सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

11 July 2026 9:45 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (06 जुलाई, 2026 से 10 जुलाई, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    Delhi Rent Act| बैंक के विलय से किरायेदारी अधिकार भी हस्तांतरित होते हैं, मकान मालिक की लिखित सहमति न हो तो बेदखली होगी: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किरायेदार बैंक का किसी अन्य बैंक में विलय (Amalgamation) हो जाता है, तो यह किरायेदारी अधिकारों का हस्तांतरण (Transfer of Tenancy) माना जाएगा। यदि ऐसा हस्तांतरण मकान मालिक की लिखित सहमति के बिना होता है, तो दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम (Delhi Rent Control Act) की धारा 14(1)(b) के तहत बेदखली का आधार बनता है।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के खिलाफ बेदखली का आदेश बहाल करते हुए कहा कि मूल किरायेदार हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक (HCB) के पीएनबी में विलय के बाद किरायेदारी अधिकार और परिसर का कब्जा पीएनबी को स्थानांतरित हो गया। चूंकि यह हस्तांतरण मकान मालिक की लिखित सहमति के बिना हुआ, इसलिए पीएनबी बेदखली के लिए उत्तरदायी है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Commercial Courts Act | दस्तावेज़ों की बड़ी संख्या उन्हें देर से पेश करने का कोई बहाना नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (9 जुलाई) को कहा कि सबूतों का केवल 'बड़ी मात्रा में होना' कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 के तहत उन्हें देर से पेश करने के लिए "उचित कारण" नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा, "...यह अच्छी तरह से स्थापित है कि जब वादी सबूत पेश करता है तो उससे न केवल सभी दस्तावेज़ पेश करने की उम्मीद की जाती है, बल्कि दूसरी तरफ से उसके गवाहों से पूछे जा सकने वाले सवालों का सही अंदाज़ा लगाने की भी उम्मीद की जाती है। रुक-रुक कर या टुकड़ों में काम करने के तरीके को स्वीकार नहीं किया जा सकता। सबूतों की बड़ी मात्रा भी कोई ठोस आधार नहीं है।"

    Cause Title: M/S. LEVITATE MOBILE TECHNOLOGIES PVT. LTD. VERSUS M/S. STANDARD CHARTERED BANK & ANR.

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    ओरांव जनजाति की परंपरा के तहत चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को 'घर-दामाद' के तौर पर नहीं अपना सकते: सुप्रीम कोर्ट

    ओरांव आदिवासी समुदाय में विरासत से जुड़ी पारंपरिक प्रथाओं के मामले में अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (9 जुलाई) को कहा कि मान्यता प्राप्त पारंपरिक कानून के तहत कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को 'घर-दामाद' (घर में रहने वाला दामाद) के तौर पर शामिल नहीं कर सकता।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा, "प्रचलित पारंपरिक कानून में ऐसी कोई बात साबित नहीं हुई है कि कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को अपना घर-दामाद बना सके।"

    Cause Title: BEJLA ORAON VERSUS KALI DAS ORAON & ORS.

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    बार काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं दे सकता IBA, वकीलों की ब्लैकलिस्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) केवल धोखाधड़ी में लापरवाही के आरोपों के आधार पर किसी पैनल वकील का नाम 'कौशन लिस्ट' में डालकर उसे प्रभावी रूप से ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की कार्रवाई से अधिवक्ता के पेशे और प्रतिष्ठा पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने यह फैसला उस विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनाया, जिसमें एक अधिवक्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया था।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    संदिग्ध परिस्थितियों में केवल गवाह की गवाही से वसीयत साबित नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी वसीयत (Will) के निष्पादन को लेकर संदिग्ध परिस्थितियां मौजूद हों, तो केवल गवाह (Attesting Witness) की गवाही के आधार पर उसे वैध नहीं माना जा सकता। वसीयत का समर्थन करने वाले पक्ष (Propounder) पर यह अतिरिक्त दायित्व है कि वह सभी संदेहों को दूर कर अदालत को संतुष्ट करे कि वसीयत वसीयतकर्ता की स्वतंत्र और समझ-बूझकर व्यक्त की गई अंतिम इच्छा थी।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए वर्ष 1974 की एक पंजीकृत वसीयत को अमान्य ठहरा दिया। अदालत ने पाया कि वसीयतकर्ता एक अशिक्षित किसान था, जो केवल अंगूठा लगाना जानता था, और वसीयत से जुड़ी कई संदिग्ध परिस्थितियों का प्रतिवादी संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story