोकने के आरोप लगने के बाद जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता से कहा कि इन प्रोफेशनल्स को उनके काम में बाधा नहीं डाली जानी चाहिए।
Case Title : Shailendra Mani Tripathi v Govind Mohan

