प्रोफेशनल कोर्स के बीच में स्टूडेंट्स की फीस नहीं बढ़ाई जा सकती, सिवाय कुछ खास परिस्थितियों के: सुप्रीम कोर्ट

  • प्रोफेशनल कोर्स के बीच में स्टूडेंट्स की फीस नहीं बढ़ाई जा सकती, सिवाय कुछ खास परिस्थितियों के: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेल्फ-फाइनेंसिंग उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेशनल कोर्स कर रहे स्टूडेंट्स की फीस, कोर्स के बीच में आमतौर पर नहीं बढ़ाई जा सकती। ऐसा केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही किया जा सकता है, जैसे कि खर्चों में अचानक और अप्रत्याशित बढ़ोतरी होना।

    जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि स्टूडेंट्स और उनके परिवारों के लिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि उन्हें कितनी फीस देनी होगी। अक्सर स्टूडेंट और उनके परिवार अपनी आय और बचत का एक बड़ा हिस्सा प्रोफेशनल शिक्षा पर खर्च करते हैं, या इसके लिए एजुकेशन लोन लेते हैं।

    इसलिए फीस तय करने वाले अधिकारियों को छात्र के एडमिशन लेने से पहले ही पूरे कोर्स की फीस बता देनी चाहिए, ताकि छात्रों और उनके परिवारों को यह स्पष्ट रहे कि उन पर कितना वित्तीय बोझ पड़ने वाला है।

    कोर्ट ने कहा,

    "इस कोर्ट के फैसलों, AICTE के नियमों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के तहत फीस तय करने की जो व्यवस्था है और निश्चितता के सिद्धांतों को देखते हुए यह जरूरी है कि छात्र के एडमिशन लेने से पहले ही पूरे कोर्स की फीस बता दी जाए। फीस के बारे में स्पष्टता होनी चाहिए; कोर्स के दौरान फीस में बदलाव केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही किया जा सकता है, जैसे कि खर्चों में अचानक और अप्रत्याशित बढ़ोतरी होना।"

    कोर्ट के अनुसार,

    "चार या पांच साल के प्रोफेशनल कोर्स में दाखिला लेने वाले छात्र को शुरुआत में ही पता होना चाहिए कि उस पर या उसके परिवार पर कितना वित्तीय बोझ पड़ने वाला है। पहले से फीस तय होने से पारदर्शिता आती है, छात्र सही फैसला ले पाते हैं और उन्हें अपनी आर्थिक योजना बनाने में मदद मिलती है।"

    फीस में बदलाव केवल विशेष परिस्थितियों में ही जायज

    कोर्ट ने कहा,

    "इसका मतलब यह नहीं है कि फीस के ढांचे में किसी भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। असाधारण आर्थिक हालात, कानूनी बदलाव या ऐसी अन्य परिस्थितियां आ सकती हैं, जिनका पहले से अंदाजा लगाना संभव न हो और जिनके कारण खर्च अचानक बढ़ जाएं। इसलिए ऐसी विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए सीमित व्यवस्था हो सकती है। लेकिन, ऐसा बदलाव केवल एक अपवाद होना चाहिए; यह समय पर फीस के आकलन और सही संस्थागत योजना बनाने का विकल्प नहीं बन सकता।"

    मामला

    यह विवाद तब शुरू हुआ जब पश्चिम बंगाल सरकार ने 16 अक्टूबर 2023 को एक नोटिफिकेशन जारी किया। इसमें निजी स्व-वित्तपोषित (Self-Financing) इंजीनियरिंग, फार्मेसी और आर्किटेक्चर कॉलेजों के लिए फीस की अधिकतम सीमा तय की गई, जो 2023-24 शैक्षणिक वर्ष से लागू होनी थी। इसके तहत सालाना ट्यूशन फीस अधिकतम ₹1.10 लाख तय की गई। यह बदलाव सात साल के अंतराल के बाद किया गया और 'फीस स्ट्रक्चर कमिटी' ने जून 2023 में ही राज्य सरकार को अपनी सिफारिशें सौंप दी थीं। हालाँकि, यह नोटिफिकेशन तब आया जब 2023-27 B.Tech बैच के लिए दाखिले (एडमिशन) पूरे हो चुके थे।

