Preventive Detention | प्रतिनिधित्व करने के अधिकार के बारे में न बताना गंभीर चूक, नज़रबंद व्यक्ति के खुद आवेदन करने पर भी यह कमी पूरी नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

7 Aug 2026 6:44 PM IST

  • Preventive Detention | प्रतिनिधित्व करने के अधिकार के बारे में न बताना गंभीर चूक, नज़रबंद व्यक्ति के खुद आवेदन करने पर भी यह कमी पूरी नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर नज़रबंद करने वाला अधिकारी नज़रबंद व्यक्ति को उसके सामने अपना पक्ष रखने (यानी प्रतिनिधित्व करने) के अधिकार के बारे में नहीं बताता है तो नज़रबंदी का आदेश गैर-कानूनी हो जाएगा। ऐसा तब भी होगा, जब नज़रबंद व्यक्ति ने खुद ही ऐसा कोई आवेदन या पक्ष रखा हो।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 'नशीले पदार्थों और साइकोट्रोपिक पदार्थों की अवैध तस्करी की रोकथाम अधिनियम, 1988' के तहत की गई नज़रबंदी रद्द की। बेंच ने पाया कि नज़रबंद करने वाले अधिकारी ने नज़रबंद व्यक्ति को अधिकारी के सामने अपना पक्ष रखने के अधिकार के बारे में नहीं बताया था।

    कोर्ट ने कहा,

    "यह तथ्य कि नज़रबंद व्यक्ति ने फिर भी नज़रबंद करने वाले अधिकारी को अपना आवेदन भेजा, उस संवैधानिक अधिकार के बारे में उसे न बताने की चूक को ठीक नहीं कर सकता। अधिकार के बारे में बताना अधिकारी की ज़िम्मेदारी थी और यह इस बात पर निर्भर नहीं हो सकता कि नज़रबंद व्यक्ति को इसके बारे में खुद पता चला या नहीं... नज़रबंद व्यक्ति को उस अधिकारी के सामने अपना पक्ष रखने के अधिकार के बारे में नहीं बताया गया, जिसने आदेश जारी किया... ये कमियां संविधान के अनुच्छेद 22(5) का उल्लंघन करती हैं और नज़रबंद व्यक्ति की नज़रबंदी को गैर-कानूनी ठहराने के लिए काफी हैं।"

    इस मामले में नज़रबंदी का आदेश जारी करते समय नज़रबंद करने वाले अधिकारी ने नज़रबंद व्यक्ति को यह नहीं बताया कि वह अधिकारी के सामने अपना पक्ष रख सकता है, जबकि उसे यह बताया गया था कि वह राज्य सरकार, सलाहकार बोर्ड और केंद्र सरकार के सामने अपना पक्ष रख सकता है। वास्तव में नज़रबंद व्यक्ति को अलग से यह नहीं बताया गया था कि उसे उस अधिकारी के सामने अपना पक्ष रखने का अधिकार है जिसने विशेष कानूनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए नज़रबंदी का आदेश जारी किया।

    अपीलकर्ता नज़रबंद व्यक्ति की पत्नी हैं। उसने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उनके पति की नज़रबंदी को सही ठहराया गया।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने संविधान के अनुच्छेद 22(5) का पालन न करने का तर्क दिया गया। यह अनुच्छेद नज़रबंद करने वाले अधिकारी के लिए यह ज़रूरी बनाता है कि वह नज़रबंदी के आधार बताए और नज़रबंद व्यक्ति को अधिकारी के सामने अपना पक्ष रखने का अधिकार दे।

    अपील करने वाले की दलील में दम देखते हुए कोर्ट ने 'कमलेशकुमार ईश्वरदास पटेल बनाम भारत संघ, (1995) 4 SCC 51' मामले का हवाला देते हुए कहा:

    “जब नज़रबंदी का आदेश PITNDPS Act की धारा 3(1) के तहत विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी द्वारा दिया जाता है तो नज़रबंद व्यक्ति को उस अधिकारी के सामने अपनी बात रखने (रिप्रेजेंटेशन देने) का अधिकार होता है, जिसने आदेश दिया था और जो उसे रद्द करने का अधिकार रखता है। उसे इस अधिकार के बारे में सूचित किया जाना चाहिए... नज़रबंद व्यक्ति को इसके बारे में न बताना उसकी बात रखने के मौके को अधूरा बना देता है और उसे एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय से वंचित करता है।”

    कोर्ट ने पाया कि नज़रबंदी करने वाले अधिकारी ने नज़रबंद व्यक्ति को आदेश के खिलाफ अपनी बात रखने के अधिकार के बारे में सूचित नहीं किया, जो स्पष्ट था, और इस वजह से उसकी नज़रबंदी गैर-कानूनी हो गई।

    कोर्ट ने कहा,

    “…नज़रबंदी का आदेश नज़रबंदी करने वाले अधिकारी द्वारा PITNDPS Act की धारा 3(1) के तहत विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी को दी गई शक्ति का इस्तेमाल करते हुए दिया गया। नज़रबंद व्यक्ति को सूचित किया गया कि वह राज्य सरकार, सलाहकार बोर्ड और केंद्र सरकार के सामने अपनी बात रख सकता है। उसे अलग से यह नहीं बताया गया कि वह उस अधिकारी के सामने भी अपनी बात रख सकता है जिसने विशेष रूप से दी गई कानूनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए नज़रबंदी का आदेश दिया। यह चूक नज़रबंदी आदेश से ही स्पष्ट है। यह तथ्य कि नज़रबंद व्यक्ति ने फिर भी अपनी एक बात (रिप्रेजेंटेशन) नज़रबंदी करने वाले अधिकारी को भेजी थी, उसे उस संवैधानिक अधिकार के बारे में सूचित न करने की चूक को ठीक नहीं कर सकता।”

    ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील मंज़ूर कर ली गई; जिससे नज़रबंदी का आदेश रद्द हो गया और लगभग सात महीने की गैर-कानूनी नज़रबंदी के बाद नज़रबंद व्यक्ति की रिहाई का रास्ता साफ हो गया।

    Cause Title: ALFIYA.A VERSUS STATE OF KERALA & ORS.

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