सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
8 Aug 2026 9:00 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (03 अगस्त, 2026 से 07 अगस्त, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
Preventive Detention | प्रतिनिधित्व करने के अधिकार के बारे में न बताना गंभीर चूक, नज़रबंद व्यक्ति के खुद आवेदन करने पर भी यह कमी पूरी नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर नज़रबंद करने वाला अधिकारी नज़रबंद व्यक्ति को उसके सामने अपना पक्ष रखने (यानी प्रतिनिधित्व करने) के अधिकार के बारे में नहीं बताता है तो नज़रबंदी का आदेश गैर-कानूनी हो जाएगा। ऐसा तब भी होगा, जब नज़रबंद व्यक्ति ने खुद ही ऐसा कोई आवेदन या पक्ष रखा हो।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 'नशीले पदार्थों और साइकोट्रोपिक पदार्थों की अवैध तस्करी की रोकथाम अधिनियम, 1988' के तहत की गई नज़रबंदी रद्द की। बेंच ने पाया कि नज़रबंद करने वाले अधिकारी ने नज़रबंद व्यक्ति को अधिकारी के सामने अपना पक्ष रखने के अधिकार के बारे में नहीं बताया था।
Cause Title: ALFIYA.A VERSUS STATE OF KERALA & ORS.
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National Highways Act | रेफ़रेंस कोर्ट मुआवज़े के हक के लिए मालिकाना हक़ तय कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फ़ैसला सुनाया कि नेशनल हाईवेज़ एक्ट के तहत रेफ़रेंस कोर्ट मुआवज़े के हक को तय करने के लिए मालिकाना हक़ से जुड़े सवालों पर भी विचार कर सकता है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, "इसलिए धारा 3H (4) के तहत रेफ़रेंस कोर्ट का अधिकार क्षेत्र इतना व्यापक है कि वह मालिकाना हक़ से जुड़े सवालों पर भी विचार कर सकता है, बशर्ते ऐसा करना ज़मीन अधिग्रहण से मिलने वाले मुआवज़े के हकदार व्यक्ति को तय करने के लिए ज़रूरी हो। इसके उलट कोई भी व्याख्या विधायी योजना को विफल कर देगी और पार्टियों को मालिकाना हक़ की घोषणा के लिए अलग से सिविल मुक़दमे करने पर मजबूर करेगी, जिससे विवाद को मुख्य सिविल कोर्ट में भेजने का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।"
Cause Title: K. VENKATASWAMY & ORS. VS. GOWRAMMA & ANR.
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कर्मचारी को नौकरी में बनाए रखने के फ़ैसले में 'वॉश्ड-ऑफ़ थ्योरी' लागू नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 अगस्त) को कहा कि नौकरी में बनाए रखने के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता का आकलन करते समय नियोक्ता (Employer) केवल कर्मचारी के हालिया सर्विस रिकॉर्ड के आधार पर फ़ैसला लेने के लिए बाध्य नहीं है; बल्कि, फ़ैसला कर्मचारी के पूरे सर्विस रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए।
इसका मतलब है कि "वॉश्ड-ऑफ़ थ्योरी" - जिसके तहत प्रमोशन मिलने के बाद पिछली खराब एंट्रीज़ (Adverse Entries) को खत्म मान लिया जाता है - नौकरी में बनाए रखने के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता का आकलन करते समय लागू नहीं होती है।
Cause Title: SUSHIL SHARMA VERSUS UNION OF INDIA AND OTHERS
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कॉम्प्रिहेंसिव/पैकेज मोटर इंश्योरेंस में गाड़ी में बैठे लोग भी कवर होते हैं: सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग तरह की पॉलिसी के बारे में बताया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉम्प्रिहेंसिव मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी में गाड़ी के मालिक और उसमें बैठे लोग कवर होते हैं और इसे बेसिक थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस पॉलिसी के बराबर नहीं माना जा सकता। साथ ही कोर्ट ने इंश्योरेंस कंपनियों को एक स्टैंडर्ड "ऑप्ट-इन" सिस्टम अपनाने की सलाह दी है, जिससे ग्राहक इंश्योरेंस खरीदते समय अतिरिक्त कवर चुन सकें।
यह फैसला नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की उस अपील पर आया, जो तेलंगाना हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर की गई। हाईकोर्ट ने टी. रामू के परिवार को मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जिनकी मौत अपनी ही मारुति 800 कार के सड़क हादसे में हो गई।
Case Details: National Insurance Co Ltd v Smt Thungala Dhana Laxmi
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Solid Waste Management Rules 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को पर्यावरण मुआवज़े पर गाइडलाइंस बनाने का निर्देश दिया
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने 'सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026' के तहत पर्यावरण मुआवज़ा तय करने के लिए गाइडलाइंस के तौर पर कई सिद्धांत तय किए। साथ ही कोर्ट ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) को ऐसा मुआवज़ा लगाने और वसूलने के लिए विस्तृत गाइडलाइंस बनाने का निर्देश दिया।
जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट से जुड़ी अपीलों पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि 'सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026' के नोटिफ़िकेशन के बाद, अब ध्यान सिर्फ़ कानून बनाने से हटकर मज़बूत संस्थागत सिस्टम के ज़रिए उनके असरदार तरीके से लागू होने को सुनिश्चित करने पर होना चाहिए।
Case : Amravati Municipal Corporation v Ganesh Dadarao Anasane and others
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सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: कारों के लिए थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस को 4 साल और दो-पहिया वाहनों के लिए 6 साल तक बढ़ाया जाए
एक अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने नई कारों के लिए थर्ड-पार्टी मोटर वाहन इंश्योरेंस की अवधि को चार साल और नए दो-पहिया वाहनों के लिए छह साल तक बढ़ाने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट के 2018 के निर्देश के बाद यह कारों के लिए 3 साल और दो-पहिया वाहनों के लिए 5 साल है।
मंगलवार को कोर्ट ने गौर किया कि आठ साल पहले जारी किए गए इस निर्देश के बावजूद, कई वाहन बिना इंश्योरेंस के हैं। इसलिए कोर्ट ने इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (IRDAI) और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल (GIC) की आपत्तियों के बावजूद नई पॉलिसी की अवधि बढ़ाने का निर्देश दिया।
Case : National Insurance Co Ltd v Smt Thungala Dhana Laxmi
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IPC की धारा 498A 'शादी जैसे रिश्तों' पर भी होगी लागू: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (3 अगस्त) को कहा कि 'शादी जैसे रिश्तों' (Live in Relationship) में रहने वाली महिलाओं को IPC की धारा 498A के तहत सुरक्षा से बाहर रखना भेदभावपूर्ण होगा। कोर्ट ने माना कि ऐसे रिश्ते में रहने वाले पुरुष पर भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धारा 498A के तहत घरेलू क्रूरता का मुकदमा चलाया जा सकता है। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि यह फ़ैसला उन "लिव-इन रिश्तों" पर लागू होगा जो "शादी जैसे रिश्तों" की श्रेणी में आते हैं, यानी जहाँ शादी करने का इरादा साफ़ हो।
Cause Title: X & ORS. VERSUS STATE OF KARNATAKA & ANR.
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Court Fees Act | ज़मीन अधिग्रहण मुआवज़े में कानूनी फ़ायदों के ख़िलाफ़ अपील पर मूल्य-आधारित कोर्ट फ़ीस लगेगी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज़मीन अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत ऐसी अपील, जो मुआवज़े के तय होने या उसे बढ़ाने को चुनौती दिए बिना सिर्फ़ कानूनी फ़ायदों (Statutory Benefits) को पाने तक सीमित हो, उस पर कोर्ट फ़ीस अधिनियम, 1870 की धारा 8 के तहत डिक्री की गई राशि पर 'एड वैलोरम' (मूल्य-आधारित) कोर्ट फ़ीस लगेगी।
जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा, "धारा 54 के तहत ऐसी किसी भी चीज़ (कानूनी फ़ायदों) को कम करने या हटाने की अपील, मुआवज़े से जुड़े रेफरेंस कोर्ट के फ़ैसले (डिक्री) के ख़िलाफ़ अपील है। इसलिए इस पर कोर्ट फ़ीस अधिनियम की धारा 8 के तहत 'एड वैलोरम' कोर्ट फ़ीस लगती है। इसलिए हमें हाईकोर्ट के इस नज़रिए में कोई गलती नहीं लगती कि अपील के मेमोरेंडम के साथ 'एड वैलोरम' कोर्ट फ़ीस जमा की जानी चाहिए थी और तय कोर्ट फ़ीस का भुगतान कानून के ख़िलाफ़ है। इसलिए हाईकोर्ट के फ़ैसले में दखल देने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
Cause Title: TEHRI HYDRO DEVELOPMENT CORPORATION LTD. VERSUS S.P. SINGH & ORS.
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सिर्फ 'संदेह' के आधार पर बैंक अकाउंट फ्रीज नहीं कर सकती ED, 'Reasons to Believe' अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2000 की धारा 17(1A) के तहत केवल 'संदेह' (Suspicion) के आधार पर बैंक खाते फ्रीज नहीं किए जा सकते। इसके लिए सक्षम प्राधिकारी के पास 'Reasons to Believe' (विश्वास के कारण) होना अनिवार्य है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट की व्याख्या से सहमति जताते हुए कहा कि भले ही धारा 17(1A) में "Reasons to Believe" शब्दों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन इसे धारा 17(1) से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। जब्ती (Seizure) के लिए 'Reasons to Believe' आवश्यक है और चूंकि फ्रीज करना जब्ती का ही एक वैकल्पिक उपाय है, इसलिए उस पर भी वही मानक लागू होगा।


