मकान मालिक के कानूनी वारिस बेदखली के मुकदमे में 'वास्तविक ज़रूरत' जोड़ने के लिए संशोधन कर सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

26 April 2026 4:38 PM IST

  • मकान मालिक के कानूनी वारिस बेदखली के मुकदमे में वास्तविक ज़रूरत जोड़ने के लिए संशोधन कर सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की है कि यदि कोई मकान मालिक, जिसने अपने और अपने परिवार के लिए 'वास्तविक ज़रूरत' (bona fide requirement) के आधार पर बेदखली का मुकदमा दायर किया था, उसका निधन हो जाता है तो उसके कानूनी वारिस मुकदमे की दलीलों में संशोधन करके 'वास्तविक ज़रूरत' के अतिरिक्त आधारों को शामिल कर सकते हैं; बशर्ते कि ऐसे संशोधन मुकदमे के मूल आधार से न तो टकराते हों और न ही उसे बदलते हों।

    जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने मकान मालिक के कानूनी वारिसों (पत्नी और बच्चों) द्वारा दायर अपील पर सुनवाई की। ये वारिस बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले से व्यथित थे, जिसमें उन्हें मुकदमे की अर्जी (plaint) में संशोधन करके अपनी अतिरिक्त 'वास्तविक ज़रूरतों' को शामिल करने का अवसर देने से इनकार किया था, जबकि ये ज़रूरतें मूल मकान मालिक द्वारा बताई गई 'वास्तविक ज़रूरतों' के अनुरूप ही हैं।

    बेदखली के एक मूल मुकदमे में मकान मालिक ने अपने और अपने परिवार के सदस्यों के लिए 'वास्तविक ज़रूरत' के आधार पर प्रतिवादी-किरायेदार से जगह खाली करवाने की मांग की थी। ट्रायल कोर्ट ने इस मुकदमे को यह कहते हुए खारिज किया था कि मकान मालिक यह बताने में विफल रहा कि यदि जगह खाली हो जाती है तो वह उस जगह पर कौन सा व्यवसाय शुरू करेगा।

    ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील के दौरान, मकान मालिक का निधन हो गया। इसके बाद अपीलकर्ता (कानूनी वारिस) को मुकदमे में पक्षकार के रूप में शामिल किया गया। अपीलकर्ता ने बेदखली के अपने आधार को और मज़बूत करने के लिए मुकदमे में संशोधन करके 'वास्तविक ज़रूरत' के कुछ अतिरिक्त आधारों को शामिल करने की अनुमति मांगी। अपीलकर्ता ने कहा कि उन्हें मुकदमे वाली जगह की 'वास्तविक ज़रूरत' है ताकि वे अपनी माँ के लिए एक 'वकील का चैंबर' (Advocate Chamber) खोल सकें। साथ ही अपने लिए एक क्लिनिक बनाकर अपना मेडिकल प्रैक्टिस शुरू कर सकें।

    अपीलीय अदालत ने मुकदमे की अर्जी में संशोधन की मांग वाली याचिका स्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि अपीलकर्ताओं ने कोई भी ऐसी दलील नहीं दी है जो मुकदमे के मूल आधार के विपरीत हो।

    अपीलीय अदालत के इस फैसले से व्यथित होकर प्रतिवादी-किरायेदार ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट के 'रिट क्षेत्राधिकार' (Writ Jurisdiction) का सहारा लिया। उसने यह तर्क दिया कि यदि कानूनी वारिसों द्वारा मांगे गए संशोधन की अनुमति दे दी जाती है तो इसका मतलब एक बिल्कुल नया मुकदमा शुरू करना होगा, जो कि मूल मकान मालिक द्वारा दी गई दलीलों के पूरी तरह से असंगत है। किरायेदार ने यह भी तर्क दिया कि मूल मकान मालिक की मृत्यु के साथ ही उसकी 'ज़रूरत' भी समाप्त हो गई। अब उसके कानूनी वारिस 'वास्तविक ज़रूरत' के नए आधारों को शामिल करके उस ज़रूरत का दावा नहीं कर सकते।

    हाईकोर्ट द्वारा अपीलीय अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने के निर्णय के कारण मकान मालिक के कानूनी वारिसों को सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी पड़ी। अदालत के सामने यह मुद्दा था कि क्या मकान मालिक के कानूनी वारिसों द्वारा मांगी गई शिकायत में संशोधन की अनुमति इस आधार पर देने से इनकार कर दिया जाना चाहिए कि मकान मालिक की मृत्यु के बाद वास्तविक ज़रूरत के आधार पर किरायेदार को बेदखल करने का दावा अब मान्य नहीं रहा।

    हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस चंदुरकर द्वारा लिखे गए फैसले में इस मुद्दे का जवाब 'नहीं' में दिया गया और यह माना गया कि मकान मालिक की मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिसों द्वारा बेदखली के मुकदमे में मांगे गए संशोधन को अस्वीकार नहीं किया जा सकता; खासकर तब, जब बाद में हुई ऐसी घटनाओं से वास्तविक ज़रूरत के अतिरिक्त आधार सामने आए हों, जिनका पक्षों को राहत मिलने के अधिकार पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता हो।

    अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा,

    “इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह सिद्धांत लागू होता है कि पक्षों के अधिकारों का निर्णय मुकदमे की शुरुआत के समय मौजूद अधिकारों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए। हालांकि, यदि बाद में ऐसी घटनाएं घटित होती हैं, जिनका पक्षों को राहत मिलने के अधिकार पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है तो अदालत को उन घटनाओं का संज्ञान लेने और कानून के अनुसार राहत को संशोधित करने से रोका नहीं जा सकता।”

    अदालत ने आगे कहा कि चूंकि बेदखली का मुकदमा मकान मालिक और उसके परिवार की वास्तविक ज़रूरत पर आधारित था- इस तथ्य का किरायेदार द्वारा कोई खंडन भी नहीं किया गया, इसलिए अपीलकर्ता द्वारा वास्तविक ज़रूरत के जो अतिरिक्त आधार प्रस्तुत किए गए, उन्हें केवल इस वजह से नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि वे मूल दलीलों का हिस्सा नहीं थे, बल्कि बाद में हुई घटनाओं के आलोक में उन्हें बाद में शामिल किया गया। (देखें: पसुपुलेटी वेंकटेश्वरलू बनाम द मोटर एंड जनरल ट्रेडर्स, 1975 INSC 75)

    उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर अपील स्वीकार की गई और अपीलीय अदालत द्वारा पारित आदेश बहाल किया, जिसमें अपीलकर्ता को मुकदमे में संशोधन करने की अनुमति दी गई थी।

    Cause Title: VINAY RAGHUNATH DESHMUKH VERSUS NATWARLAL SHAMJI GADA AND ANOTHER

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