पता बदलने की जानकारी न देने वाला कर्मचारी 'शो-कॉज़ नोटिस' न मिलने का तर्क नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
22 Jun 2026 12:03 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने लेबर कोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें एक कर्मचारी को बकाया वेतन के साथ नौकरी पर वापस रखने (Reinstatement) को कहा गया था। कोर्ट ने कहा कि जो कर्मचारी बिना इजाज़त के अनुपस्थित रहा और ड्यूटी पर वापस लौटने से रोके जाने के अपने दावों को साबित नहीं कर पाया, वह बिना पुष्टि वाले बयानों के आधार पर राहत नहीं मांग सकता।
कर्मचारी का तर्क था कि नोटिस उसे कभी नहीं मिला क्योंकि इसे गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश में उसके रहने की जगह के बजाय बिहार में उसके स्थायी पते पर भेजा गया। उसने दावा किया कि उसे गैर-कानूनी तरीके से दोबारा नौकरी पर रखने से मना कर दिया गया।
कर्मचारी के तर्कों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियोक्ता (Employer) को उस पते पर नोटिस भेजने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो खुद कर्मचारी ने दिया।
कोर्ट ने कहा,
"एक नियोक्ता से केवल उसी पते पर कर्मचारी से संपर्क करने की उम्मीद की जा सकती है, जो कर्मचारी ने दिया। अगर प्रतिवादी-कर्मचारी ने अपना रहने का स्थान बदल लिया था तो इस बदलाव की जानकारी नियोक्ता को देने की ज़िम्मेदारी उसी की थी। उसे इस मामले में अपनी ही चूक का फ़ायदा उठाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।"
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। इसमें प्रतिवादी, जो अपीलकर्ता कंपनी में कर्मचारी के तौर पर काम कर रहा था, लगभग 24 दिनों तक बिना इजाज़त अनुपस्थित रहा। उसे बिहार में उसके स्थायी पते पर अपनी अनुपस्थिति का कारण बताने के लिए 'शो-कॉज़ नोटिस' भेजा गया और चेतावनी दी गई कि ऐसा न करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, नोएडा में रहने के कारण उसे कंपनी का 'शो-कॉज़ नोटिस' कभी नहीं मिला।
चूंकि नियोक्ता के पास मौजूदा आवासीय पता अपडेट नहीं था, इसलिए बिहार वाले पते पर भेजे गए नोटिस का कोई जवाब नहीं मिला। विवाद तब शुरू हुआ, जब प्रतिवादी 24 दिनों की अनुपस्थिति के बाद नौकरी पर वापस लौटना चाहता था, लेकिन अपीलकर्ता-कंपनी ने उसे शामिल होने से रोक दिया। प्रतिवादी का तर्क था कि उसने अपने वरिष्ठ अधिकारी को सूचित किया और अपनी माँ की खराब सेहत के कारण नौकरी से अनुपस्थित रहा।
अपीलकर्ता द्वारा प्रतिवादी को नौकरी पर वापस लेने की अनुमति न देने के कारण कई कानूनी मामले चले। आखिरकार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को निर्देश दिया कि वह प्रतिवादी को बकाया वेतन के साथ नौकरी पर वापस रखे, जिसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने विवादित आदेश रद्द करते हुए अपील करने वाले एम्प्लॉयर (नियोक्ता) की बात मान ली कि रेस्पॉन्डेंट (कर्मचारी) बिना इजाज़त नौकरी से गायब था और इस बात का कोई दस्तावेज़ी सबूत नहीं था कि वह अपनी माँ की बीमारी के कारण काम पर नहीं आ पाया।
कोर्ट ने कहा कि माँ की बीमारी की देखभाल के लिए अनुपस्थित रहने का कोई दस्तावेज़ी सबूत न होने पर, बिना इजाज़त अनुपस्थिति के बारे में उसके बिना दस्तावेज़ वाले दावे पर भरोसा करना सही नहीं होगा।
कोर्ट ने कहा,
"रेस्पॉन्डेंट-कर्मचारी का दावा है कि वह अपनी माँ की गंभीर बीमारी के कारण अनुपस्थित था और उसने जाने से पहले अपने सीनियर को ज़ुबानी तौर पर सूचित किया। यह दावा पूरी तरह से बिना सबूत के है। इसके समर्थन में कोई दस्तावेज़ी सबूत पेश नहीं किया गया। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुपस्थिति की अवधि के दौरान, रेस्पॉन्डेंट-कर्मचारी ने अपने एम्प्लॉयर को अपनी अनुपस्थिति के कारणों को बताते हुए या छुट्टी मांगते हुए कोई लिखित सूचना नहीं भेजी। यदि उसका स्पष्टीकरण सही होता तो वह कोई पत्र या अन्य लिखित सूचना भेज सकता था। ऐसा न कर पाने के कारण वह अब अपनी बिना इजाज़त अनुपस्थिति को सही ठहराने के लिए केवल ज़ुबानी दावे पर भरोसा नहीं कर सकता।"
बेंच ने कहा,
"हम पाते हैं कि रेस्पॉन्डेंट-कर्मचारी बिना इजाज़त अनुपस्थित रहा, अनुपस्थिति के दौरान अपने एम्प्लॉयर को कोई लिखित सूचना भेजने में विफल रहा, अपनी अनुपस्थिति को समझाने के लिए कोई दस्तावेज़ी सबूत पेश नहीं किया और ड्यूटी पर वापस लौटने के किसी भी प्रयास का कोई सबूत पेश नहीं किया। इसलिए लेबर कोर्ट और हाई कोर्ट ने ऐसे सबूतों के अभाव में राहत देकर गलती की। अपीलकर्ता की रिट याचिका स्वीकार किए जाने योग्य है।"
इसके अनुसार, अपील स्वीकार की गई और रेस्पॉन्डेंट को नौकरी से हटाने का फैसला सही ठहराया गया।
Cause Title: M/S RIFILIS ENGINEERING PVT. LTD. VS. ARJUN GUPTA

