सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

3 May 2026 8:45 AM IST

  • सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (27 अप्रैल, 2026 से 01 मई, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    'JAO, IT री-असेसमेंट नोटिस जारी नहीं कर सकते': सुप्रीम कोर्ट ने Finance Act 2026 के आधार पर रद्द किए हाईकोर्ट के फ़ैसले

    एक अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने Income-tax Act, 1961 के तहत री-असेसमेंट नोटिस जारी करने के अधिकार से जुड़े मुद्दे पर नए सिरे से विचार करने के लिए हज़ारों टैक्स अपीलों को संबंधित हाईकोर्ट्स को वापस भेज दिया। Finance Act, 2026 द्वारा किए गए संशोधन पर ध्यान देते हुए—जो यह साफ़ करता है कि ऐसे अधिकार Jurisdictional Assessing Officers (JAO) के पास होते हैं, न कि फ़ेसलेस यूनिट्स के पास—कोर्ट ने इस मामले पर मेरिट के आधार पर फ़ैसला न करने का फ़ैसला किया। इसके बजाय High Courts को निर्देश दिया कि वे बदली हुई कानूनी स्थिति की रोशनी में इस मुद्दे की दोबारा जांच करें।

    Case : Asst Commissioner of Income Tax v. Aristo Pharmaceuticals Private Ltd

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    हेड-ऑन टक्कर में बिना गहन जांच के एक ड्राइवर को अकेले दोषी नहीं ठहराया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हेड-ऑन (आमने-सामने) टक्कर के मामलों में बिना सभी परिस्थितियों और पक्षों के आचरण की गहन जांच किए, किसी एक ड्राइवर पर पूरा दोष नहीं डाला जा सकता।

    जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया। दोनों ने मृत कार चालक को दुर्घटना के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया था।

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    CrPC की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश देने के लिए मजिस्ट्रेट को पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को CrPC की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश देने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 196/197 के तहत पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होती।

    कोर्ट ने कहा, "CrPC की धारा 196 और 197 (या BNSS में संबंधित प्रावधानों) के तहत पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत, संज्ञान लेने के चरण पर लागू होती है। यह CrPC की धारा 156(3)/BNSS की धारा 175(3) के तहत FIR दर्ज करने या जांच करने के संज्ञान-पूर्व चरण तक विस्तारित नहीं होती।"

    Case Title: Brinda Karat v.State of NCT of Delhi and others SLP(Crl) 5107/2023 (and connected cases)

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    जाली वसीयत पर आधारित संपत्ति खरीदने वाला खरीदार आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी जाली वसीयत (Will) के आधार पर खरीदी गई संपत्ति के मामले में, यदि खरीदार को उस जालसाजी की जानकारी नहीं थी, तो उसे आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब खरीद के समय खरीदार को कथित फर्जी वसीयत की जानकारी नहीं थी और वह संबंधित अवधि में विदेश में था, तो उसे धोखाधड़ीपूर्ण लेन-देन के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

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    अगर नियुक्ति 'अगले आदेश तक' की शर्त पर है तो पूरा कार्यकाल करने का कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (28 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि अगर किसी नियुक्ति आदेश में कार्यकाल को "अगले आदेश तक" की शर्त के अधीन रखा गया है तो इससे कर्मचारी को पूरे कार्यकाल तक पद पर बने रहने का कोई ऐसा अधिकार नहीं मिल जाता, जिसे वह कानूनी तौर पर लागू करवा सके।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला सही ठहराया, जिसमें प्रतिवादी अधिकारियों द्वारा अपीलकर्ता का कार्यकाल कम किए जाने का फैसला बरकरार रखा गया था। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि हालांकि नियुक्ति आदेश में पांच साल के कार्यकाल का ज़िक्र था, लेकिन यह स्पष्ट रूप से इस शर्त के अधीन था कि "या अगले आदेश तक, जो भी पहले हो।"

    Cause Title: SADACHARI SINGH TOMAR VERSUS UNION OF INDIA & ORS.

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    S.27 Evidence Act | अलग-अलग आरोपियों के संयुक्त बयान तभी स्वीकार्य, जब उनसे अलग-अलग नई बातें सामने आती हों: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अलग-अलग आरोपियों द्वारा दिए गए संयुक्त या एक साथ दिए गए खुलासे के बयान साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत तभी स्वीकार्य हैं, जब ऐसे बयानों से अपराध से जुड़े अलग और प्रासंगिक तथ्यों का पता चलता हो।

    जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह फैसला कर्नाटक से जुड़े हत्या के मामले में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देने वाले दो दोषियों द्वारा दायर आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने अंततः अपीलकर्ताओं को बरी किया, लेकिन भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत संयुक्त खुलासे के बयानों के साक्ष्य मूल्य पर कानूनी स्थिति स्पष्ट की।

    Cause Title: ANAND JAKKAPPA PUJARI @GADDADAR VERSUS THE STATE OF KARNATAKA (with connected case)

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    7 साल तक की सजा वाले गैर-जमानती अपराधों में धारा 480(3) BNSS की शर्तें लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे गैर-जमानती अपराध जिनमें अधिकतम सजा सात वर्ष तक है, उनमें जमानत देते समय Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 480(3) के तहत निर्धारित शर्तें लागू नहीं की जा सकतीं।

    जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी को Madhya Pradesh Excise Act (मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम) के तहत अवैध शराब रखने के आरोप में जमानत दी गई थी। इस अपराध में अधिकतम सजा तीन वर्ष निर्धारित है।

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    मकान मालिक के कानूनी वारिस बेदखली के मुकदमे में 'वास्तविक ज़रूरत' जोड़ने के लिए संशोधन कर सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की है कि यदि कोई मकान मालिक, जिसने अपने और अपने परिवार के लिए 'वास्तविक ज़रूरत' (bona fide requirement) के आधार पर बेदखली का मुकदमा दायर किया था, उसका निधन हो जाता है तो उसके कानूनी वारिस मुकदमे की दलीलों में संशोधन करके 'वास्तविक ज़रूरत' के अतिरिक्त आधारों को शामिल कर सकते हैं; बशर्ते कि ऐसे संशोधन मुकदमे के मूल आधार से न तो टकराते हों और न ही उसे बदलते हों।

    जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने मकान मालिक के कानूनी वारिसों (पत्नी और बच्चों) द्वारा दायर अपील पर सुनवाई की। ये वारिस बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले से व्यथित थे, जिसमें उन्हें मुकदमे की अर्जी (plaint) में संशोधन करके अपनी अतिरिक्त 'वास्तविक ज़रूरतों' को शामिल करने का अवसर देने से इनकार किया था, जबकि ये ज़रूरतें मूल मकान मालिक द्वारा बताई गई 'वास्तविक ज़रूरतों' के अनुरूप ही हैं।

    Cause Title: VINAY RAGHUNATH DESHMUKH VERSUS NATWARLAL SHAMJI GADA AND ANOTHER

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    अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय कोर्ट आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय किसी आरोपी को ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश देने का अधिकार कोर्ट के पास नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की, "अगर कोर्ट अग्रिम ज़मानत खारिज करना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है, लेकिन कोर्ट के पास यह कहने का अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता को अब सरेंडर कर देना चाहिए।"

    Case Title – Om Prakash Chhawnika @ Om Prakash Chabnika @ Om Prakash Chawnika v. State of Jharkhand & Anr.

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