आर्बिट्रेशन क्लॉज़ होने से आपराधिक मामला दर्ज करने पर रोक नहीं लगती: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
17 Oct 2026 9:55 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी समझौते में 'आर्बिट्रेशन क्लॉज़' (मध्यस्थता खंड) होने का मतलब यह नहीं है कि आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि क्या लगाए गए आरोपों में अपराध के ज़रूरी तत्व मौजूद हैं या नहीं।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वह गुवाहाटी हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रहे थे। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने चाय कंपनी के CEO के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला रद्द करने से इनकार किया था। यह मामला चाय बागान की एक ऐसी डील से जुड़ा था, जो सफल नहीं हो पाई।
अपीलकर्ता 'दार्जिलिंग ऑर्गेनिक टी एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड' के CEO थे। 'CR ट्रेडर्स' (प्रतिवादी 1/R1) के मालिक ने चाय बागान को लेकर अपीलकर्ता की कंपनी के साथ बातचीत की थी। 2021 में समझौते से पहले, उन्होंने UCO बैंक को पत्र लिखकर उस चाय बागान और बैंक के पास उसके गिरवी (मॉर्गेज) होने के बारे में पूछा। कंपनी और CR ट्रेडर्स के बीच 'मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (MoU) पर हस्ताक्षर हुए, जिस पर अपीलकर्ता ने कंपनी के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के रूप में दस्तखत किए। जून 2021 में, R1 ने दो किश्तों (39,95,000 रुपये और 5,000 रुपये) में कंपनी के खाते में कुल 40,00,000 रुपये ट्रांसफर किए।
विवाद इसी MoU के पालन को लेकर है। कंपनी ने यह कहते हुए MoU को खत्म किया कि R1 इसकी शर्तों का पालन करने में विफल रहा है। 2022 में R1 ने आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। इसमें आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता ने उन्हें यह भरोसा दिलाकर 40,00,000 रुपये देने के लिए राजी किया कि चाय बागान कंपनी का है। जबकि असल में वह किसी और कंपनी का था और उसे लेकर UCO बैंक के साथ कानूनी कार्यवाही चल रही थी। इसके बाद कोर्ट ने समन जारी किया।
इसके बाद अपीलकर्ता ने 'कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973' (CrPC) की धारा 482 ('भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023' यानी BNSS की धारा 528 है) के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि यह विवाद पूरी तरह से अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) से जुड़ा है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि MoU कंपनी द्वारा किया गया, न कि व्यक्तिगत रूप से उनके द्वारा, और पैसा भी कंपनी के खाते में गया। उन्होंने इस बात की ओर भी इशारा किया कि कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया।
यह मानते हुए कि भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 417 और 420 (भारतीय न्याय संहिता, 2023/BNS की धारा 318(2) और 318(4)) के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है, और MoU में मौजूद आर्बिट्रेशन क्लॉज़ (मध्यस्थता खंड) मामले को रद्द करने का आधार नहीं हो सकता, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।
हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के नजरिए से सहमत तो था, लेकिन उसने इसे निर्णायक नहीं माना।
कोर्ट ने इस प्रकार टिप्पणी की:
“हाईकोर्ट का यह कहना सही था कि केवल आर्बिट्रेशन क्लॉज़ होने से आपराधिक कार्यवाही नहीं रुक जाती। हालांकि, यह बात असली सवाल का जवाब नहीं देती। कोर्ट को सबसे पहले यह तय करना होगा कि क्या लगाए गए आरोपों से उस आपराधिक अपराध के जरूरी तत्व सामने आते हैं या नहीं। इस मामले में उपलब्ध सामग्री से ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिलता, जिससे यह माना जा सके कि लेन-देन की शुरुआत में ही अपीलकर्ता की मंशा बेईमानीपूर्ण थी, जो कि धोखाधड़ी (Cheating) के अपराध के लिए जरूरी है।”