    15 दिसंबर 2023 को डॉ. बी.सी. रॉय इंजीनियरिंग कॉलेज ने इस बैच की सेमेस्टर ट्यूशन फीस बढ़ाई और 'डेवलपमेंट फीस' भी जोड़ दी। इसके परिणामस्वरूप, दूसरे सेमेस्टर से फीस में कुल मिलाकर लगभग 37.5% की बढ़ोतरी हो गई। कॉलेज ने अपने प्रॉस्पेक्टस (विवरण पुस्तिका) के एक क्लॉज़ का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि सरकारी फैसलों के अनुसार फीस बदली जा सकती है।

    स्टूडेंट्स ने इस बढ़ोतरी को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी। एक सिंगल जज ने उनकी याचिकाओं को खारिज किया, लेकिन 'डिवीजन बेंच' (खंडपीठ) ने फैसला सुनाया कि बढ़ी हुई फीस केवल उन स्टूडेंट्स पर लागू हो सकती है, जिन्होंने 16 अक्टूबर 2023 को या उसके बाद दाखिला लिया है। कोर्ट ने कॉलेजों को निर्देश दिया कि वे पहले से दाखिला ले चुके स्टूडेंट्स से ली गई अतिरिक्त रकम वापस करें या उसे आने वाले सेमेस्टर की फीस में समायोजित (Adjust) कर दें।

    इसके बाद कॉलेजों ने डिवीजन बेंच के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

    फीस के दायित्व में स्पष्टता जरूरी

    सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पेशेवर शिक्षा (Professional Education) के लिए फीस तय करते समय तीन महत्वपूर्ण हितों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है: पहला, स्टूडेंट्स और अभिभावकों को यह स्पष्ट पता होना चाहिए कि उन्हें कितनी फीस देनी है; दूसरा, स्व-वित्तपोषित संस्थानों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और विकास के लिए पर्याप्त संसाधनों की जरूरत होती है; और तीसरा, सरकारी प्राधिकरणों और फीस निर्धारण समितियों के माध्यम से फीस को उचित तरीके से नियंत्रित करना समाज के हित में है।

    कोर्ट ने माना कि अधिकांश परिवारों के लिए पेशेवर शिक्षा एक बड़ा वित्तीय बोझ होती है। कई परिवार इसके लिए शिक्षा ऋण (Educational Loan) पर निर्भर होते हैं। फीस में अचानक और अप्रत्याशित बढ़ोतरी छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए वित्तीय असुरक्षा पैदा कर सकती है।

    कोर्ट ने कहा कि चार या पांच साल के पेशेवर प्रोग्राम में प्रवेश लेने वाले स्टूडेंट को शुरुआत में ही यह पता होना चाहिए कि उसे या उसके परिवार को कितना वित्तीय बोझ उठाना पड़ेगा। अदालत ने पेशेवर शिक्षा की मांग को पूरा करने में निजी संस्थानों की भूमिका को भी मान्यता दी और कहा कि ऐसे संस्थानों को बुनियादी ढांचे, उपकरणों, तकनीक, छात्र सेवाओं और शिक्षकों के वेतन के लिए पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता होती है।

    इसमें स्पष्ट किया गया कि 'फीस निश्चितता' के सिद्धांत का मतलब यह नहीं है कि फीस ढांचे में किसी भी परिस्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। असाधारण आर्थिक स्थितियों, कानूनी बदलावों या ऐसी अन्य अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण अगर लागत में अचानक बढ़ोतरी होती है तो विशेष परिस्थितियों में फीस में बदलाव किया जा सकता है। हालांकि, ऐसे बदलाव केवल अपवाद स्वरूप ही होने चाहिए; ये समय पर किए जाने वाले मूल्यांकन और संस्थागत योजना की जगह नहीं ले सकते।

