Motor Accident Claim | माता-पिता के नुकसान का हिसाब गणितीय सटीकता से नहीं लगाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

25 Jun 2026 9:48 AM IST

  • Motor Accident Claim | माता-पिता के नुकसान का हिसाब गणितीय सटीकता से नहीं लगाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे की मौत से माता-पिता को हुए नुकसान को "गणितीय सटीकता" से नहीं मापा जा सकता और मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मुआवज़ा तय करना कोई सटीक गणितीय गणना का काम नहीं है।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। कंपनी ने 2013 में दिल्ली में सड़क दुर्घटना में मारे गए 20 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंसी छात्र के माता-पिता को दिए गए मुआवज़े को चुनौती दी थी।

    कोर्ट ने कहा,

    "मृतक के माता-पिता को हुए नुकसान को गणितीय सटीकता से नहीं मापा जा सकता, और कुल मिलाकर देखा जाए तो दिया गया मुआवज़ा MV एक्ट के तहत 'उचित मुआवज़े' की सीमा का उल्लंघन नहीं करता है।"

    मृतक, आकाश कुमार, CA (फाइनल) की पढ़ाई कर रहा था और आर्टिकलशिप कर रहा था, तभी वह जिस कार में यात्रा कर रहा था, वह तड़के करीब 3 बजे दिल्ली की सड़क पर खड़े एक ट्रक से टकरा गई। दावा करने वालों का तर्क था कि ट्रक बिना पार्किंग लाइट, रिफ्लेक्टर या चेतावनी संकेत के खड़ा किया गया था, जिससे अंधेरे में वह दिखाई नहीं दे रहा था।

    मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने ट्रक ड्राइवर को लापरवाह माना और ₹81.21 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखा। बीमा कंपनी और दावा करने वाले दोनों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे; बीमा कंपनी मुआवज़ा कम करने की मांग कर रही थी और दावा करने वाले इसे बढ़ाने की मांग कर रहे थे।

    बीमा कंपनी के इस तर्क को खारिज करते हुए कि मुआवज़ा बहुत ज़्यादा था, कोर्ट ने कहा कि हालांकि ट्रिब्यूनल ने एक ऐसी प्रक्रिया अपनाई, जिसमें कुछ हद तक दोहराव था - यानी आय तय करते समय मृतक की भविष्य की पेशेवर संभावनाओं पर विचार किया गया और फिर भविष्य की संभावनाओं के लिए अलग से मुआवज़ा दिया गया - लेकिन इस चरण पर दखल देने से वास्तविक न्याय नहीं होगा।

    बेंच ने कहा कि इस मामले में एक युवा छात्र की मौत हुई, जो एक शानदार पेशेवर करियर की शुरुआत पर था और कानून का मुआवज़ा देने का मकसद आखिरकार उन लोगों को कुछ राहत देना है, जिन्हें कभी न पूरा होने वाला नुकसान हुआ है।

    कोर्ट ने कहा,

    "एक युवा व्यक्ति के जीवन और उसके परिवार को हुए नुकसान को सटीक मौद्रिक शब्दों में नहीं मापा जा सकता, और MV Act के तहत 'उचित मुआवज़े' का निर्धारण गणितीय सटीकता की मांग नहीं करता है।"

    साथ ही कोर्ट ने 'आश्रित होने के नुकसान' (loss of dependency) के लिए मुआवज़ा बढ़ाने की दावेदारों की मांग को ठुकरा दिया। कोर्ट ने कहा कि मुआवज़ा इस अनुमान पर आधारित नहीं हो सकता कि मृतक निश्चित रूप से चार्टर्ड अकाउंटेंट बन जाता और पेशेवर सफलता का एक खास स्तर हासिल कर लेता। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना अटकलबाज़ी के दायरे में आएगा।

    हालांकि, कोर्ट ने पाया कि 'फिलियल कंसोर्टियम' (माता-पिता और बच्चे के बीच के रिश्ते से जुड़े नुकसान) के तहत कोई राशि नहीं दी गई। 'नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी' और 'मैग्मा जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम नानू राम' मामलों में तय सिद्धांतों के आधार पर कोर्ट ने मृतक के माता-पिता में से प्रत्येक को 'फिलियल कंसोर्टियम' के लिए ₹40,000 देने का आदेश दिया।

    इसके अनुसार, कोर्ट ने मुआवज़े की राशि ₹81.21 लाख से बढ़ाकर ₹82.01 लाख की। साथ ही ट्रिब्यूनल द्वारा तय दर से ब्याज भी देने को कहा और बीमा कंपनी को चार हफ़्ते के भीतर बढ़ी हुई राशि जमा करने का निर्देश दिया।

    Case : The Oriental Insurance Co Ltd v Kalu Ram

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