'जी. स्वामीनाथन और अन्य बनाम राज्य' (जिसमें पुलिस सब-इंस्पेक्टर और अन्य पक्ष थे) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया,
“धोखाधड़ी का अपराध साबित करने के लिए शिकायतकर्ता को यह दिखाना होगा कि वादा करते समय या कोई बात कहते समय आरोपी की मंशा कपटपूर्ण या बेईमानीपूर्ण है।”
कोर्ट ने कानूनी स्थिति को इस प्रकार स्पष्ट किया:
“अनुबंध के उल्लंघन (Breach of Contract) और धोखाधड़ी के अपराध के बीच का अंतर पूरी तरह स्पष्ट है। IPC की धारा 417 और 420 के तहत अपराध के लिए लेन-देन की शुरुआत में ही कपटपूर्ण या बेईमानीपूर्ण मंशा होनी चाहिए। इसी मंशा के कारण शिकायतकर्ता ने अपनी संपत्ति (या पैसा आदि) सामने वाले को दी हो। बाद में अनुबंध की शर्तों को पूरा न कर पाना, अपने आप में ऐसी मंशा का सबूत नहीं माना जा सकता।”
बेंच ने माना कि शिकायत में अपीलकर्ता के खिलाफ धोखाधड़ी के जरूरी तत्व नहीं दिखते हैं। MoU, R1 और कंपनी के बीच हुआ था, और अपीलकर्ता ने इस पर केवल कंपनी के CEO और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (Authorized Signatory) के रूप में हस्ताक्षर किए।
बेंच ने आगे कहा,
"सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 40,00,000 रुपये (चालीस लाख रुपये) की रकम सीधे कंपनी के खाते में ट्रांसफर की गई। ऐसा कोई आरोप नहीं है कि अपीलकर्ता को इसमें से कोई हिस्सा मिला या उसने अपने निजी फायदे के लिए इसका इस्तेमाल किया।"
बेंच ने यह भी गौर किया कि शिकायत के अनुसार, अपीलकर्ता को अच्छी तरह पता था कि चाय बागान और चाय फैक्ट्री कंपनी की नहीं हैं। इस बात को पूरे लेन-देन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। बेंच ने यह भी ध्यान दिया कि R1 को पता था कि चाय बागान UCO बैंक के पास गिरवी (mortgaged) है। MoU में ही UCO बैंक के बकाया और देनदारियों को चुकाने और अंततः चाय बागान का अधिग्रहण करने की बात कही गई थी। रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह भी पता चलता है कि चाय बागान कंपनी के कब्जे में था, कंपनी ही उसे चला रही थी और उस पर कंपनी के काफी दावे भी थे।
कोर्ट ने कहा,
"इन परिस्थितियों में केवल यह कह देना कि अपीलकर्ता को पता था कि दी गई जानकारी गलत है, यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि लेन-देन की शुरुआत से ही उसका इरादा बेईमानी का था।"
इसके अलावा, बेंच ने कहा कि क्या अनुबंध (Contract) को खत्म करना सही था, और क्या R1 भुगतान की गई रकम वापस पाने या किसी अन्य राहत का हकदार है - ये सभी दीवानी (Civil) मामले हैं। केवल इसलिए कि बाद में उनके बीच का अनुबंध टूट गया, इन मामलों को आपराधिक (Criminal) नहीं माना जा सकता।
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और अपीलकर्ता के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की।
कोर्ट ने कहा,
"हमारी राय में अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का मतलब होगा - मुख्य रूप से अनुबंध से जुड़े विवाद को आपराधिक मामले का रूप देना। अपीलकर्ता के खिलाफ IPC की धारा 417 और 420 के तहत अपराध के तत्व नहीं बनते हैं। इसलिए इस कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।"
पीठ ने निष्कर्ष निकाला,
“12. तदनुसार, अपील स्वीकार की जाती है। हाईकोर्ट द्वारा आपराधिक याचिका संख्या 32/2022 में 13.05.2025 को पारित निर्णय और आदेश रद्द किया जाता है। 13. परिणामस्वरूप, दीमापुर, नागालैंड की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में लंबित सी.आर. केस संख्या 17/2022, और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही, अपीलकर्ता के संबंध में रद्द की जाती है। यह स्पष्ट किया जाता है कि इस आदेश से प्रतिवादी संख्या 1 को अपने दीवानी या संविदात्मक दावों के संबंध में कानून के तहत उपलब्ध किसी भी उपाय को अपनाने से नहीं रोका जाएगा।”
Case Title : Indroneel Goho v Razouvonuo Thong & Anr

