सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

27 Jun 2026 9:15 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (22 जून, 2026 से 26 जून, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    ज़िले से बाहर निकालने के आदेश के ख़िलाफ़ अपील करने में हुई देरी को लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत माफ़ किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य सुरक्षा अधिनियम, 1990 के तहत ज़िले से बाहर निकालने (एक्सटर्नमेंट) के आदेश के ख़िलाफ़ अपील करने में हुई देरी को लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 5 के तहत माफ़ किया जा सकता है।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच ने कहा, "...जब तक कानून साफ़ तौर पर या ज़रूरी मतलब के ज़रिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के लागू होने को रोकता नहीं है, तब तक अपीलीय अथॉरिटी (अधिनियम के तहत) के पास सही मामलों में देरी को माफ़ करने का अधिकार होना चाहिए।"

    Cause Title: JITTU YADAV VERSUS STATE OF CHHATTISGARH & OTHERS

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    Motor Accident Claim | माता-पिता के नुकसान का हिसाब गणितीय सटीकता से नहीं लगाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे की मौत से माता-पिता को हुए नुकसान को "गणितीय सटीकता" से नहीं मापा जा सकता और मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मुआवज़ा तय करना कोई सटीक गणितीय गणना का काम नहीं है।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। कंपनी ने 2013 में दिल्ली में सड़क दुर्घटना में मारे गए 20 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंसी छात्र के माता-पिता को दिए गए मुआवज़े को चुनौती दी थी।

    Case : The Oriental Insurance Co Ltd v Kalu Ram

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    अधिनियम के तहत बने नियम कानून में संशोधन की विधायी शक्ति को सीमित नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी अधिनियम के तहत बनाए गए नियम या विनियम (Regulations) विधायिका की उस शक्ति को सीमित नहीं कर सकते, जिसके तहत वह मूल कानून (Parent Act) में संशोधन कर विनियमों को अप्रभावी बना सकती है।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए भ्रष्टाचार के मामले में दोषसिद्ध एक ग्रुप-ए अधिकारी को सेवा से बर्खास्त करने के दिल्ली नगर निगम आयुक्त के अधिकार को बरकरार रखा।

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    'हाईकोर्ट कॉलेजियम को निर्देश नहीं दिया जा सकता': सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोशन की मांग करने वाले न्यायिक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई से इनकार किया

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (22 जून) को हिमाचल प्रदेश के न्यायिक अधिकारी की रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। अधिकारी ने हाईकोर्ट में प्रमोशन के लिए अपने नाम पर विचार करने की मांग की थी। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि हाईकोर्ट कॉलेजियम को कोई न्यायिक निर्देश नहीं दिया जा सकता।

    याचिकाकर्ता अरविंद मल्होत्रा अभी धर्मशाला में फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज हैं। उनकी शिकायत थी कि हाई कोर्ट कॉलेजियम ने उनके जूनियर्स के नाम आगे बढ़ाए, जिन्हें बाद में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मंज़ूरी दी।

    Case : ARVIND MALHOTRA v. HIGH COURT OF HIMACHAL PRADESH | Diary no. 36875/2026

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    पता बदलने की जानकारी न देने वाला कर्मचारी 'शो-कॉज़ नोटिस' न मिलने का तर्क नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने लेबर कोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें एक कर्मचारी को बकाया वेतन के साथ नौकरी पर वापस रखने (Reinstatement) को कहा गया था। कोर्ट ने कहा कि जो कर्मचारी बिना इजाज़त के अनुपस्थित रहा और ड्यूटी पर वापस लौटने से रोके जाने के अपने दावों को साबित नहीं कर पाया, वह बिना पुष्टि वाले बयानों के आधार पर राहत नहीं मांग सकता।

    कर्मचारी का तर्क था कि नोटिस उसे कभी नहीं मिला क्योंकि इसे गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश में उसके रहने की जगह के बजाय बिहार में उसके स्थायी पते पर भेजा गया। उसने दावा किया कि उसे गैर-कानूनी तरीके से दोबारा नौकरी पर रखने से मना कर दिया गया।

    Cause Title: M/S RIFILIS ENGINEERING PVT. LTD. VS. ARJUN GUPTA

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