ज़िले से बाहर निकालने के आदेश के ख़िलाफ़ अपील करने में हुई देरी को लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत माफ़ किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
25 Jun 2026 7:58 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य सुरक्षा अधिनियम, 1990 के तहत ज़िले से बाहर निकालने (एक्सटर्नमेंट) के आदेश के ख़िलाफ़ अपील करने में हुई देरी को लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 5 के तहत माफ़ किया जा सकता है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच ने कहा,
"...जब तक कानून साफ़ तौर पर या ज़रूरी मतलब के ज़रिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के लागू होने को रोकता नहीं है, तब तक अपीलीय अथॉरिटी (अधिनियम के तहत) के पास सही मामलों में देरी को माफ़ करने का अधिकार होना चाहिए।"
बेंच ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता की अपील को समय सीमा खत्म होने (टाइम-बार्ड) के आधार पर खारिज करने को सही ठहराया गया था।
अधिनियम की धारा 9 में ज़िले से बाहर निकालने के आदेश के ख़िलाफ़ अपील करने के लिए 30 दिन की समय सीमा तय की गई।
कोर्ट ने ज़ोर दिया कि अगर कोई अधिकतम समय सीमा तय नहीं की गई या किसी आम कानून के लागू होने से साफ़ तौर पर मना नहीं किया गया तो लिमिटेशन एक्ट की धारा 29(2) के अनुसार, लिमिटेशन एक्ट की धारा 4 से 24 तक की धाराएं विशेष कानूनों के तहत होने वाली कार्यवाही पर लागू होंगी।
कोर्ट ने कहा कि जब कानून में सिर्फ़ अपील करने की समय सीमा बताई गई हो, लेकिन कोई अधिकतम समय सीमा या ऐसी बात न कही गई हो जैसे "लेकिन उसके बाद नहीं," "इससे ज़्यादा नहीं," या कोई और ऐसी बात जिससे पता चले कि तय समय के बाद हुई देरी को माफ़ नहीं किया जा सकता, तो इसका मतलब यह है कि "विधायिका का इरादा आम लिमिटेशन कानून से पूरी तरह अलग रहने का नहीं था।"
यह मामला तब शुरू हुआ जब बालोदाबाज़ार-भाटापारा के ज़िला मजिस्ट्रेट ने 18 जून, 2025 को ज़िले से बाहर निकालने का आदेश जारी किया, जिसमें अपीलकर्ता को एक साल तक ज़िले से बाहर रहने का निर्देश दिया गया।
छत्तीसगढ़ राज्य सुरक्षा अधिनियम की धारा 9 के तहत राज्य सरकार के सामने अपीलकर्ता की अपील को समय सीमा खत्म होने (टाइम-बार्ड) के आधार पर खारिज कर दिया गया, क्योंकि इसे तय तीस दिन की अवधि के बाद दायर किया गया। बाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी इस खारिज करने के फ़ैसले को सही ठहराया। सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या 'अधिनियम' की धारा 9 के तहत कार्यवाही में 'लिमिटेशन एक्ट' (समय-सीमा कानून) की धारा 5 को स्पष्ट रूप से या ज़रूरी निहितार्थ (impliedly) से बाहर रखा गया।
अपील मंज़ूरी देते हुए जस्टिस नागरत्ना द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि जब कोई कानून देरी को माफ़ करने की शक्तियों को बाहर रखने के बारे में चुप हो तो ऐसी व्याख्या को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो अपील के अधिकार को बनाए रखे और सही न्याय को बढ़ावा दे, न कि ऐसी व्याख्या को जो तकनीकी आधार पर उस अधिकार को खत्म कर दे।
कोर्ट ने कहा,
"लिमिटेशन कानून का मकसद कानूनी उपायों के इस्तेमाल को नियंत्रित करना और तत्परता सुनिश्चित करना है, लेकिन इसका मकसद अधिकारों, खासकर नागरिक अधिकारों को खत्म करना नहीं है, जब तक कि कानून बनाने वाली संस्था का कोई स्पष्ट आदेश न हो। इसलिए जब कानून देरी को माफ़ करने की शक्तियों को बाहर रखने के बारे में चुप हो, जैसा कि इस मामले में है, तो ऐसी व्याख्या को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो अपील के अधिकार को बनाए रखे और सही न्याय को बढ़ावा दे, न कि ऐसी व्याख्या को जो केवल तकनीकी आधार पर उस अधिकार को खत्म कर दे। जैसा कि बताया गया, यह सिद्धांत तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब परिणाम गंभीर हों। पर्याप्त कारण बताए जाने के बावजूद केवल देरी के कारण अपील की समीक्षा से इनकार करने से अपूरणीय नुकसान हो सकता है, असल में अपील का अधिकार ही खत्म हो सकता है, क्योंकि अपील की समय-सीमा केवल तीस दिन है और अगर अपील 31वें दिन भी दायर की जानी हो तो भी ऐसा हो सकता है। इसलिए जब तक कानून स्पष्ट रूप से या ज़रूरी निहितार्थ से 'लिमिटेशन एक्ट' की धारा 5 के लागू होने को बाहर नहीं करता, तब तक अपील अधिकारी के पास उचित मामलों में देरी को माफ़ करने का अधिकार होना चाहिए। इसलिए ऐसी व्याख्या की जानी चाहिए जो 'अधिनियम' की धारा 9 के तहत अपील का अधिकार चाहने वाले अपीलकर्ता के पक्ष में हो।"
कोर्ट ने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए समझाया कि जब तक कानून में 'लिमिटेशन एक्ट' के लागू होने को विशेष रूप से बाहर नहीं किया जाता, तब तक "'लिमिटेशन एक्ट' की धारा 5 लागू होती है और 'लिमिटेशन एक्ट' की धारा 5 के अनुसार पर्याप्त कारण बताए जाने पर अपील दायर करने में हुई देरी को माफ़ किया जा सकता है।"
ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील को मंज़ूरी दी गई।
कोर्ट ने कहा,
"...'अधिनियम' की धारा 9 के तहत राज्य सरकार के समक्ष अपील को बहाल किया जाता है। इसका फैसला इसके गुण-दोष के आधार पर और कानून के अनुसार जल्द-से-जल्द और किसी भी स्थिति में 15.06.2026 को या उससे पहले किया जाएगा।"
Cause Title: JITTU YADAV VERSUS STATE OF CHHATTISGARH & OTHERS