    फीस निर्धारण समितियों को कुशलतापूर्वक काम करना चाहिए

    अदालत ने जोर दिया कि फीस निर्धारण समितियों को एक प्रभावी नियामक संस्था के रूप में काम करना चाहिए और प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने से काफी पहले अपना मूल्यांकन पूरा कर लेना चाहिए।

    'ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (प्रोफेशनल कॉलेजों में फीस और प्रवेश के लिए नियम और दिशानिर्देश) रेगुलेशन, 1994' का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि फीस में संशोधन समिति की सिफारिशों और प्रोफेशनल कॉलेजों के सुचारू संचालन के लिए जरूरी खर्च के अनुमानों पर आधारित होना चाहिए।

    इसमें बताया गया कि नियमों के अनुसार कम से कम हर तीन साल में फीस की समीक्षा होनी चाहिए। इस मूल्यांकन में ऑडिट किए गए खर्च के आंकड़ों तथा भविष्य की अनुमानित जरूरतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

    अदालत ने पाया कि फीस निर्धारण समिति और पश्चिम बंगाल सरकार 2023-27 बैच के लिए समय पर फीस संशोधन की प्रक्रिया पूरी करने में विफल रहीं। फीस में पिछली बार 2016-17 शैक्षणिक वर्ष में संशोधन किया गया, और नया संशोधन अक्टूबर 2023 में किया गया—यानी उस बैच की प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद।

    अदालत ने कहा,

    "अगर राज्य सरकार ने शैक्षणिक सत्र 2023-2024 शुरू होने से पहले ही 16.10.2023 की अधिसूचना जारी कर दी होती तो बीच सत्र में संशोधित फीस लागू करने से पैदा हुई समस्याओं से बचा जा सकता था।"

    अदालत ने यह भी कहा कि फीस निर्धारण समितियों का कामकाज और उनकी सिफारिशों पर राज्य सरकार द्वारा की गई कार्रवाई अक्सर उम्मीद के मुताबिक नहीं रही है।

    अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट्स को 'न्यायिक समीक्षा' (जुडिशियल रिव्यू) के जरिए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फीस निर्धारण समितियां अपनी जिम्मेदारियों को संस्थागत कुशलता, विशेषज्ञता और ईमानदारी के साथ निभाएं।

    फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार की। कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले से तो सहमति जताई कि कोर्स के बीच में फीस बढ़ाना गलत है, लेकिन हाईकोर्ट के उस फैसले से असहमति जताई, जिसमें फीस रिफंड का लाभ पिछली तारीख से (यानी 16 अक्टूबर 2023 से पहले दाखिला लेने वाले स्टूडेंट्स को भी) देने की अनुमति दी गई।

    कोर्ट ने कहा,

    "हम हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के निष्कर्षों को अपने द्वारा दिए गए स्वतंत्र कारणों के आधार पर सही मानते हैं, लेकिन हम डिवीजन बेंच के इस तर्क से सहमत नहीं हैं कि 2023-27 कोर्स के लिए संशोधित फीस स्ट्रक्चर लागू करने से 16.10.2023 की अधिसूचना (नोटिफिकेशन) पिछली तारीख से लागू हो जाएगी। हमारा यह भी मानना ​​है कि हाईकोर्ट ने कॉलेज के एडमिशन ब्रोशर के आधार पर 'इक्विटी' (न्याय/निष्पक्षता) और 'एस्टोपेल' (अपनी ही कही बात से मुकरने पर रोक) के सिद्धांतों को लागू करके जो रुख अपनाया है, वह कानूनी रूप से सही नहीं है। इस हद तक, हाई कोर्ट के फैसले को रद्द किया जाता है।"

    परिणामस्वरूप, अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

    Case Title : DR. B.C. ROY ENGINEERING COLLEGE & ANR. VERSUS THE STATE OF WEST BENGAL & ORS.

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